लखीमपुर खीरी। उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले में दीपावली से पहले मोहाना नदी की तेज कटान ने ग्रामीणों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। तिकुनिया क्षेत्र के जसनगर और पोहारीबाबा गांवों में नदी का जलस्तर घटने के बाद किनारों पर कटान अचानक तेज हो गया है। पिछले तीन दिनों में करीब आधा दर्जन मकान नदी की चपेट में आ गए, जबकि 30 एकड़ से अधिक क्षेत्र में खड़ी धान और गन्ने की फसल भी नदी में समा गई। प्रभावित परिवारों के सामने रहने और आजीविका का गंभीर संकट खड़ा हो गया है। जिन घरों में त्योहार की तैयारियां होनी थीं, वहां अब लोग बचा हुआ सामान समेटने और सुरक्षित स्थान तलाशने में जुटे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि कटान से लगातार नुकसान होने के बावजूद स्थायी बचाव की व्यवस्था नहीं हो सकी है। उन्होंने जिला प्रशासन से तत्काल राहत, पुनर्वास और कटान रोकने के ठोस उपाय करने की मांग की है।

मोहाना नदी की तेज कटान से छह परिवारों के आशियाने उजड़े

तिकुनिया क्षेत्र में बहने वाली मोहाना नदी एक बार फिर ग्रामीणों के लिए बड़ी मुसीबत बन गई है।

जसनगर और पोहारीबाबा गांवों में नदी का जलस्तर कम होने के बाद किनारों की मिट्टी तेजी से कटने लगी है।

स्थानीय जानकारी के अनुसार, कटान की चपेट में आकर राजकुमार, जीवन, संतोष, गोवर्धन, मुनेश और दिनेश के मकान पूरी तरह या आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हो गए हैं।

कई परिवारों के मकानों का कुछ हिस्सा ही बचा है, जबकि बाकी हिस्सा नदी में समा गया।

घर गंवाने वाले लोगों के सामने अब सबसे बड़ी समस्या सुरक्षित आश्रय की है।

वर्षों की मेहनत और बचत से बनाए गए घरों को नदी में समाते देखकर प्रभावित परिवार परेशान हैं।

देखते ही देखते नदी में समा गया राजकुमार का घर

जसनगर गांव में नदी की कटान लगातार बढ़ रही है।

मंगलवार को मोहाना नदी की तेज धारा ने राजकुमार के मकान को अपनी चपेट में ले लिया।

नदी किनारे स्थित मकान का हिस्सा कटकर पानी में समा गया।

यह देखकर आसपास रहने वाले परिवारों में भी भय का माहौल बन गया।

राजकुमार के पड़ोसी गोवर्धन ने अपने मकान पर खतरा बढ़ता देखकर उसे स्वयं तोड़ना शुरू कर दिया, ताकि ईंटों और अन्य निर्माण सामग्री को बचाया जा सके।

ग्रामीणों का कहना है कि नदी धीरे-धीरे आबादी की ओर बढ़ रही है और कई अन्य मकानों पर भी खतरा मंडरा रहा है।

30 एकड़ से ज्यादा धान और गन्ने की फसल बर्बाद

मोहाना नदी की कटान ने किसानों की आर्थिक स्थिति पर भी गंभीर असर डाला है।

जानकारी के अनुसार, पिछले तीन दिनों में 30 एकड़ से अधिक कृषि भूमि पर खड़ी धान और गन्ने की फसल नदी में समा गई है।

प्रभावित किसानों में दिवाकर, सुरेश और राजकुमार सहित कई लोगों के नाम सामने आए हैं।

दिवाकर की लगभग दो एकड़, सुरेश की सवा तीन एकड़ और राजकुमार की करीब चार एकड़ धान की फसल नदी की भेंट चढ़ गई।

इसके अलावा मनजीत और शेरा सिंह सहित अन्य किसानों की धान तथा गन्ने की फसलों को भी नुकसान पहुंचा है।

किसानों के सामने अब खेती की लागत निकालने तक की चुनौती खड़ी हो गई है।

कटान के कारण किसानों की बढ़ी आर्थिक परेशानी

धान और गन्ने की फसल तैयार करने में किसानों को बीज, खाद, मजदूरी, सिंचाई और अन्य कृषि कार्यों पर काफी खर्च करना पड़ता है।

फसल पकने के समय खेत नदी में समा जाने से किसानों की महीनों की मेहनत समाप्त हो सकती है।

प्रभावित किसानों का कहना है कि नुकसान केवल इस सीजन की फसल तक सीमित नहीं है।

नदी के कटाव से कृषि भूमि भी कम होती जा रही है।

यदि खेत का बड़ा हिस्सा नदी में समा जाता है, तो अगले सीजन में खेती करने के लिए जमीन की उपलब्धता भी प्रभावित होती है।

ऐसे में किसानों के सामने तत्काल आर्थिक सहायता के साथ दीर्घकालिक पुनर्वास का सवाल भी खड़ा हो गया है।

दीपावली से पहले उजड़ गए कई परिवार

नदी की कटान ऐसे समय पर तेज हुई है, जब ग्रामीण त्योहार की तैयारियों में जुटे थे।

दीपावली के अवसर पर परिवार अपने घरों की साफ-सफाई और अन्य तैयारियां कर रहे थे।

लेकिन जसनगर और पोहारीबाबा के प्रभावित परिवारों के सामने अब घर बचाने और सामान सुरक्षित निकालने की चुनौती है।

कई लोग मकानों की ईंटें, दरवाजे और घरेलू सामान निकालकर सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने में लगे हैं।

कटान प्रभावित ग्रामीणों का कहना है कि नदी के लगातार आगे बढ़ने के कारण वे सामान्य कामकाज भी नहीं कर पा रहे हैं।

घर और खेती दोनों पर संकट मंडराने से त्योहार की खुशियां चिंता में बदल गई हैं।

एक दर्जन से अधिक मकानों पर मंडरा रहा खतरा

जसनगर गांव में कटान के कारण कई अन्य घर भी खतरे की जद में हैं।

मंगलवार की प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, गोवर्धन, बालकराम, बनवारी, सेवकराम, मनोज, रमेश, काशी, छांगुर, रामवृक्ष, रामकरन, चंदन, उमेश, रामचंद्र, रामदुलारे, कमलेश और सुमित्रा सहित कई ग्रामीणों के मकान कटान के मुहाने पर हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि नदी की कटान पिछले कई दिनों से जारी है और इसका दायरा लगातार बढ़ रहा है।

स्थिति ऐसी है कि परिवारों को हर समय मकान गिरने का डर बना रहता है।

प्रभावित लोगों ने प्रशासन से सुरक्षित स्थान पर बसाने की मांग की है।

नदी का पानी घटने के बाद क्यों बढ़ता है कटान?

नदियों में बाढ़ का पानी घटने के बाद भी किनारों पर कटान जारी रह सकता है।

तेज बहाव के दौरान नदी की धारा किनारों की मिट्टी को कमजोर कर देती है।

जलस्तर कम होने पर पहले से कमजोर मिट्टी का हिस्सा अचानक ढह सकता है।

मोहाना नदी के किनारे बसे गांवों में भी ऐसी स्थिति देखने को मिल रही है।

ग्रामीणों के अनुसार, पानी घटने के बाद कटान तेज हुआ है।

इस कारण नदी के किनारे स्थित मकान और खेत लगातार प्रभावित हो रहे हैं।

विशेष रूप से जहां नदी की धारा सीधे आबादी या कृषि भूमि की ओर मुड़ती है, वहां नुकसान का खतरा अधिक होता है।

पहले भी कटान से प्रभावित हो चुका है जसनगर

मोहाना नदी की कटान जसनगर और आसपास के क्षेत्रों के लिए नई समस्या नहीं है।

सितंबर 2026 में भी नदी के तेज बहाव से कई मकानों और कृषि भूमि पर खतरा पैदा हुआ था।

उस समय जसनगर के पास खैरटिया बांध और रेलवे ट्रैक की सुरक्षा को लेकर भी चिंता जताई गई थी।

कटान को रोकने के लिए सिंचाई विभाग की ओर से बोरियों और पत्थरों की सहायता से सुरक्षा कार्य किए गए थे।

जून 2026 में भी जसनगर के पास नदी किनारे ठोकर निर्माण और कटानरोधी कार्यों की जानकारी सामने आई थी।

इसके बावजूद प्रभावित इलाकों में नदी की कटान पूरी तरह नियंत्रित नहीं हो सकी है।

ग्रामीणों ने की सुरक्षित स्थान पर बसाने की मांग

कटान से प्रभावित परिवारों ने जिला प्रशासन से पुनर्वास की व्यवस्था करने की मांग की है।

ग्रामीणों का कहना है कि नदी किनारे रहना अब जोखिम भरा होता जा रहा है।

ऐसे में उन्हें सुरक्षित स्थान पर जमीन या रहने की वैकल्पिक व्यवस्था उपलब्ध कराई जानी चाहिए।

इसके साथ ही किसानों ने नष्ट हुई फसलों और कृषि भूमि का सर्वे कराकर उचित सहायता दिए जाने की मांग की है।

ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते कटान रोकने के स्थायी उपाय नहीं किए गए, तो आने वाले दिनों में अन्य मकान और खेत भी नदी की चपेट में आ सकते हैं।

हालांकि, इस ताजा घटना में नुकसान के आधिकारिक सर्वे और मुआवजे की घोषणा का विस्तृत विवरण अभी उपलब्ध नहीं है।

प्रशासन के सामने राहत और पुनर्वास की चुनौती

मोहाना नदी की कटान से प्रभावित परिवारों के सामने दोहरी समस्या खड़ी हो गई है।

एक तरफ रहने के लिए सुरक्षित स्थान की जरूरत है, तो दूसरी तरफ खेती और आजीविका का नुकसान हुआ है।

ऐसे में प्रशासन के सामने प्रभावित परिवारों को तत्काल राहत पहुंचाने के साथ भविष्य में होने वाली कटान को रोकने की चुनौती है।

इसके लिए राजस्व विभाग द्वारा नुकसान का आकलन, सिंचाई विभाग द्वारा संवेदनशील स्थानों की जांच और आवश्यक सुरक्षा कार्य महत्वपूर्ण होंगे।

नदी किनारे बसे परिवारों को समय रहते सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाना भी जरूरी है।

फिलहाल जसनगर और पोहारीबाबा के ग्रामीणों की निगाहें प्रशासनिक सहायता और स्थायी कटानरोधी उपायों पर टिकी हैं।

दीपावली से पहले हुए इस नुकसान ने कई परिवारों के सामने घर और आजीविका दोनों का संकट खड़ा कर दिया है।

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