नई दिल्ली। हैदराबाद स्थित नेशनल एकेडमी ऑफ लीगल स्टडीज एंड रिसर्च यानी NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के छात्रों से जुड़े विवाद के बाद बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा ने कानून के विद्यार्थियों से माफी मांग ली है। स्वतंत्रता दिवस पर जारी अपने पत्र में उन्होंने किसी विश्वविद्यालय या विशेष विवाद का सीधे उल्लेख नहीं किया। हालांकि, इसे NALSAR के 2026 बैच के छात्रों के नामांकन पर रोक लगाने वाले आदेश के बाद पैदा हुए विवाद से जोड़कर देखा जा रहा है।
अपने पत्र में मनन कुमार मिश्रा ने कहा कि यदि मौजूदा विवाद से जुड़ी किसी बात, उनके शब्दों या पत्र से कानून के विद्यार्थियों की भावनाएं आहत हुई हैं तो वह इसके लिए खेद जताते हुए माफी मांगते हैं। उन्होंने कहा कि खेद व्यक्त करना प्रतिष्ठा या अहंकार का विषय नहीं है, बल्कि यह स्वीकार करना है कि विद्यार्थियों की भावनाएं और चिंताएं मायने रखती हैं।w)
छात्रों के विरोध से शुरू हुआ था विवाद
यह विवाद NALSAR विश्वविद्यालय के 2026 के दीक्षांत समारोह में भारत के प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत को मुख्य अतिथि बनाए जाने के प्रस्ताव से शुरू हुआ था। विश्वविद्यालय के कुछ छात्रों ने कुलपति को पत्र लिखकर इस निमंत्रण पर पुनर्विचार करने की मांग की थी।
विद्यार्थियों की इस आपत्ति के बाद बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने 13 अगस्त को एक आदेश जारी किया। इसमें सभी राज्य बार काउंसिलों को निर्देश दिया गया कि अगले आदेश तक NALSAR के 2026 बैच से कानून की डिग्री प्राप्त करने वाले किसी भी छात्र का अधिवक्ता के रूप में नामांकन नहीं किया जाए।
BCI ने विश्वविद्यालय प्रशासन से उन विद्यार्थियों, शिक्षकों और अन्य लोगों की पहचान करके रिपोर्ट देने को भी कहा था, जिन्होंने प्रधान न्यायाधीश की प्रस्तावित भागीदारी के खिलाफ अभियान शुरू किया, आयोजित किया या उसका समन्वय किया था। इस आदेश का छात्रों, पूर्व विद्यार्थियों और कानूनी समुदाय के एक वर्ग ने कड़ा विरोध किया।
कुछ घंटों के भीतर वापस हुआ आदेश
विरोध तेज होने के बाद बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने कुछ ही घंटों में विद्यार्थियों के नामांकन पर रोक लगाने वाला आदेश वापस ले लिया। शुरुआत में परिषद ने कहा था कि विवाद से संबंधित तथ्यों की जांच जारी रहेगी। हालांकि, बाद में मनन कुमार मिश्रा ने स्पष्ट किया कि कोई जांच नहीं होगी और इस मामले की कार्यवाही बंद कर दी गई है।
सुप्रीम कोर्ट में भी इस प्रकरण का उल्लेख किया गया। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने विद्यार्थियों के शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार का समर्थन किया। अदालत ने कहा कि विद्यार्थियों के पास विरोध का कोई कारण है तो उन्हें कानून के दायरे में अपनी बात रखने का अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट ने BCI और राज्य बार काउंसिलों को इस विवाद में छात्रों या शिक्षकों के खिलाफ दंडात्मक अथवा आपराधिक कार्रवाई करने से भी रोका।
छात्र परिषद ने मांगी थी सार्वजनिक माफी
NALSAR की स्टूडेंट बार काउंसिल ने बयान जारी कर BCI अध्यक्ष की कार्रवाई और उनकी टिप्पणियों की निंदा की थी। छात्र परिषद का कहना था कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध, आलोचना और जवाबदेही की मांग करना नागरिकों का अधिकार है। परिषद ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट और प्रधान न्यायाधीश सहित कोई भी सार्वजनिक संस्था वैध आलोचना से परे नहीं हो सकती।
छात्र परिषद ने मनन कुमार मिश्रा से सार्वजनिक माफी मांगने की मांग की थी। NALSAR के 400 से अधिक पूर्व विद्यार्थियों ने भी एक खुला पत्र जारी कर BCI के आदेश का विरोध किया। बेंगलुरु स्थित नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी के विद्यार्थियों और पूर्व छात्रों ने भी माफी की मांग का समर्थन किया था।
CJP ने दी थी प्रदर्शन की चेतावनी
कॉकरोच जनता पार्टी ने भी इस मुद्दे पर BCI अध्यक्ष के खिलाफ मोर्चा खोला था। पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके ने आदेश वापस नहीं लिए जाने की स्थिति में मनन कुमार मिश्रा के आवास के बाहर प्रदर्शन करने की चेतावनी दी थी। संगठन के सह-संयोजक सौरव दास ने बाद में मनन कुमार मिश्रा से नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा देने की मांग भी की।
अपने माफीनामे में BCI अध्यक्ष ने शांतिपूर्ण विरोध और असहमति को संवैधानिक लोकतंत्र का हिस्सा बताया। उन्होंने कहा कि दीक्षांत समारोह में शामिल होना या नहीं होना विद्यार्थियों का अपना निर्णय है। किसी छात्र को कार्यक्रम में भाग लेने या उससे दूर रहने के लिए बाध्य महसूस नहीं करना चाहिए।