बीजिंग। चीन और ताइवान के बीच लंबे समय से जारी राजनीतिक तथा कूटनीतिक विवाद अब नए मोड़ पर पहुंच गया है। चीन ने ताइवान के साथ औपचारिक राजनयिक संबंध बनाए रखने वाले देशों के अधिकारियों के खिलाफ लक्षित प्रतिबंध लगाने की रणनीति अपनाई है। हाल ही में पैराग्वे और बेलीज के दो वरिष्ठ मंत्रियों पर लगाए गए प्रतिबंधों को इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। इन कदमों का उद्देश्य ताइवान के अंतरराष्ट्रीय संबंधों को सीमित करना और उसके सहयोगी देशों पर दबाव बढ़ाना बताया जा रहा है।एक रिपोर्ट के अनुसार, चीन की कम्युनिस्ट पार्टी अब केवल आर्थिक और राजनयिक दबाव तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि ताइवान का समर्थन करने वाले विदेशी अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से प्रतिबंधों के दायरे में ला रही है।
पैराग्वे और बेलीज के दो मंत्रियों पर लगाया प्रतिबंध
चीन ने 12 अक्टूबर 2026 को पैराग्वे के सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी मंत्री गुस्तावो विलाटे और बेलीज के विदेश मंत्री फ्रांसिस फोंसेका के खिलाफ प्रतिबंधों की घोषणा की।दोनों देशों ने ताइवान के साथ अपने औपचारिक राजनयिक संबंध बनाए रखे हैं। चीन ने दोनों मंत्रियों पर अपने राष्ट्रीय हितों को नुकसान पहुंचाने और ताइवान समर्थक गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगाया है।प्रतिबंधों के तहत दोनों अधिकारियों की चीन में मौजूद संपत्तियों को फ्रीज करने, चीनी कंपनियों और नागरिकों को उनके साथ कारोबारी सहयोग करने से रोकने तथा मुख्य भूमि चीन, हांगकांग और मकाऊ में प्रवेश पर प्रतिबंध लगाने का प्रावधान किया गया है।
व्यक्तिगत प्रतिबंधों से दबाव बनाने की रणनीति
द एपोच टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, चीन की यह कार्रवाई उसकी कूटनीतिक रणनीति में बदलाव का संकेत देती है। पहले बीजिंग ताइवान के सहयोगी देशों पर राजनीतिक और आर्थिक दबाव डालता रहा है, लेकिन अब वह संबंधित सरकारों के मंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से निशाना बना रहा है।ताइपे विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर ग्लोबल स्ट्रेटेजी एंड डेमोक्रेटिक रेजिलिएंस के निदेशक हंग पु-चाओ के अनुसार, चीन विदेशी सरकारों के नीतिगत फैसलों को संबंधित अधिकारियों के लिए व्यक्तिगत कानूनी जोखिम में बदलने की कोशिश कर रहा है।उनका मानना है कि इस तरह के प्रतिबंधों का तत्काल आर्थिक प्रभाव सीमित हो सकता है, लेकिन इसका राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है।
ताइवान के केवल 12 औपचारिक राजनयिक सहयोगी
ताइवान वर्तमान में 12 देशों के साथ औपचारिक राजनयिक संबंध बनाए हुए है। इनमें अधिकतर देश प्रशांत क्षेत्र, लैटिन अमेरिका और कैरेबियाई क्षेत्र में स्थित हैं।चीन ताइवान को अपने क्षेत्र का हिस्सा मानता है और अलग देश के रूप में उसकी अंतरराष्ट्रीय मान्यता का विरोध करता है। दूसरी ओर, ताइवान की निर्वाचित सरकार अपनी स्वशासी व्यवस्था और लोकतांत्रिक संस्थाओं का हवाला देते हुए चीन के दावों को खारिज करती है।पिछले कुछ वर्षों में होंडुरास और नाउरू जैसे देशों ने ताइवान से औपचारिक संबंध समाप्त कर चीन के साथ राजनयिक संबंध स्थापित किए हैं। इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ताइवान के औपचारिक सहयोगियों की संख्या कम हुई है।
चीन ने प्रतिबंधों को बताया राष्ट्रीय हितों की रक्षा का कदम
चीन के विदेश मंत्रालय ने अपनी कार्रवाई का बचाव करते हुए कहा कि प्रतिबंध राष्ट्रीय संप्रभुता, सुरक्षा और विकास संबंधी हितों की रक्षा के लिए लगाए गए हैं।चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने दोनों अधिकारियों पर ताइवान की स्वतंत्रता समर्थक गतिविधियों को बढ़ावा देने और चीन के खिलाफ गलत सूचनाएं फैलाने का आरोप लगाया।बीजिंग का कहना है कि ताइवान का मुद्दा उसका आंतरिक मामला है और विदेशी सरकारों को इसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
ताइवान ने चीन की कार्रवाई की आलोचना की
ताइवान के विदेश मंत्रालय ने इन प्रतिबंधों की निंदा करते हुए इसे अन्य देशों की संप्रभुता और स्वतंत्र विदेश नीति में हस्तक्षेप बताया।ताइवान ने कहा कि किसी देश को अपने राजनयिक संबंधों का निर्धारण करने का अधिकार है और बाहरी दबाव के माध्यम से इस निर्णय को प्रभावित करने की कोशिश उचित नहीं है।अमेरिका ने भी चीन की कार्रवाई पर आपत्ति जताई है। अमेरिकी विदेश विभाग ने कहा कि वह देशों के स्वतंत्र और संप्रभु फैसलों के खिलाफ दबाव तथा धमकी की रणनीति का विरोध करता है।
कूटनीतिक संबंधों पर पड़ सकता है असर
विश्लेषकों के अनुसार, व्यक्तिगत प्रतिबंध लगाकर चीन ताइवान समर्थक देशों के अधिकारियों को भविष्य के फैसलों को लेकर सतर्क करने का प्रयास कर सकता है।हालांकि, दोनों मंत्रियों की चीन में आर्थिक गतिविधियां सीमित होने के कारण इन प्रतिबंधों का प्रत्यक्ष प्रभाव भी सीमित रहने की संभावना जताई गई है।इस घटनाक्रम ने चीन और ताइवान के बीच कूटनीतिक प्रतिस्पर्धा को फिर अंतरराष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में ला दिया है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या ऐसे प्रतिबंध ताइवान के सहयोगी देशों की नीतियों को प्रभावित करते हैं या वे अपने मौजूदा राजनयिक संबंध बनाए रखते हैं।