उत्तर प्रदेश : बहुचर्चित राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) घोटाले की जांच में पूर्व विधायक मुकेश श्रीवास्तव उर्फ ज्ञानेन्द्र प्रताप सिंह से जुड़ी कंपनियों को लेकर बड़ा खुलासा सामने आया है। विजिलेंस जांच में ऐसी नौ कंपनियों का पता चला है, जिन्हें बहराइच, बलरामपुर और श्रावस्ती जिलों में 18 करोड़ रुपये से अधिक के काम दिए गए थे। जांच में आरोप है कि इन कामों में बड़े पैमाने पर वित्तीय अनियमितताएं हुईं। कई ऐसे काम भी सामने आए हैं, जो मौके पर हुए ही नहीं, लेकिन उनके नाम पर पूरा भुगतान कर दिया गया।
विजिलेंस अधिकारियों की जांच में इन मामलों से जुड़े दस्तावेजी साक्ष्य जुटाए गए हैं। अब जांच एजेंसी यह पता लगाने में जुटी है कि पूर्व विधायक और उनसे जुड़े लोगों की फर्मों को एनआरएचएम की अलग-अलग योजनाओं के तहत कितने काम मिले थे और उनमें कुल कितनी रकम का भुगतान किया गया। सूत्रों के मुताबिक, इनमें से कई कार्य स्टेट बजट के तहत आवंटित किए गए थे। विजिलेंस अब इन सभी कार्यों और भुगतान से संबंधित रिकॉर्ड की गहनता से पड़ताल कर रही है।
जांच में सामने आया है कि पूर्व विधायक के पिता आरपी श्रीवास्तव की फर्म आरपी ग्रुप ऑफ कंस्ट्रक्शन के अलावा उनके रिश्तेदारों के नाम से पंजीकृत कई अन्य फर्मों को भी स्वास्थ्य विभाग से जुड़े कार्य दिए गए थे। इनमें हिंदुस्तान ड्रग्स, श्रष्टि इंटरप्राइजेज, लखनऊ मेडिकल, चित्रांश कंस्ट्रक्शन, यूपी मेडिकल सप्लायर और राशि इंटरप्राइजेज जैसी फर्में शामिल हैं। इन कंपनियों को बहराइच, बलरामपुर और श्रावस्ती में अलग-अलग कार्य सौंपे गए थे।
विजिलेंस की जांच में यह भी आरोप सामने आया है कि कुछ फर्मों को बिना टेंडर के काम दिए गए। इतना ही नहीं, कुछ मामलों में वर्क ऑर्डर बाद में जारी किया गया, जबकि भुगतान उससे पहले ही कर दिया गया था। जांच एजेंसी को ऐसे दस्तावेज भी मिले हैं, जिनसे कथित तौर पर पता चलता है कि अलमारी, कुर्सी और अन्य सामान की आपूर्ति कागजों पर दिखाई गई, जबकि वास्तविक स्तर पर काम या सामान की आपूर्ति को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं।
विजिलेंस की ओर से दर्ज तीन अलग-अलग मुकदमों में बहराइच, बलरामपुर, श्रावस्ती और गोंडा में वित्तीय वर्ष 2017-18 से 2021-22 के बीच एनआरएचएम के तहत आवंटित कार्यों की जांच की जा रही है। एजेंसी भुगतान प्रक्रिया, टेंडर, वर्क ऑर्डर, बिल और सामान की आपूर्ति से जुड़े दस्तावेजों का मिलान कर रही है। जांच का उद्देश्य यह पता लगाना है कि सरकारी धन का इस्तेमाल निर्धारित कार्यों में हुआ या फिर कागजी प्रक्रिया के जरिए रकम का भुगतान कराया गया।
इस मामले में विजिलेंस जल्द ही दो तत्कालीन मुख्य चिकित्सा अधिकारियों (सीएमओ) को दोबारा पूछताछ के लिए तलब कर सकती है। जांच एजेंसी पहले भी अधिकारियों से पूछताछ कर चुकी है। अब कंपनियों को मिले कार्यों, भुगतान और कथित अनियमितताओं से जुड़े नए तथ्यों के सामने आने के बाद दोनों अधिकारियों से दोबारा सवाल किए जाने की तैयारी है। जांच में अधिकारियों की भूमिका और निर्णय प्रक्रिया को भी खंगाला जा रहा है।
पूर्व विधायक मुकेश श्रीवास्तव पहले से ही आय से अधिक संपत्ति के मामले में विजिलेंस की कार्रवाई का सामना कर रहे हैं। विजिलेंस ने जून 2026 में उन्हें गिरफ्तार किया था। आरोप है कि उनके कार्यकाल के दौरान उन्होंने अपनी ज्ञात आय से करीब 67 लाख रुपये अधिक संपत्ति अर्जित की। इस मामले में उनके खिलाफ लखनऊ स्थित उत्तर प्रदेश सतर्कता अधिष्ठान थाने में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है।
वहीं, बलरामपुर में सामने आए स्वास्थ्य विभाग से जुड़े कथित घोटाले की जांच का दायरा पूर्व विधायक के परिवार तक भी पहुंच चुका है। जुलाई 2026 में विजिलेंस ने पूर्व विधायक के भाई अजय श्रीवास्तव की पत्नी सविता श्रीवास्तव के खिलाफ भी केस दर्ज किया था। एजेंसी मुकेश श्रीवास्तव और अजय श्रीवास्तव से जुड़ी फर्मों के कारोबार और सरकारी कार्यों की भी जांच कर रही है।
अब विजिलेंस की जांच का फोकस इस बात पर है कि सरकारी बजट से जारी हुई रकम किस प्रक्रिया के तहत इन कंपनियों तक पहुंची, किन अधिकारियों ने भुगतान को मंजूरी दी और जिन कार्यों के लिए पैसा जारी हुआ, वे वास्तव में जमीन पर पूरे हुए थे या नहीं। दस्तावेजों और मौके की स्थिति के बीच अंतर मिलने पर जांच आगे और गंभीर हो सकती है। फिलहाल एजेंसी सभी संबंधित फर्मों, अधिकारियों और भुगतान रिकॉर्ड को जोड़कर पूरे मामले की कड़ियां तलाश रही है।