नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने गाजियाबाद पुलिस की ओर से पत्रकार अभिषेक उपाध्याय का विस्तृत डिजिटल डेटा हासिल करने के प्रयास पर कड़ी आपत्ति जताई है। बुधवार, 14 अक्टूबर 2026 को सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने कथित रोड रेज मामले में पुलिस द्वारा मांगी गई व्यक्तिगत और डिजिटल जानकारी को जरूरत से ज्यादा बताया। अदालत ने स्पष्ट किया कि पुलिस को आपराधिक मामलों की जांच करने का अधिकार है, लेकिन इस अधिकार का इस्तेमाल किसी व्यक्ति के निजी डिजिटल जीवन तक अनावश्यक पहुंच बनाने के लिए नहीं किया जा सकता। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने गाजियाबाद पुलिस की ओर से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स को जारी नोटिस रद्द कर दिया।
मामला पत्रकार अभिषेक उपाध्याय के खिलाफ गाजियाबाद के इंदिरापुरम थाने में दर्ज कथित रोड रेज की प्राथमिकी से जुड़ा है। पुलिस ने जांच के दौरान सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स से पत्रकार के खाते की विस्तृत जानकारी मांगी थी। इसमें उनके लॉगिन और लॉगआउट के आईपी एड्रेस, ईमेल आईडी, मोबाइल उपकरण की पहचान से जुड़ा आईएमईआई नंबर और अकाउंट रजिस्ट्रेशन से संबंधित रिकॉर्ड शामिल थे।पुलिस ने कथित घटना से लगभग तीन महीने पहले की अवधि का डिजिटल डेटा भी मांगा था। इसी पर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया। न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने सुनवाई के दौरान कहा कि कथित घटना से तीन महीने पहले की निजी डिजिटल जानकारी मांगना जरूरत से ज्यादा कार्रवाई प्रतीत होती है।
अदालत ने कहा कि जांच एजेंसियों को अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते समय उचित सीमा का ध्यान रखना चाहिए। किसी आपराधिक मामले की जांच के नाम पर व्यक्ति की निजी जानकारी तक व्यापक पहुंच प्राप्त करने को स्वतः उचित नहीं माना जा सकता।सुनवाई के दौरान गाजियाबाद पुलिस आयुक्त की ओर से दाखिल हलफनामे पर भी चर्चा हुई। पुलिस ने बताया कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से संबंधित जानकारी पत्रकार का पता लगाने, उनकी गिरफ्तारी और मामले की जांच में सहायता के उद्देश्य से मांगी गई थी।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि पुलिस आयुक्त की ओर से दी गई सफाई और सोशल मीडिया कंपनी को जारी नोटिस में मांगी गई जानकारी के बीच कुछ विरोधाभास था। अदालत ने कहा कि नोटिस में मांगे गए डिजिटल रिकॉर्ड का दायरा पुलिस की ओर से बताए गए उद्देश्य से अधिक व्यापक दिखाई देता है।पीठ ने स्पष्ट किया कि कथित अपराध की घटना से पहले की गोपनीय या व्यक्तिगत जानकारी प्राप्त नहीं की जा सकती। इसके अलावा प्राथमिकी दर्ज होने के बाद की जानकारी भी तभी मांगी जा सकती है, जब आरोपी का पता लगाने या गिरफ्तारी के अन्य उपलब्ध उपाय अपर्याप्त साबित हों।
सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स को जारी नोटिस निरस्त करते हुए आदेश दिया कि उसके आधार पर या अन्यथा प्राप्त संबंधित जानकारी का इस्तेमाल पत्रकार अभिषेक उपाध्याय के खिलाफ नहीं किया जाएगा। यह आदेश व्यक्तिगत डिजिटल जानकारी के उपयोग पर महत्वपूर्ण न्यायिक टिप्पणी के रूप में सामने आया हैदरअसल, पत्रकार अभिषेक उपाध्याय के खिलाफ आरोप है कि उन्होंने गाजियाबाद के शिप्रा मॉल के पास एक मोटरसाइकिल सवार को अपनी कार से टक्कर मारी थी। शिकायत में धमकी देने और जातिसूचक टिप्पणी करने के आरोप भी लगाए गए थे। हालांकि, पत्रकार ने इन आरोपों से इनकार किया है।
अभिषेक उपाध्याय का दावा है कि उनके खिलाफ दर्ज मामला उनकी पत्रकारिता से जुड़ी रिपोर्टिंग के कारण प्रतिशोधात्मक कार्रवाई का हिस्सा है। उन्होंने अयोध्या के राम मंदिर से संबंधित दान राशि में कथित अनियमितताओं को लेकर रिपोर्टिंग की थी। हालांकि, उनके इस दावे को अदालत ने प्रमाणित तथ्य के रूप में स्वीकार नहीं किया है।पत्रकार ने अपने खिलाफ दर्ज प्राथमिकी को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। इससे पहले 25 अगस्त 2026 को शीर्ष अदालत ने उन्हें अंतरिम राहत देते हुए पुलिस को उनके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई नहीं करने का निर्देश दिया था। अदालत ने प्राथमिकी की प्रति उपलब्ध कराने का भी आदेश दिया था, ताकि पत्रकार उचित कानूनी उपाय अपना सकें।
बुधवार की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने पत्रकार को पहले दी गई अंतरिम सुरक्षा को बरकरार रखा। हालांकि, यह राहत जांच में उनके सहयोग करने की शर्त पर दी गई है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पत्रकार संबंधित प्राथमिकी को चुनौती देने के लिए सक्षम हाईकोर्ट का रुख कर सकते हैं।पीठ ने कहा कि उसने प्राथमिकी में लगाए गए आरोपों की सत्यता पर कोई राय व्यक्त नहीं की है। इसका मतलब है कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश डिजिटल डेटा हासिल करने के तरीके और पत्रकार को दी गई कानूनी राहत से संबंधित है, न कि रोड रेज मामले में दोष या निर्दोष होने के अंतिम निर्धारण से।इसके अलावा अदालत ने पुलिस द्वारा जब्त पत्रकार की कार को तत्काल वापस करने का निर्देश दिया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि वाहन को अधिकतम दो दिनों के भीतर छोड़ दिया जाए।
सुनवाई के दौरान जांच एजेंसियों द्वारा व्यक्तिगत और डिजिटल डेटा एकत्र करने के संबंध में व्यापक दिशा-निर्देश तैयार करने का मुद्दा भी उठा। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि इस विषय पर उचित याचिका के माध्यम से विचार किया जा सकता हैसुप्रीम कोर्ट के इस आदेश ने आपराधिक जांच के दौरान व्यक्तिगत गोपनीयता और जांच एजेंसियों के अधिकारों के बीच संतुलन के प्रश्न को फिर सामने ला दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जांच आवश्यक है, लेकिन उसके लिए अपनाए जाने वाले उपाय भी कानूनी सीमाओं के अनुरूप होने चाहिए।