हर साल नुकसान, फिर भी नहीं मिला पक्का इलाज

Update: 2026-07-23 11:46 GMT

उत्तराखंड: मानसून आते ही पहाड़ी क्षेत्रों की सड़कों पर संकट शुरू हो जाता है। तेज बारिश, भूस्खलन और नालों के उफान के कारण हर साल बड़ी संख्या में सड़कें क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। इस बार भी मानसून की बारिश ने राज्य की सड़क व्यवस्था को बड़ा झटका दिया है। अब तक प्रदेश की 1,561 सड़कें प्रभावित हो चुकी हैं। इनकी मरम्मत के लिए करीब 122 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान लगाया गया है।

बारिश के कारण सबसे अधिक नुकसान ग्रामीण क्षेत्रों की सड़कों को हुआ है। आंकड़ों के अनुसार, पौड़ी जिले में सबसे ज्यादा 317 सड़कें क्षतिग्रस्त हुई हैं। वहीं प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) की 571 सड़कें प्रभावित होने से ग्रामीण इलाकों में आवागमन की समस्या बढ़ गई है। कई जगहों पर सड़कें टूटने से गांवों का संपर्क मुख्य मार्गों से कट गया है।

हर साल मानसून में सामने आने वाली यह समस्या केवल प्राकृतिक आपदा तक सीमित नहीं है, बल्कि सड़क निर्माण और रखरखाव व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करती है। पहाड़ी क्षेत्रों में सड़क निर्माण के दौरान ढलानों की कटिंग तो कर दी जाती है, लेकिन कई जगहों पर उनका स्थायी उपचार नहीं हो पाता। इसके कारण बारिश के समय पहाड़ कमजोर होकर दरकने लगते हैं और मलबा सड़कों पर आ जाता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, पहाड़ों में सड़क खराब होने का एक बड़ा कारण कमजोर जल निकासी व्यवस्था है। अगर बारिश का पानी सही तरीके से बाहर नहीं निकल पाता तो वह सड़क की नींव तक पहुंच जाता है। इससे सड़क धंसने लगती है और भूस्खलन का खतरा बढ़ जाता है। इसके अलावा जलवायु परिवर्तन के कारण कम समय में ज्यादा बारिश होने की घटनाएं भी पहाड़ी क्षेत्रों के लिए बड़ी चुनौती बन रही हैं।

मरम्मत नहीं, स्थायी समाधान की जरूरत

हर साल मानसून के दौरान सड़कें टूटने के बाद सरकार और विभागों की ओर से मरम्मत अभियान चलाया जाता है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि केवल सड़क खोलना स्थायी समाधान नहीं है। जरूरत इस बात की है कि मानसून आने से पहले संवेदनशील क्षेत्रों में विशेष तैयारी की जाए।

मार्च से मई के बीच प्री-मानसून ट्रीटमेंट के तहत पहाड़ी ढलानों की जांच, नालियों की सफाई, कमजोर पत्थरों को हटाना और खराब रिटेनिंग वॉल की मरम्मत जैसे काम किए जाएं तो बारिश के दौरान नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

दूसरे राज्यों की तकनीक से मिल सकती है मदद

हिमाचल प्रदेश और सिक्किम जैसे पहाड़ी राज्यों में सड़क सुरक्षा के लिए नई तकनीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है। हिमाचल में संवेदनशील ढलानों पर रॉक बोल्टिंग, स्टील वायर मेश और शॉटक्रीट जैसी तकनीकों का प्रयोग किया जा रहा है। इससे पहाड़ों को स्थिर रखने में मदद मिलती है।

वहीं सिक्किम में बायो-इंजीनियरिंग तकनीक और बेहतर ड्रेनेज सिस्टम को सड़क निर्माण का हिस्सा बनाया गया है। इन उपायों से भूस्खलन वाले क्षेत्रों में सड़कें अधिक मजबूत बनाई जा रही हैं।

आधुनिक तकनीक से होगी निगरानी

दुनिया के कई पहाड़ी देशों में सड़क सुरक्षा के लिए सेंसर, ड्रोन और निगरानी प्रणाली का इस्तेमाल किया जा रहा है। इससे भूस्खलन की संभावना का पहले ही पता लगाया जा सकता है। उत्तराखंड जैसे भौगोलिक रूप से संवेदनशील राज्य में भी ऐसी तकनीकों को अपनाने की जरूरत महसूस की जा रही है।

इसके अलावा पहाड़ों में केवल कंक्रीट निर्माण से समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता। ढलानों पर स्थानीय पौधों, गहरी जड़ों वाली वनस्पतियों और घास लगाने से मिट्टी के कटाव को रोका जा सकता है। इसे बायो-इंजीनियरिंग मॉडल कहा जाता है, जिसे कई क्षेत्रों में सफलतापूर्वक अपनाया गया है।

राज्य सरकार और सड़क विभाग का कहना है कि अब केवल क्षतिग्रस्त सड़कों को खोलने पर ध्यान नहीं दिया जा रहा, बल्कि संवेदनशील स्थानों के स्थायी उपचार की दिशा में भी काम किया जा रहा है। भूस्खलन संभावित क्षेत्रों की पहचान, स्लोप स्टेबिलाइजेशन, बेहतर ड्रेनेज और आधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल से भविष्य में मानसून से होने वाले नुकसान को कम करने की योजना बनाई जा रही है।

उत्तराखंड के सामने चुनौती यह है कि हर साल करोड़ों रुपये खर्च करने के बावजूद सड़क संकट दोहराता रहता है। ऐसे में जरूरत है कि तात्कालिक मरम्मत के बजाय दीर्घकालिक योजना बनाकर पहाड़ी सड़कों को सुरक्षित और टिकाऊ बनाया जाए।

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