वाशिंगटन: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने रूस और रूसी ऊर्जा के प्रमुख खरीदारों को निशाना बनाने वाले नए प्रतिबंधों और शुल्कों (टैरिफ) को रोकने के अपने फैसले का बचाव किया। उन्होंने कहा कि वह यूक्रेन युद्ध को खत्म करने के लिए चल रही बातचीत को कमजोर नहीं करना चाहते।
राष्ट्रपति का यह स्पष्टीकरण उस कार्यकारी आदेश (एग्जीक्यूटिव ऑर्डर) पर हस्ताक्षर करने के दो दिन बाद आया है, जिसके तहत 'लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शिनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026' के प्रमुख प्रावधानों में छूट दी गई है। इसमें वे अतिरिक्त शुल्क भी शामिल हैं, जिनका असर भारत पर पड़ सकता था, क्योंकि भारत रूस से तेल खरीदता है।
ट्रम्प ने कहा कि उनका प्रशासन बातचीत के जरिए समाधान निकालने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। उन्होंने संकेत दिया कि इस चरण में नए आर्थिक प्रतिबंध लगाने से रूस बातचीत की मेज से दूर जा सकता है।
ट्रम्प ने 'ट्रुथ सोशल' पर लिखा, "मैं रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध में शांति के लिए बातचीत कर रहा हूँ, और मैं ऐसा कुछ नहीं करना चाहता जिससे रूस मूर्खतापूर्ण तरीके से बातचीत की मेज से दूर चला जाए।"
राष्ट्रपति ने अपने इस फैसले को ईरान और वैश्विक ऊर्जा बाजारों से जुड़े घटनाक्रमों से भी जोड़ा।
उन्होंने तर्क दिया कि रूस, ईरान को उतनी मदद नहीं दे रहा है जितनी वह दे सकता था, और वह इस स्थिति को बनाए रखना चाहते हैं। उन्होंने रूसी डीजल रिफाइनरियों पर यूक्रेन के हमलों की भी आलोचना की और कहा कि ईंधन की आपूर्ति में बाधा आने से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उपभोक्ताओं और व्यवसायों पर असर पड़ रहा है।
शुक्रवार को हस्ताक्षरित कार्यकारी आदेश के तहत, प्रशासन ने कुछ रूसी सामानों पर 500 प्रतिशत और रूसी कच्चे तेल व प्राकृतिक गैस के पांच सबसे बड़े आयातकों के सामानों पर 100 प्रतिशत शुल्क लगाने का प्रावधान किया था (जो कुछ कानूनी शर्तों के अधीन है)।
हालाँकि, उसी आदेश में इन अतिरिक्त शुल्कों और नए प्रतिबंधों के अधिकांश प्रावधानों को लागू करने से छूट दे दी गई।
इस छूट का मतलब यह नहीं है कि रूस के खिलाफ पहले से लागू अमेरिकी प्रतिबंध हटा दिए गए हैं।
भारत के लिए यह फैसला महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस कानून के तहत रूसी ऊर्जा के प्रमुख खरीदारों पर अतिरिक्त अमेरिकी शुल्क लग सकते थे। इस छूट का अर्थ है कि फिलहाल इस आदेश के तहत ये नए शुल्क लागू नहीं किए जा रहे हैं।
विदेश मंत्री (सेक्रेटरी ऑफ स्टेट) मार्को रुबियो ने शनिवार को कहा कि प्रशासन को प्रतिबंध और शुल्क लगाने के व्यापक आर्थिक परिणामों का आकलन करने के लिए समय चाहिए।
रुबियो ने विशेष रूप से भारत का जिक्र उन देशों में किया, जिन पर इस कानून का असर पड़ सकता है। उन्होंने संकेत दिया कि ट्रम्प अगला कदम तय करने से पहले, वैश्विक अर्थव्यवस्था और अमेरिका पर पड़ने वाले प्रभावों पर विचार करने के लिए 60 दिनों तक का समय लेना चाहते हैं।
इसमें यह प्रावधान है कि ये छूट तब तक लागू रहेगी, जब तक कि राष्ट्रपति या विदेश मंत्री, आवश्यक परामर्श के बाद, यह तय न कर लें कि आगे क्या कदम उठाना उचित होगा।
इस फैसले की उन सांसदों ने आलोचना की है जो मॉस्को पर और अधिक आर्थिक दबाव डालने के पक्ष में हैं।
कई रिपब्लिकन और डेमोक्रेट्स ने सवाल उठाया है कि क्या प्रतिबंधों को निलंबित करने से रूस पर वाशिंगटन का प्रभाव कमजोर हो जाएगा, खासकर ऐसे समय में जब यूक्रेन में संघर्ष जारी है।
व्हाइट हाउस ने इस छूट का बचाव करते हुए कहा है कि यह बातचीत के जरिए शांति समझौता कराने के प्रयासों के अनुरूप है।
ट्रम्प की हालिया टिप्पणियों से यह भी पता चलता है कि युद्ध के संचालन और इसके आर्थिक परिणामों को लेकर यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की के साथ उनके मतभेद हैं।
18 सितंबर को कानून के रूप में लागू 'ग्राहम एक्ट' का उद्देश्य प्रतिबंधों, पाबंदियों और शुल्कों के जरिए रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाना था। इसमें वे उपाय भी शामिल हैं, जिनका असर रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर पड़ता है। इस कानून के तहत राष्ट्रपति को यह अधिकार भी दिया गया है कि वे कांग्रेस को यह प्रमाणित करने के बाद कि ऐसा करना अमेरिका के राष्ट्रीय हितों में है, कुछ विशिष्ट प्रावधानों में छूट दे सकते हैं।
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