Pakistan में आटे का संकट गहराया, कीमतों पर विवाद

Update: 2026-07-10 12:50 GMT

Karachi : 'द एक्सप्रेस ट्रिब्यून' की रिपोर्ट के अनुसार, सरकार द्वारा तय आटे की कीमतों और बाज़ार में चल रही कीमतों के बीच बढ़ते अंतर ने कराची में आटे की संभावित सप्लाई की कमी को लेकर चिंता बढ़ा दी है। इससे पाकिस्तान के कीमत नियंत्रण सिस्टम में बढ़ती कमियां भी उजागर हुई हैं।

'द एक्सप्रेस ट्रिब्यून' के मुताबिक, कराची प्रशासन ने रिटेल कीमतों में बदलाव की घोषणा की है, जिसमें सामान्य आटे की कीमत PKR 125 प्रति किलोग्राम, महीन आटे की कीमत PKR 135 प्रति किलोग्राम और चक्की के आटे की कीमत PKR 145 प्रति किलोग्राम तय की गई है।

नोटिफिकेशन में सामान्य आटे की थोक कीमत PKR 122 प्रति किलोग्राम और महीन आटे की कीमत PKR 132 प्रति किलोग्राम तय की गई है, जबकि चक्की के आटे की कीमत PKR 145 प्रति किलोग्राम ही रखी गई है।

हालांकि, इंडस्ट्री के प्रतिनिधियों ने इन आधिकारिक दरों को खारिज कर दिया है। उनका तर्क है कि ये दरें गेहूं की लागत में हुई भारी बढ़ोतरी को नहीं दर्शाती हैं।

सरकार के नोटिफिकेशन के बावजूद, कराची में आटा काफी ऊंची कीमतों पर बिक रहा है। खबरों के अनुसार, सामान्य आटा PKR 145 से PKR 150 प्रति किलोग्राम के बीच बिक रहा है, जबकि महीन आटा PKR 160 से PKR 170 प्रति किलोग्राम की रेंज में मिल रहा है।

चक्की का आटा भी लगभग PKR 160 प्रति किलोग्राम के भाव पर बिक रहा है, जो आधिकारिक तौर पर तय कीमतों और बाज़ार की असल स्थितियों के बीच बढ़ते अंतर को दिखाता है।

इंडस्ट्री से जुड़े लोगों ने चेतावनी दी है कि अगर अधिकारी कीमत तय करने की पॉलिसी में बदलाव नहीं करते हैं, तो इस अंतर के कारण आटे की सप्लाई में रुकावट आ सकती है।

'द एक्सप्रेस ट्रिब्यून' के अनुसार, आटा मिल मालिकों और चक्की मालिकों का तर्क है कि सरकार द्वारा तय मौजूदा दरें आर्थिक रूप से टिकाऊ नहीं हैं, क्योंकि खुले बाज़ार में गेहूं की कीमतें काफी बढ़ गई हैं, जिससे उत्पादक अपनी उत्पादन लागत भी वसूल नहीं पा रहे हैं।

फ्लोर मिल्स एसोसिएशन के चेयरमैन जुनैद अज़ीज़ ने कहा कि मिल मालिकों ने सिंध खाद्य विभाग को पहले ही बता दिया था कि वे बाज़ार में चल रही कीमतों पर गेहूं खरीदकर सरकार द्वारा तय दरों पर आटा नहीं बेच सकते।

उन्होंने बताया कि खुले बाज़ार में गेहूं की कीमतें बढ़कर लगभग PKR 116 प्रति किलोग्राम हो गई हैं और उनमें उतार-चढ़ाव जारी है, जिससे मौजूदा कीमत ढांचे के तहत मिलों का संचालन करना मुश्किल होता जा रहा है।

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