वोलैटिलिटी में निवेश से पहले एक्सपर्ट की सलाह

Update: 2026-07-28 12:14 GMT

नई दिल्ली। शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव यानी वोलैटिलिटी निवेशकों के लिए हमेशा चिंता का कारण बनता है। खासकर रिटेल निवेशक बाजार में गिरावट देखकर अक्सर घबरा जाते हैं और जल्दबाजी में अपने निवेश को बेचने का फैसला कर लेते हैं। हालांकि, बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि वोलैटिलिटी को डर के बजाय अवसर के रूप में देखना चाहिए। सही रणनीति, एसेट एलोकेशन और डायवर्सिफिकेशन के जरिए निवेशक बाजार की गिरावट का फायदा उठाकर लंबे समय में बेहतर रिटर्न हासिल कर सकते हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार इक्विटी मार्केट में उतार-चढ़ाव सामान्य प्रक्रिया है। कोई भी एसेट क्लास चाहे वह शेयर बाजार हो, सोना हो, चांदी हो या रियल एस्टेट, किसी न किसी घटना के कारण प्रभावित होता है। इसलिए निवेशकों को यह मानसिकता नहीं रखनी चाहिए कि बाजार में पूरी स्थिरता आने के बाद ही निवेश किया जाएगा। बेहतर रणनीति यह है कि अपने वित्तीय लक्ष्य और निवेश योजना के अनुसार बाजार में बने रहें।

Durbeen Fintech LLP के मैनेजिंग पार्टनर राजन वाधवान के अनुसार, बाजार में संकट और उतार-चढ़ाव आते रहेंगे। निवेशकों को हर गिरावट को खतरे के रूप में नहीं देखना चाहिए, बल्कि इसे लॉन्ग टर्म निवेश के अवसर के तौर पर समझना चाहिए। उनका कहना है कि बाजार में सही समय का इंतजार करने के बजाय अनुशासित तरीके से निवेश जारी रखना ज्यादा फायदेमंद हो सकता है।

इतिहास भी बताता है कि शेयर बाजार में गिरावट स्थायी नहीं होती। भारतीय इक्विटी बाजार ने कई बड़े संकटों का सामना किया है। साल 2000 का डॉट कॉम संकट, 2008 का ग्लोबल फाइनेंशियल क्राइसिस और कोरोना महामारी के दौरान आई भारी गिरावट इसके उदाहरण हैं। इन सभी मौकों पर बाजार में तेज गिरावट देखने को मिली, लेकिन समय के साथ बाजार ने दोबारा रिकवरी की और लंबे समय तक निवेश करने वाले निवेशकों को फायदा मिला।

विशेषज्ञों का कहना है कि निवेशकों को सामान्य गिरावट और बड़े संकट के बीच अंतर समझना जरूरी है। कई बार बाजार में मुनाफावसूली या सामान्य आर्थिक बदलाव के कारण गिरावट आती है, जिसे हेल्दी करेक्शन कहा जाता है। यह गिरावट लंबे समय तक नहीं रहती और बाजार दोबारा मजबूती पकड़ सकता है। वहीं, जब घरेलू और वैश्विक स्तर पर आर्थिक स्थिति कमजोर होती है, तब गिरावट ज्यादा लंबी हो सकती है और यह क्रैश का रूप ले सकती है।

बाजार में निवेश करते समय सबसे महत्वपूर्ण चीज एसेट एलोकेशन और डायवर्सिफिकेशन है। विशेषज्ञों के अनुसार, पूरा पैसा किसी एक सेक्टर या एक ही तरह के निवेश में लगाना जोखिम बढ़ा सकता है। अगर निवेश को अलग-अलग एसेट क्लास में बांटा जाए तो बाजार की गिरावट के दौरान नुकसान को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।

राजन वाधवान के मुताबिक, एसेट एलोकेशन एक तरह का रिस्क मैनेजमेंट है। इससे निवेशक बाजार की गिरावट के समय ज्यादा सुरक्षित स्थिति में रहते हैं। उदाहरण के तौर पर अगर किसी निवेशक के पोर्टफोलियो में विविधता है तो बाजार गिरने पर उसका नुकसान सीमित रह सकता है और रिकवरी के समय उसे फायदा मिलने की संभावना बढ़ जाती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि रिटेल निवेशकों को बाजार की छोटी अवधि की हलचल से प्रभावित होने के बजाय अपने लंबी अवधि के लक्ष्यों पर ध्यान देना चाहिए। निवेश करने से पहले अपनी जोखिम क्षमता को समझना चाहिए और जरूरत के अनुसार निवेश योजना बनानी चाहिए।

हालांकि, निवेशकों को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि शेयर बाजार में निवेश जोखिमों के अधीन होता है। किसी भी निवेश निर्णय से पहले वित्तीय सलाहकार की सलाह लेना बेहतर होता है। बाजार की गिरावट को समझदारी से इस्तेमाल करने वाले निवेशक लंबे समय में बेहतर अवसर हासिल कर सकते हैं।

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