एनिमेटेड फिल्म विवाद खत्म, SC ने रचनात्मकता के पक्ष में सुनाया फैसला

Update: 2026-07-29 12:33 GMT

भारत: सुप्रीम कोर्ट ने भगवान जगन्नाथ पर आधारित एनिमेटेड फिल्म "महाप्रभु जगन्नाथ" की रिलीज को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने ओडिशा सरकार की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें फिल्म की रिलीज को लेकर पहले दिए गए आदेश में बदलाव की मांग की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि कला, संस्कृति और रचनात्मकता को केवल इस आधार पर सीमित नहीं किया जा सकता कि कुछ लोग किसी धार्मिक चित्रण को लेकर संवेदनशील महसूस कर रहे हैं।

जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि एनिमेशन बच्चों को जोड़ने और उन्हें सांस्कृतिक कहानियों से परिचित कराने का एक रचनात्मक माध्यम है। अदालत ने कहा कि धार्मिक और सांस्कृतिक कथाएं सदियों से अलग-अलग माध्यमों में प्रस्तुत की जाती रही हैं और हर प्रस्तुति को रोकना उचित नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने पहले के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसमें रथ यात्रा के उत्सवों के बाद फिल्म रिलीज करने की अनुमति दी गई थी। अदालत ने कहा कि वह किसी फिल्म के कलात्मक पहलुओं या रचनात्मक फैसलों का मूल्यांकन नहीं कर सकती। अगर किसी हिस्से को लेकर कोई आपत्ति है तो यह निर्माता और निर्देशक के स्तर पर तय किया जाना चाहिए।

सुनवाई के दौरान जस्टिस बीवी नागरत्ना ने टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर इस तरह की संवेदनशीलता के आधार पर लगातार याचिकाएं आने लगेंगी तो अदालतों को हर धार्मिक और सांस्कृतिक प्रस्तुति को लेकर आदेश देने पड़ेंगे। उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में देवी-देवताओं से जुड़ी कहानियों और कला के अन्य रूपों पर भी असर पड़ सकता है।

ओडिशा सरकार की ओर से पेश महाधिवक्ता पीताम्बर आचार्य ने अदालत को बताया कि राज्य सरकार और श्री जगन्नाथ मंदिर प्रशासन ने फिल्म के कुछ पहलुओं पर आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा कि फिल्म को लेकर धार्मिक नेताओं, मंदिर प्रतिनिधियों, सरकारी अधिकारियों और तकनीकी विशेषज्ञों के लिए विशेष स्क्रीनिंग भी आयोजित की गई थी।

सरकार की ओर से दलील दी गई कि फिल्म में भगवान जगन्नाथ के एनिमेटेड चित्रण और धार्मिक मान्यताओं के बीच कुछ अंतर को लेकर चिंताएं हैं। हालांकि, महाधिवक्ता ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार फिल्म की रिलीज के पूरी तरह खिलाफ नहीं है, बल्कि संबंधित कानून के तहत समीक्षा का अवसर चाहती है।

फिल्म निर्माताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता देवदत्त कामत ने अदालत में कहा कि फिल्म में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे अपमानजनक माना जाए। उन्होंने मंदिर समिति की बैठक के रिकॉर्ड का भी उल्लेख किया, जिसमें फिल्म को एक सराहनीय प्रयास बताया गया था।

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर फिल्म निर्माता को लगता है कि किसी हिस्से में बदलाव की जरूरत है तो वह अपनी इच्छा से निर्णय ले सकते हैं। अदालत किसी रचनात्मक कार्य में हस्तक्षेप नहीं कर सकती। जस्टिस महादेवन ने भी सुझाव दिया कि यदि कोई वास्तविक चिंता सामने आती है तो निर्माता उस पर विचार कर सकते हैं।

अदालत ने अंत में ओडिशा सरकार की याचिका को खारिज करते हुए कहा कि वह पहले दिए गए आदेश में संशोधन करने के पक्ष में नहीं है। इस फैसले के बाद अब "महाप्रभु जगन्नाथ" एनिमेटेड फिल्म की रिलीज का रास्ता साफ हो गया है।

इस फैसले को कला और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने यह स्पष्ट किया है कि धार्मिक और सांस्कृतिक विषयों पर आधारित रचनात्मक कार्यों को केवल भावनात्मक आपत्तियों के आधार पर नहीं रोका जा सकता। हालांकि, साथ ही अदालत ने यह भी संकेत दिया कि धार्मिक भावनाओं का सम्मान और रचनात्मक स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है।

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