सोहेलवा में बढ़ा बाघों का कुनबा, लेपर्ड सफारी से पर्यटन को मिलेगी नई रफ्तार
उत्तर प्रदेश: भारत-नेपाल सीमा पर स्थित उत्तर प्रदेश के बलरामपुर जिले का सोहेलवा वन्यजीव प्रभाग अब वन्यजीव संरक्षण और ईको-टूरिज्म के क्षेत्र में नई पहचान बनाने की ओर बढ़ रहा है। करीब 452 वर्ग किलोमीटर में फैले इस जंगल में बाघों की संख्या लगातार बढ़ रही है। वहीं, लंबे समय से लंबित पड़े टाइगर रिजर्व के प्रस्ताव के बीच अब यहां लेपर्ड सफारी विकसित करने की योजना को मंजूरी मिल गई है। इससे क्षेत्र में पर्यटन गतिविधियों को बढ़ावा मिलने के साथ ही स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर भी पैदा होने की उम्मीद है।
सोहेलवा जंगल में वर्ष 2022-23 के दौरान वन विभाग के कर्मचारियों ने पहली बार एक बाघ की मौजूदगी दर्ज की थी। इसके बाद बाघों की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए जंगल में ट्रैकिंग कैमरे लगाए गए। कैमरा ट्रैप के जरिए पुष्टि हुई कि सोहेलवा में बाघों की संख्या बढ़कर तीन हो गई है। वर्तमान में यहां चार बाघ और दो शावकों का कुनबा मौजूद बताया जा रहा है।
वन विभाग ने बाघों की वास्तविक संख्या जानने के लिए वर्ष 2026 में दोबारा गणना कराई है। हालांकि इसकी रिपोर्ट अभी जारी नहीं हुई है। जंगल में बाघों की गतिविधियों पर लगातार नजर रखने के लिए करीब 150 ट्रैकिंग कैमरे लगाए गए हैं। इन कैमरों के माध्यम से वन विभाग वन्यजीवों की संख्या और उनके व्यवहार की जानकारी जुटा रहा है।
सोहेलवा को टाइगर रिजर्व बनाने का प्रस्ताव लंबे समय से केंद्र सरकार के पास लंबित है। पर्यावरण प्रेमियों और वन्यजीव संरक्षण से जुड़े लोगों को उम्मीद थी कि जल्द ही इसे टाइगर रिजर्व का दर्जा मिलेगा, लेकिन अभी तक इस प्रस्ताव को मंजूरी नहीं मिल सकी है। इसके बावजूद वन विभाग ने यहां ईको-टूरिज्म को बढ़ावा देने की दिशा में कदम उठाने शुरू कर दिए हैं।
अब सोहेलवा में लेपर्ड सफारी विकसित करने की योजना को शासन से हरी झंडी मिल गई है। अधिकारियों के अनुसार, यहां बड़ी संख्या में तेंदुए मौजूद हैं। कैमरा ट्रैप सर्वे में 150 से अधिक तेंदुओं की मौजूदगी दर्ज की गई है। इसके अलावा जंगल में भालू, हिरन, चीतल, सांभर, नीलगाय, बिज्जू, साही समेत कई वन्यजीव पाए जाते हैं। यहां पक्षियों की 400 से अधिक प्रजातियां भी मौजूद हैं, जो इसे जैव विविधता के लिहाज से खास बनाती हैं।
लेपर्ड सफारी के विकास के बाद सोहेलवा में पर्यटकों की संख्या बढ़ने की उम्मीद है। वन विभाग की योजना है कि यहां आने वाले पर्यटकों के लिए नेचर ट्रैक, बर्ड सिटिंग प्वाइंट, बोटिंग और होम स्टे जैसी सुविधाएं विकसित की जाएं। जंगल के अंदर करीब 10 किलोमीटर लंबा नेचर ट्रैक बनाने की तैयारी भी की जा रही है, जिससे पर्यटक सुरक्षित तरीके से वन्यजीवों और प्राकृतिक सुंदरता का आनंद ले सकेंगे।
वन क्षेत्र से जुड़े गांवों के लोगों को भी पर्यटन से जोड़ने की योजना बनाई गई है। स्थानीय लोगों को अपने घरों में छोटे-छोटे कॉटेज और होम स्टे विकसित करने के लिए प्रेरित किया जाएगा। इससे ग्रामीणों को रोजगार मिलेगा और क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियां भी बढ़ेंगी।
सोहेलवा वन्यजीव प्रभाग की प्राकृतिक खूबसूरती इसे पर्यटन के लिए खास बनाती है। घने जंगल, हरियाली, राप्ती नदी के सहायक पहाड़ी नाले और नेपाल के पहाड़ों का दृश्य पर्यटकों को आकर्षित करता है। पहले से ही जरवा क्षेत्र में ईको-टूरिज्म गतिविधियों को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिससे यहां पर्यटकों की आवाजाही में वृद्धि हुई है।
वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि टाइगर रिजर्व प्रस्ताव को मंजूरी मिलने पर जंगल में ग्रास लैंड विकसित किया जाएगा और वन्यजीवों के लिए बेहतर माहौल तैयार किया जाएगा। इसके अलावा जंगल के अंदर वाटर होल की संख्या बढ़ाने की योजना है, ताकि जानवरों को पानी के लिए ज्यादा दूर न जाना पड़े।
प्रभागीय वनाधिकारी गौरव गर्ग के अनुसार, सोहेलवा में वन्यजीव संरक्षण के साथ-साथ पर्यटन विकास पर भी ध्यान दिया जा रहा है। बाघों की संख्या की नई गणना रिपोर्ट आने के बाद स्थिति और स्पष्ट होगी। साथ ही जंगल में होम स्टे, गेस्ट हाउस और अन्य सुविधाओं को विकसित करने की योजना पर काम किया जा रहा है।
लेपर्ड सफारी की शुरुआत के बाद बलरामपुर और सोहेलवा क्षेत्र उत्तर प्रदेश के पर्यटन मानचित्र पर एक बड़े ईको-टूरिज्म केंद्र के रूप में उभर सकते हैं। इससे जहां वन्यजीव संरक्षण को मजबूती मिलेगी, वहीं स्थानीय युवाओं और ग्रामीणों के लिए रोजगार के नए रास्ते भी खुलेंगे।