नई दिल्ली। सरकारी शिक्षक भर्ती में पुरुष और महिला उम्मीदवारों के लिए अलग-अलग रिक्तियां निर्धारित करने और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को भर्ती प्रक्रिया में शामिल नहीं किए जाने के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार से जवाब मांगा है। शीर्ष अदालत ने दिल्ली अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड (DSSSB) की भर्ती प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए पूछा है कि आखिर किस कानूनी आधार पर पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग-अलग पदों की अधिसूचनाएं जारी की जाती हैं। साथ ही अदालत ने स्पष्ट करने को कहा है कि सरकारी नौकरियों में ट्रांसजेंडर उम्मीदवारों को किस तरह अवसर प्रदान किए जाएंगे।
सुप्रीम कोर्ट ने 15 दिन में मांगा जवाब
न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने 16 अक्टूबर 2026 को इस मामले में महत्वपूर्ण आदेश जारी किया थायह आदेश जेन कौशिक और प्रवीण सिंह की ओर से दायर याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान दिया गया।अदालत ने दिल्ली सरकार और संबंधित अधिकारियों को भर्ती नियमों तथा ट्रांसजेंडर उम्मीदवारों के अधिकारों से जुड़े सवालों का जवाब 15 दिनों के भीतर हलफनामे के माध्यम से दाखिल करने का निर्देश दिया है।पीठ ने कहा कि मामले का प्रमुख मुद्दा यह है कि सरकारी भर्ती अधिसूचनाओं में तीसरे लिंग के उम्मीदवारों को शामिल नहीं किया गया है।
पुरुष और महिलाओं के लिए अलग पद क्यों?
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने DSSSB की भर्ती प्रक्रिया के कानूनी आधार को लेकर कई सवाल उठाए।अदालत ने पूछा कि शिक्षक पदों के लिए जारी भर्ती अधिसूचनाएं किन नियमों के अंतर्गत आती हैं और इन नियमों का आधार संविधान, किसी कानून या सरकारी सेवा नियमों में कहां मौजूद है।पीठ ने यह भी जानना चाहा कि क्या संबंधित नियम पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग-अलग रिक्तियां निर्धारित करना अनिवार्य बनाते हैं।अगर नियमों में ऐसी कोई अनिवार्यता नहीं है, तो भर्ती प्रक्रिया में लिंग के आधार पर पदों का वर्गीकरण करने के पीछे क्या उद्देश्य है।अदालत ने सरकार से इस व्यवस्था का स्पष्ट औचित्य प्रस्तुत करने को कहा है।
ट्रांसजेंडर उम्मीदवारों को कैसे मिलेंगे अवसर?
सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी नौकरियों में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के समावेश पर विशेष ध्यान दिया।पीठ ने सवाल किया कि क्या दिल्ली सरकार और DSSSB भविष्य की भर्ती अधिसूचनाओं में तीसरे लिंग की श्रेणी शामिल करने की योजना बना रहे हैं।अदालत ने यह भी पूछा कि वर्तमान भर्ती व्यवस्था में ट्रांसजेंडर उम्मीदवारों को किस प्रकार अवसर उपलब्ध कराए जाएंगे।यह मामला सरकारी रोजगार में समान अवसर और भर्ती प्रक्रियाओं की समावेशिता से जुड़ा है।
याचिकाकर्ताओं ने आयु सीमा में छूट की मांग उठाई
याचिकाकर्ता जेन कौशिक ने शिक्षक भर्ती में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए अलग रिक्तियां जारी करने और न्यूनतम योग्यताओं तथा आयु सीमा में उचित छूट देने की मांग की थीउनकी ओर से कहा गया कि भर्ती प्रक्रियाओं में मौजूद बाधाओं के कारण ट्रांसजेंडर उम्मीदवारों को सरकारी रोजगार के अवसर प्राप्त करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।वहीं, प्रवीण सिंह की याचिका में भी आयु सीमा में छूट का मुद्दा उठाया गया।सुप्रीम कोर्ट ने यह जानना चाहा कि सामाजिक और आर्थिक भेदभाव की परिस्थितियों को देखते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने संबंधित सेवा नियमों के तहत आयु सीमा में छूट देने की अपनी शक्ति का उपयोग क्यों नहीं किया।
पहले भी अदालत ने दिया था महत्वपूर्ण निर्देश
इससे पहले 10 अप्रैल 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने जेन कौशिक को ट्रांसजेंडर श्रेणी के तहत शिक्षक पदों के लिए आवेदन करने की अनुमति दी थी।अदालत ने कहा था कि भर्ती अधिसूचना में किसी विशेष लिंग का उल्लेख होने के बावजूद उन्हें आवेदन करने से नहीं रोका जाना चाहिए।इसके बाद भी भर्ती अधिसूचनाओं में पुरुष और महिला श्रेणियों के आधार पर पद निर्धारित करने की व्यवस्था जारी रहने के कारण यह मुद्दा फिर अदालत के सामने आया।
दिल्ली सरकार को देना होगा विस्तृत हलफनामा
सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित पक्षों को सभी सवालों के जवाब हलफनामे में प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।इसके साथ ही सरकार द्वारा दाखिल जवाब याचिकाकर्ताओं को उपलब्ध कराया जाएगा, ताकि वे उस पर अपना पक्ष रख सकें।इस मामले की अगली सुनवाई 19 नवंबर 2026 को निर्धारित है।फिलहाल अदालत ने भर्ती नियमों की वैधता या ट्रांसजेंडर उम्मीदवारों के लिए अलग पद निर्धारित करने के मुद्दे पर अंतिम निर्णय नहीं दिया है।
सरकारी भर्तियों में समान अवसर का महत्वपूर्ण मामला
यह मामला सरकारी नौकरियों में लैंगिक समानता और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।सुप्रीम कोर्ट के सवालों के बाद दिल्ली सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि वर्तमान भर्ती नियम किस कानूनी व्यवस्था पर आधारित हैं और सभी पात्र उम्मीदवारों को समान अवसर देने के लिए क्या कदम उठाए जा सकते हैं।अब इस मामले में सरकार के हलफनामे और अगली सुनवाई पर निगाहें रहेंगी।
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