देहरादून: उत्तराखंड हिमालय में भूकंपीय ऊर्जा के संचय को लेकर एक अध्ययन में अहम निष्कर्ष सामने आया है। शोध के अनुसार, क्षेत्र के नीचे स्थित मुख्य हिमालयी भ्रंश के लगभग 300 किलोमीटर लंबे हिस्से में हर सौ वर्ष के दौरान इतना तनाव जमा हो रहा है, जो 8.1 परिमाण के बड़े भूकंप के बराबर हो सकता है। यह ऊर्जा संचय की दर का वैज्ञानिक आकलन है; इससे किसी भूकंप की तारीख या उसके आने का निश्चित समय तय नहीं होता। 
अध्ययन में जमीन की गति मापने वाले ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम यानी जीएनएसएस और एएलओएस-2 उपग्रह की रडार तस्वीरों का इस्तेमाल किया गया। इन दोनों माध्यमों से वैज्ञानिकों ने सतह की क्षैतिज और ऊर्ध्वाधर गति का विश्लेषण करके जमीन के भीतर जमा हो रहे तनाव का अनुमान लगाया।
शोध के निष्कर्ष बताते हैं कि उत्तराखंड हिमालय के नीचे मुख्य हिमालयी भ्रंश का संबंधित हिस्सा मजबूती से अटका हुआ है। वैज्ञानिक भाषा में इसे उच्च स्तर की ‘कपलिंग’ कहा जाता है। इसका अर्थ है कि प्लेटों की निरंतर गति के बावजूद भ्रंश का यह हिस्सा उसी अनुपात में खिसक नहीं रहा और वहां तनाव जमा हो रहा है। अध्ययन में कपलिंग का मान 0.8 से अधिक पाया गया। 
जीएनएसएस के आंकड़ों में सालाना लगभग 18 मिलीमीटर का ‘स्लिप डेफिसिट’ सामने आया। यह प्लेटों की गति और भ्रंश पर वास्तविक खिसकाव के बीच अंतर को दर्शाता है। शोधकर्ताओं ने भ्रंश के लगभग 115 किलोमीटर चौड़े हिस्से के अटके होने का अनुमान लगाया है। वहीं, रडार तस्वीरों के विश्लेषण में जमीन के कुछ हिस्सों में सालाना अधिकतम चार से छह मिलीमीटर का उठाव दर्ज किया गया।
इन निष्कर्षों को समझते समय सौ वर्ष की अवधि का अर्थ स्पष्ट रखना जरूरी है। अध्ययन यह नहीं कहता कि उत्तराखंड में प्रत्येक सौ वर्ष बाद अनिवार्य रूप से 8.1 परिमाण का भूकंप आएगा। यह तुलना बताती है कि मापी गई दर से एक सदी में जमा होने वाला तनाव कितने बड़े भूकंप के समतुल्य हो सकता है। वास्तविक भूकंप में कितना हिस्सा टूटेगा और संचित तनाव किस तरह मुक्त होगा, यह इस आंकड़े से निश्चित नहीं होता। 
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