'मोबाइल मोड' से निकलकर 'एक्शन मोड' में आए युवा, राष्ट्र निर्माण में निभाएं भूमिका: स्वांतरंजन

Update: 2026-07-26 16:48 GMT
Lucknow लखनऊ: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के अखिल भारतीय प्रचारक प्रमुख स्वांतरंजन ने युवाओं से आह्वान किया है कि वे केवल मोबाइल तक सीमित न रहें, बल्कि सक्रिय होकर राष्ट्र निर्माण में अपनी भूमिका निभाएं। उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति की पहचान उसके बाहरी रूप से नहीं, बल्कि उसके मानवीय मूल्यों, व्यवहार और आचरण से होती है। लखनऊ स्थित विश्व संवाद केंद्र में रविवार को आयोजित कार्यक्रम में स्वांतरंजन ने ‘मातृभूमि स्तवन’ पुस्तक का लोकार्पण किया। इस दौरान उन्होंने कहा कि जब राष्ट्र और सनातन का विचार एक साथ सामने आता है तो उसका महत्व और अधिक बढ़ जाता है। उन्होंने कहा कि यह पुस्तक केवल पढ़ने की सामग्री नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने वाला मार्गदर्शक ग्रंथ है।
स्वांतरंजन ने कहा कि पुस्तकों का अध्ययन करने के साथ-साथ उनके विचारों को समाज तक पहुंचाना भी जरूरी है। उन्होंने स्वयंसेवकों से अपील की कि वे पढ़ने, लिखने और सकारात्मक विचारों के प्रसार की आदत विकसित करें। युवाओं को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में युवा पीढ़ी को ‘मोबाइल मोड’ से बाहर निकलकर ‘एक्शन मोड’ में आने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि देश के निर्माण में युवाओं की भागीदारी बेहद महत्वपूर्ण है और उन्हें अपने समय तथा ऊर्जा का उपयोग समाज हित में करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का उद्देश्य अच्छे व्यक्तियों का निर्माण करना और उनके व्यक्तित्व का विकास करना है। संघ के स्वयंसेवकों द्वारा स्थापित कई संगठन आज देश और दुनिया में अपनी पहचान बना चुके हैं, लेकिन स्वयंसेवक की असली पहचान उसके व्यवहार और जीवन में दिखाई देने वाले संस्कारों से होती है। स्वांतरंजन ने संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने प्रचारकों के लिए ऐसी व्यवस्था बनाई थी, जिसमें वे किसी विशेष पहचान या वेशभूषा के बजाय सामान्य समाज का हिस्सा बनकर राष्ट्र कार्य करते हैं। उन्होंने कहा कि स्वयंसेवक को समाज से एक कदम आगे रहना चाहिए, लेकिन अलग दिखना जरूरी नहीं है।
‘मातृभूमि स्तवन’ पुस्तक के महत्व पर उन्होंने कहा कि इसमें संघ के पुराने गीत, मंत्र, सुभाषित और अन्य प्रेरक सामग्री को संकलित किया गया है। यह ग्रंथ स्वयंसेवकों में संस्कार और राष्ट्र के प्रति समर्पण की भावना को मजबूत करने का काम करेगा। आरएसएस के शताब्दी वर्ष का जिक्र करते हुए स्वांतरंजन ने कहा कि यह समय संघ के विचारों को व्यापक समाज तक पहुंचाने का है। उन्होंने कहा कि भारत के बारे में दुनिया में कई तरह के नैरेटिव बनाए जाते हैं, ऐसे समय में नई पीढ़ी की जिम्मेदारी है कि वह देश को सही तरीके से समझे और वैश्विक स्तर पर भारत का पक्ष प्रभावी ढंग से रखे।
कार्यक्रम में केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, लखनऊ परिसर के निदेशक डॉ. सर्व नारायण झा ने कहा कि यह ग्रंथ मातृभूमि के प्रति श्रद्धा और समर्पण की भावना को दर्शाता है। उन्होंने इसे स्वयंसेवकों के लिए प्रेरणा और मार्गदर्शन का स्रोत बताया। वरिष्ठ वक्ता एके श्रीवास्तव ने पुस्तक के लेखक के जीवन को अनुशासन, आध्यात्मिकता और सात्विक विचारों का उदाहरण बताया। वहीं डॉ. चन्द्रभूषण त्रिपाठी ने कहा कि यह केवल पुस्तक नहीं, बल्कि संघ की वैचारिक और सांस्कृतिक विरासत को संजोने वाला महत्वपूर्ण ग्रंथ है।
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