ममता को झटका, मदन मित्रा बागी गुट में शामिल

Update: 2026-07-15 10:35 GMT

कोलकाता : तृणमूल कांग्रेस (TMC) प्रमुख ममता बनर्जी को पार्टी के भीतर से एक बड़ा राजनीतिक झटका लगा है। पार्टी के वरिष्ठ नेता और कमरहाटी विधानसभा सीट से जुड़े मदन मित्रा ने बुधवार को रीताब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले बागी समूह में शामिल होने का ऐलान कर दिया। उनके इस कदम से तृणमूल कांग्रेस के अंदर चल रही खींचतान और गहरी होती नजर आ रही है।

मदन मित्रा के इस फैसले को पार्टी नेतृत्व के लिए एक बड़ी चुनौती माना जा रहा है। उन्होंने पार्टी की मौजूदा स्थिति पर सवाल उठाते हुए कहा कि तृणमूल कांग्रेस अब पहले जैसी संगठित पार्टी नहीं रह गई है। उन्होंने आरोप लगाया कि पार्टी धीरे-धीरे एक "टुकड़ा-टुकड़ा संगठन" बनती जा रही है।

मित्रा का यह बयान ऐसे समय आया है, जब पश्चिम बंगाल की राजनीति में 2026 विधानसभा चुनाव को लेकर गतिविधियां तेज हो रही हैं। पार्टी के भीतर असंतोष की आवाजें सामने आने से टीएमसी नेतृत्व के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं।



मदन मित्रा तृणमूल कांग्रेस के पुराने और प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते हैं। वह लंबे समय से ममता बनर्जी के करीबी नेताओं में शामिल रहे हैं और राज्य की राजनीति में उनकी सक्रिय भूमिका रही है। ऐसे में उनका बागी गुट के साथ जाना पार्टी के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

रीताब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले समूह में शामिल होने का ऐलान करते हुए मित्रा ने पार्टी की कार्यशैली और नेतृत्व को लेकर असंतोष जाहिर किया। उन्होंने कहा कि संगठन में पहले जैसी एकजुटता नहीं बची है और कई नेता व कार्यकर्ता मौजूदा व्यवस्था से नाराज हैं।

हालांकि, तृणमूल कांग्रेस की ओर से अभी तक मदन मित्रा के बयान और उनके फैसले पर कोई बड़ा आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। लेकिन राजनीतिक जानकारों का मानना है कि पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का इस तरह अलग रुख अपनाना चुनावी रणनीति पर असर डाल सकता है।

पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस लंबे समय से मजबूत स्थिति में रही है। ममता बनर्जी के नेतृत्व में पार्टी ने राज्य में कई चुनावों में सफलता हासिल की है। हालांकि, समय-समय पर पार्टी के भीतर नेताओं के बीच मतभेद और गुटबाजी की खबरें सामने आती रही हैं।

मदन मित्रा का बागी गुट में शामिल होना इसी अंदरूनी असंतोष का एक नया उदाहरण माना जा रहा है। राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, चुनाव से पहले पार्टी के भीतर मतभेद बढ़ना किसी भी संगठन के लिए चुनौती बन सकता है।

रीताब्रत बनर्जी पहले भी पार्टी की गतिविधियों और नेतृत्व को लेकर अलग राय रखते रहे हैं। अब मदन मित्रा के उनके साथ आने से इस समूह को राजनीतिक मजबूती मिलने की संभावना जताई जा रही है।

मित्रा ने अपने बयान में संगठन की मौजूदा स्थिति पर चिंता जताई और कहा कि पार्टी के कई हिस्सों में असंतोष मौजूद है। उनका कहना है कि कार्यकर्ताओं और नेताओं की आवाज को पर्याप्त महत्व नहीं मिल रहा है।

दूसरी ओर, ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी के लिए सबसे बड़ी चुनौती आने वाले विधानसभा चुनाव से पहले संगठन को मजबूत बनाए रखना होगी। पार्टी को न केवल विपक्षी दलों से मुकाबला करना है, बल्कि अंदरूनी मतभेदों को भी संभालना होगा।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि पश्चिम बंगाल की राजनीति में छोटे-छोटे घटनाक्रम भी बड़े प्रभाव डाल सकते हैं। ऐसे में मदन मित्रा का फैसला आने वाले दिनों में टीएमसी की रणनीति और संगठनात्मक फैसलों को प्रभावित कर सकता है।

फिलहाल सभी की नजरें इस बात पर हैं कि तृणमूल कांग्रेस इस अंदरूनी संकट से कैसे निपटती है और क्या पार्टी नेतृत्व नाराज नेताओं को वापस साथ लाने में सफल होता है या नहीं। आने वाले महीनों में पश्चिम बंगाल की राजनीति में और भी बदलाव देखने को मिल सकते हैं।

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