नई दिल्ली। देश में बढ़ते माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण और उससे जुड़े पर्यावरणीय खतरों को लेकर राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने महत्वपूर्ण कदम उठाया है। अधिकरण ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) को 'नेशनल माइक्रोप्लास्टिक्स डिटेक्शन प्रोटोकॉल' तैयार करने की दिशा में हुई प्रगति की रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए आठ सप्ताह का समय दिया है। इस निर्देश का उद्देश्य देशभर में माइक्रोप्लास्टिक की पहचान, जांच और निगरानी के लिए एक समान वैज्ञानिक प्रणाली विकसित करने की प्रक्रिया की समीक्षा करना है। माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच यह निर्देश महत्वपूर्ण माना जा रहा है।माइक्रोप्लास्टिक प्लास्टिक के अत्यंत छोटे कण होते हैं, जिनका आकार सामान्यतः पांच मिलीमीटर से कम होता है। ये कण पानी, मिट्टी, हवा और खाद्य पदार्थों में पाए जा सकते हैं। प्लास्टिक उत्पादों के टूटने, सिंथेटिक कपड़ों की धुलाई, टायरों के घिसने और औद्योगिक गतिविधियों सहित कई स्रोतों से माइक्रोप्लास्टिक पर्यावरण में पहुंचते हैं। इनका आकार बेहद छोटा होने के कारण इन्हें सामान्य आंखों से पहचानना कठिन होता है। यही वजह है कि इनकी जांच के लिए विशेष वैज्ञानिक उपकरणों और मानकीकृत परीक्षण प्रक्रियाओं की आवश्यकता होती है।
राष्ट्रीय स्तर पर एक समान जांच प्रणाली की जरूरत
नेशनल माइक्रोप्लास्टिक्स डिटेक्शन प्रोटोकॉल का उद्देश्य देश में माइक्रोप्लास्टिक की पहचान और परीक्षण के लिए वैज्ञानिक मानकों को एक समान बनाना है। वर्तमान में विभिन्न शोध संस्थान और प्रयोगशालाएं माइक्रोप्लास्टिक की जांच के लिए अलग-अलग तकनीकों का इस्तेमाल करती हैं। इससे अलग-अलग स्थानों से प्राप्त आंकड़ों की तुलना करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।एक राष्ट्रीय प्रोटोकॉल तैयार होने से नमूने एकत्र करने, उनका परीक्षण करने, परिणाम दर्ज करने और वैज्ञानिक निष्कर्ष निकालने की प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित हो सकेगी। इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि देश के किन क्षेत्रों में माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण अधिक है और इसके प्रमुख स्रोत कौन-कौन से हैं।NGT द्वारा CPCB से प्रगति रिपोर्ट मांगना इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। हालांकि, इस आदेश का अर्थ यह नहीं है कि आठ सप्ताह के भीतर पूरा राष्ट्रीय प्रोटोकॉल लागू करना अनिवार्य कर दिया गया है। बोर्ड को निर्धारित समय में अब तक हुई प्रगति की जानकारी प्रस्तुत करनी है।
जल स्रोतों में माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी चिंता का विषय
माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण का सबसे महत्वपूर्ण पहलू जल स्रोतों से जुड़ा है। वैज्ञानिक अध्ययनों में नदियों, झीलों, समुद्रों और अन्य जल निकायों में माइक्रोप्लास्टिक के कण पाए गए हैं। प्लास्टिक कचरा जब लंबे समय तक पर्यावरण में पड़ा रहता है, तो धूप, तापमान और भौतिक प्रक्रियाओं के कारण छोटे-छोटे टुकड़ों में टूट सकता है।ये कण बारिश के पानी और नालों के माध्यम से नदियों तथा अन्य जल स्रोतों तक पहुंच सकते हैं। इसके अलावा घरेलू और औद्योगिक अपशिष्ट जल भी माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण का स्रोत बन सकता है।जल स्रोतों में मौजूद माइक्रोप्लास्टिक जलीय जीवों द्वारा निगले जा सकते हैं। इससे उनके भोजन ग्रहण करने, विकास और स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका रहती है। वैज्ञानिक इस बात का भी अध्ययन कर रहे हैं कि खाद्य श्रृंखला के माध्यम से ये कण मनुष्यों तक किस मात्रा में पहुंचते हैं।
मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव को लेकर जारी है शोध
माइक्रोप्लास्टिक के संभावित स्वास्थ्य प्रभावों को लेकर दुनियाभर में वैज्ञानिक अनुसंधान जारी है। विभिन्न अध्ययनों में मानव शरीर के कुछ ऊतकों और जैविक नमूनों में माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी दर्ज की गई है। हालांकि, इससे होने वाले दीर्घकालिक स्वास्थ्य प्रभावों और जोखिम के स्तर को लेकर अभी कई महत्वपूर्ण सवालों के जवाब स्पष्ट नहीं हैं।वैज्ञानिकों के अनुसार, माइक्रोप्लास्टिक का प्रभाव उसके आकार, रासायनिक संरचना, मात्रा और संपर्क की अवधि जैसे कारकों पर निर्भर कर सकता है। इसलिए किसी क्षेत्र में माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी का पता लगाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसकी मात्रा और विशेषताओं का वैज्ञानिक मूल्यांकन भी जरूरी है।राष्ट्रीय जांच प्रोटोकॉल विकसित होने से ऐसे अध्ययनों के लिए अधिक भरोसेमंद आंकड़े उपलब्ध हो सकते हैं। इससे भविष्य में स्वास्थ्य और पर्यावरण से संबंधित नीतियां तैयार करने में सहायता मिल सकती है।
CPCB की भूमिका होगी महत्वपूर्ण
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड देश में प्रदूषण की निगरानी और पर्यावरण संरक्षण से संबंधित तकनीकी मानकों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। माइक्रोप्लास्टिक की जांच के लिए राष्ट्रीय प्रोटोकॉल तैयार करने की प्रक्रिया में विभिन्न वैज्ञानिक संस्थानों, प्रयोगशालाओं और विशेषज्ञों के बीच समन्वय की आवश्यकता हो सकती है।इस प्रक्रिया में यह निर्धारित करना महत्वपूर्ण होगा कि पानी, मिट्टी और अन्य पर्यावरणीय नमूनों को किस तरीके से एकत्र किया जाए। नमूनों में बाहरी प्लास्टिक कणों के मिल जाने से बचाव, परीक्षण उपकरणों का चयन और परिणामों की गुणवत्ता सुनिश्चित करना भी आवश्यक होगा।माइक्रोप्लास्टिक की पहचान के लिए माइक्रोस्कोपी, फूरियर ट्रांसफॉर्म इन्फ्रारेड स्पेक्ट्रोस्कोपी (FTIR) और रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि, कौन-सी तकनीक किस प्रकार के नमूने के लिए उपयुक्त होगी, इसका निर्धारण वैज्ञानिक मानकों और परीक्षण आवश्यकताओं के आधार पर किया जाना चाहिए।
प्लास्टिक प्रदूषण रोकने के प्रयासों को मिलेगी मजबूती
भारत में प्लास्टिक कचरे के प्रबंधन और प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए विभिन्न नियम लागू हैं। इनमें प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियम और कुछ चिन्हित सिंगल-यूज प्लास्टिक उत्पादों पर प्रतिबंध जैसे कदम शामिल हैं।हालांकि, माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण की चुनौती सामान्य प्लास्टिक कचरे से अलग है। बड़े प्लास्टिक उत्पादों को एकत्र करना और उनका निस्तारण करना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है, लेकिन अत्यंत छोटे कणों को पर्यावरण से हटाना अधिक जटिल प्रक्रिया है।इसलिए माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए उसके स्रोतों की पहचान, प्रभावी अपशिष्ट प्रबंधन, बेहतर निगरानी और वैज्ञानिक अनुसंधान की आवश्यकता है।
आठ सप्ताह बाद प्रगति रिपोर्ट पर रहेगी नजर
NGT द्वारा दिए गए आठ सप्ताह के समय के दौरान CPCB को राष्ट्रीय माइक्रोप्लास्टिक्स डिटेक्शन प्रोटोकॉल से संबंधित कार्यों की प्रगति प्रस्तुत करनी होगी। इस रिपोर्ट से यह स्पष्ट हो सकेगा कि मानकीकृत जांच प्रणाली विकसित करने की दिशा में कितना काम हुआ है और आगे किन प्रक्रियाओं को पूरा किया जाना बाकी है।राष्ट्रीय स्तर पर एक समान परीक्षण व्यवस्था विकसित होने से प्रदूषण संबंधी आंकड़ों की विश्वसनीयता बढ़ सकती है। साथ ही पर्यावरणीय जोखिमों की पहचान और प्रदूषण नियंत्रण के लिए वैज्ञानिक आधार पर निर्णय लेने में मदद मिल सकती है।फिलहाल NGT का यह निर्देश माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण की निगरानी को अधिक व्यवस्थित बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। आने वाले समय में CPCB की प्रगति रिपोर्ट से इस राष्ट्रीय प्रोटोकॉल की तैयारियों की वास्तविक स्थिति सामने आएगी।