वॉशिंगटन: अमेरिका और ईरान के बीच चल रहा भू-राजनीतिक (Geopolitical) तनाव अब सिर्फ पारंपरिक हथियारों, मिसाइलों या सैन्य घेराबंदी तक सीमित नहीं रह गया है। आधुनिक युग का यह टकराव अब एक बेहद खतरनाक डिजिटल और साइबर युद्ध (Cyber Warfare) में तब्दील हो चुका है, जहां अदृश्य हथियारों और अत्याधुनिक तकनीकों का भरपूर इस्तेमाल किया जा रहा है। हाल ही में सामने आई एक चौंकाने वाली वैश्विक रिपोर्ट के अनुसार, ईरानी हैकर्स ने मिडिल ईस्ट (मध्य पूर्व) में तैनात अमेरिकी सैनिकों और सुरक्षा कॉन्ट्रैक्टर्स की जासूसी करने के लिए एक बेहद सटीक और एडवांस डिजिटल तरीका खोज निकाला है। ईरान ने इस पूरे क्षेत्र में मौजूद पुराने टेलीकॉम इंफ्रास्ट्रक्चर की तकनीकी खामियों का फायदा उठाकर अमेरिकी सैन्य कर्मियों के स्मार्टफोन को सफलतापूर्वक ट्रैक किया है, जिससे वाशिंगटन के सुरक्षा गलियारों में हड़कंप मच गया है।
SS7 पिंग और पुराने इंफ्रास्ट्रक्चर का उठाया फायदा
इस पूरे डिजिटल हमले की तकनीकी पड़ताल करने पर एक बेहद गंभीर सुरक्षा चूक सामने आई है। मोबाइल जासूसी और सर्विलांस नेटवर्क पर शोध करने वाली एक अंतरराष्ट्रीय संस्था 'मोबाइल सर्विलांस मॉनिटर' (Mobile Surveillance Monitor) ने इस बात का खुलासा किया है। शोधकर्ताओं ने पाया कि पिछले कुछ समय से मिडिल ईस्ट के स्थानीय टेलीकॉम नेटवर्कों को असामान्य रूप से ऐसे हजारों डिजिटल अनुरोध (Requests) मिल रहे थे, जिनका सीधा संबंध 'SS7 पिंग' (Signaling System No. 7) तकनीक से था।
दरअसल, जब कोई अमेरिकी सैनिक या अधिकारी अपने होम नेटवर्क (अमेरिका) से बाहर निकलकर मिडिल ईस्ट के देशों में जाता है, तो उसका फोन वहां के स्थानीय नेटवर्क के साथ 'डेटा रोमिंग' समझौतों के तहत जुड़ जाता है। मध्य पूर्व के देशों में आज भी दशकों पुराना और असुरक्षित टेलीकॉम इंफ्रास्ट्रक्चर काम कर रहा है। ईरानी हैकर्स ने इसी पुराने सिस्टम की बुनियादी कमजोरियों को निशाना बनाया। उन्होंने SS7 पिंग के जरिए ऐसे विशिष्ट फोन नंबरों की लोकेशन का पता लगाने के लिए सिग्नल भेजे, जो अमेरिकी सेना से जुड़े हुए थे। इस तकनीक के जरिए हैकर्स को बिना फोन हैक किए या उसमें कोई वायरस डाले, केवल नेटवर्क की कमजोरी का इस्तेमाल करके सैनिक की सटीक लोकेशन मिल जाती है।
वैश्विक सुरक्षा और गोपनीयता पर खड़े हुए बड़े सवाल
इस साइबर हमले के टाइमिंग ने अमेरिकी रक्षा मुख्यालय पेंटागन (Pentagon) की चिंताएं और अधिक बढ़ा दी हैं। यह पूरी जासूसी उस दौर में की गई जब अमेरिका और ईरान के बीच खाड़ी क्षेत्र (Gulf Region) में सैन्य और रणनीतिक संघर्ष अपने चरम पर था। जब कोई सैनिक मोर्चे पर तैनात होता है, तो उसकी वास्तविक स्थिति (Real-time Location) का उजागर होना उसकी जान के साथ-साथ पूरे सैन्य ऑपरेशन को खतरे में डाल सकता है। इस लीक हुए डेटा के जरिए यह आसानी से पता लगाया जा सकता है कि अमेरिकी सैनिक किस बेस पर तैनात हैं, उनकी मूवमेंट क्या है और वे कब किस मिशन पर निकल रहे हैं।
इस खुलासे के बाद अमेरिकी साइबर सुरक्षा एजेंसियों ने मिडिल ईस्ट में तैनात अपने सभी अधिकारियों, सैनिकों और निजी कॉन्ट्रैक्टर्स के लिए एक सख्त एडवायजरी जारी की है। उन्हें ड्यूटी के दौरान व्यक्तिगत मोबाइल फोन का इस्तेमाल बेहद सीमित करने या पूरी तरह बंद रखने के निर्देश दिए गए हैं। इसके साथ ही, टेलीकॉम कंपनियों के साथ मिलकर इस अंतरराष्ट्रीय रोमिंग लूपहोल (खामी) को ठीक करने के प्रयास किए जा रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह घटना इस बात का बड़ा उदाहरण है कि कैसे तकनीकी रूप से पिछड़े देशों के मोबाइल नेटवर्क आज के समय में दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति की सेना के लिए सबसे कमजोर कड़ी (Weakest Link) साबित हो सकते हैं।