कारगिल युद्ध में नागा रेजिमेंट का पराक्रम

Update: 2026-07-26 13:20 GMT

उत्तर प्रदेश: कारगिल युद्ध की वीरगाथाएं आज भी भारतीय सेना के अदम्य साहस और बलिदान की याद दिलाती हैं। वर्ष 1999 में हुए कारगिल युद्ध में भारतीय सेना की कई रेजिमेंट और जवानों ने अपनी बहादुरी से इतिहास रचा था। इन्हीं में 1-नागा रेजिमेंट का नाम भी स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है, जिसने द्रास सेक्टर की बेहद कठिन और दुर्गम बर्फीली चोटियों पर दुश्मनों का डटकर मुकाबला किया और उन्हें पीछे हटने पर मजबूर कर दिया।

भारतीय सेना ने कारगिल विजय दिवस के अवसर पर 1-नागा रेजिमेंट के वीर जवानों के शौर्य को याद किया। इस रेजिमेंट ने कठिन परिस्थितियों में अद्भुत साहस, अनुशासन और युद्ध कौशल का परिचय देते हुए ऑपरेशन विजय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। रेजिमेंट को उसके असाधारण योगदान के लिए प्रतिष्ठित "बैटल ऑनर द्रास" और "थिएटर ऑनर कारगिल" से सम्मानित किया गया।

कारगिल युद्ध में 1-नागा रेजिमेंट का हिस्सा रहे आनरेरी लेफ्टिनेंट प्रह्लाद सिंह ने उस समय की वीरता भरी यादों को साझा किया। उन्होंने बताया कि वर्ष 1999 में जब पाकिस्तान समर्थित घुसपैठियों ने कारगिल की ऊंची चोटियों पर कब्जा कर लिया था, तब भारतीय सेना ने ऑपरेशन विजय के तहत जवाबी कार्रवाई शुरू की थी। इसी अभियान के दौरान 1-नागा रेजिमेंट को द्रास सेक्टर में तैनात किया गया था।

11 मई 1999 को 1-नागा रेजिमेंट द्रास पहुंचने वाली भारतीय सेना की शुरुआती बटालियनों में शामिल थी। उस समय वहां का मौसम बेहद चुनौतीपूर्ण था। बर्फ से ढकी ऊंची चोटियां, दुश्मन की मजबूत स्थिति और लगातार चल रही गोलाबारी के बावजूद नागा रेजिमेंट के जवानों ने हिम्मत नहीं हारी और मोर्चा संभाला।

मेजर एसएस त्रिपाठी के नेतृत्व में जवानों ने रणनीति और साहस के साथ दुश्मन के ठिकानों पर हमला किया। रेजिमेंट ने ब्लैक रॉक और ब्लैक टूथ जैसी महत्वपूर्ण रणनीतिक चोटियों पर कब्जा करने में अहम भूमिका निभाई। इन ऊंचाइयों पर कब्जा भारतीय सेना के लिए बेहद महत्वपूर्ण था, क्योंकि यहां से दुश्मन भारतीय सैन्य गतिविधियों पर नजर रख सकता था।

आनरेरी लेफ्टिनेंट प्रह्लाद सिंह ने बताया कि कारगिल की लड़ाई में जवानों ने अपनी जान की परवाह किए बिना देश की रक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। द्रास की कठिन परिस्थितियों में सैनिकों ने जिस साहस का परिचय दिया, वह भारतीय सेना की गौरवशाली परंपरा का उदाहरण है।

इस अभियान के दौरान 1-नागा रेजिमेंट के 10 वीर जवानों ने मातृभूमि की रक्षा करते हुए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया, जबकि 52 सैनिक घायल हुए। इन वीर जवानों का बलिदान आज भी सेना और देशवासियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है।

सिपाही प्रह्लाद सिंह ने भी कारगिल युद्ध में दुश्मनों के खिलाफ मोर्चा संभाला था। उनके साहस और सेवा भावना को देखते हुए उन्हें आगे चलकर पदोन्नति मिली और वह आनरेरी लेफ्टिनेंट बने। मूल रूप से पिथौरागढ़ निवासी प्रह्लाद सिंह वर्तमान में बरेली में रहते हैं।

उन्होंने कहा कि कारगिल युद्ध केवल एक सैन्य अभियान नहीं था, बल्कि यह भारतीय जवानों के साहस, त्याग और राष्ट्रभक्ति की मिसाल थी। 1-नागा रेजिमेंट के जवानों ने जिस तरह दुर्गम पहाड़ियों पर लड़ाई लड़ी, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनी रहेगी।

कारगिल विजय दिवस पर देश उन सभी वीर जवानों को नमन करता है, जिन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना भारत की संप्रभुता और सम्मान की रक्षा की। 1-नागा रेजिमेंट की वीरता और बलिदान भारतीय सैन्य इतिहास में हमेशा अमर रहेगा।

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