रेप पीड़िता की गरिमा और अधिकारों पर हाईकोर्ट का जोर, इलाज का खर्च उठाएगी सरकार
दिल्ली : दिल्ली हाईकोर्ट ने 16 साल की एक नाबालिग रेप पीड़िता को 31 हफ्ते की प्रेग्नेंसी खत्म करने की अनुमति दी है। कोर्ट ने कहा कि इतनी कम उम्र की लड़की से बच्चे को जन्म देने और उसकी परवरिश की जिम्मेदारी उठाने की उम्मीद करना उचित नहीं होगा। अदालत ने इस मामले को केवल गर्भसमापन के अधिकार तक सीमित नहीं माना, बल्कि इसे पीड़िता के सम्मान और मानवाधिकार से भी जुड़ा विषय बताया।
कोर्ट के मुताबिक, किसी नाबालिग को ऐसी गर्भावस्था जारी रखने के लिए मजबूर करना उसके सम्मानजनक जीवन पर असर डाल सकता है। अदालत ने अस्पताल और राज्य सरकार को गर्भसमापन से जुड़ी चिकित्सा प्रक्रिया के दौरान कुछ जरूरी सावधानियां बरतने के निर्देश भी दिए हैं।
DNA परीक्षण के लिए...
पीड़िता पहले से लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में भर्ती है। हाईकोर्ट ने डॉक्टरों को निर्देश दिया कि प्रक्रिया के दौरान प्राप्त भ्रूण के टिश्यू सुरक्षित रखे जाएं। जरूरत पड़ने पर आपराधिक मामले की जांच में DNA परीक्षण के लिए इनका इस्तेमाल किया जा सकेगा।
यह निर्देश मामले में सबूतों को सुरक्षित रखने के लिहाज से महत्वपूर्ण है। अदालत ने चिकित्सा प्रक्रिया के साथ-साथ आपराधिक जांच से जुड़ी जरूरतों का भी ध्यान रखने को कहा है।
अदालत ने निर्देश दिया कि गर्भसमापन के दौरान यदि शिशु जीवित पैदा होता है, तो अस्पताल उसकी हरसंभव चिकित्सा सहायता सुनिश्चित करे। इसके लिए मेडिकल सुपरिंटेंडेंट को आवश्यक इंतजाम करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। कोर्ट ने इलाज का पूरा खर्च राज्य सरकार को उठाने का आदेश भी दिया। गर्भावस्था के इस चरण में जन्म लेने वाले शिशु को विशेष चिकित्सा देखभाल की जरूरत हो सकती है, इसलिए अदालत ने पहले से उचित व्यवस्था करने पर जोर दिया।
हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रक्रिया के दौरान बच्चा जीवित पैदा होगा ही। अदालत का निर्देश ऐसी स्थिति के लिए है, जिसमें तत्काल चिकित्सा सहायता की जरूरत पड़ सकती है।
हाईकोर्ट ने कहा कि अगर नाबालिग...
हाईकोर्ट ने कहा कि अगर नाबालिग और उसका परिवार इच्छा जताते हैं, तो निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत बच्चे को गोद देने का विकल्प भी अपनाया जा सकता है। यह विकल्प परिवार की इच्छा और लागू नियमों के अनुसार ही आगे बढ़ेगा।
अदालत ने पीड़िता की पहचान पूरी तरह गोपनीय रखने का निर्देश दिया है। यौन अपराधों से जुड़े मामलों में पीड़ित की पहचान की सुरक्षा बेहद जरूरी होती है। खासकर नाबालिग के मामले में उसकी निजी जानकारी सार्वजनिक होने से बचाना महत्वपूर्ण है।
24 हफ्ते से अधिक की गर्भावस्था के मामलों में ....
भारत में मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) कानून के तहत गर्भसमापन की अनुमति गर्भावस्था की अवधि और मामले की परिस्थितियों पर निर्भर करती है। सामान्य तौर पर 20 हफ्ते तक निर्धारित कानूनी शर्तों के तहत गर्भसमापन कराया जा सकता है। कुछ विशेष श्रेणियों में, जिनमें रेप पीड़िताएं भी शामिल हो सकती हैं, 24 हफ्ते तक इसकी अनुमति का प्रावधान है।
कानून के तहत 24 हफ्ते से अधिक की गर्भावस्था में गर्भसमापन के मामलों में विशेष प्रावधान लागू होते हैं और अदालत की भूमिका अहम हो सकती है। ऐसे में 31 हफ्ते की गर्भावस्था में अनुमति देना सामान्य प्रक्रिया से अलग मामला है। हाईकोर्ट ने इस मामले में नाबालिग पीड़िता की उम्र, परिस्थितियों और सम्मानजनक जीवन के अधिकार से जुड़े पहलुओं पर विचार करते हुए फैसला सुनाया।
गर्भावस्था के 31वें हफ्ते तक भ्रूण का ...
गर्भावस्था के 31वें हफ्ते तक भ्रूण का काफी विकास हो चुका होता है। यदि इस अवधि में बच्चा जीवित पैदा होता है, तो उसके जीवित रहने की संभावना हो सकती है, लेकिन उसे सांस लेने, शरीर का तापमान बनाए रखने और दूसरी चिकित्सकीय जरूरतों के लिए नवजात गहन चिकित्सा इकाई यानी NICU में रखा जा सकता है।
हर मामले में स्थिति अलग होती है। शिशु की हालत और उपचार की जरूरत का आकलन डॉक्टर ही कर सकते हैं। इसी वजह से अदालत ने संभावित स्थिति में तुरंत चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है।
इस फैसले में हाईकोर्ट ने नाबालिग की गरिमा, स्वास्थ्य और गोपनीयता के साथ-साथ आपराधिक जांच तथा संभावित नवजात की चिकित्सा जरूरतों को भी ध्यान में रखा है।