नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि वह 3 नवंबर को एक गर्भवती महिला पत्रकार की उस याचिका पर सुनवाई करेगा, जिसमें उसने आरोप लगाया है कि लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने उसे धक्का दिया और खींचा। यह घटना तब हुई जब विपक्षी 'इंडिया' (INDIA) गठबंधन के नेता मतदाता सूची के 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (SIR) के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट परिसर की ओर मार्च कर रहे थे।
वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव भाटिया ने भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के समक्ष इस मामले का उल्लेख किया और बताया कि महिला पत्रकार से जुड़ी याचिका अभी तक सुनवाई के लिए सूचीबद्ध नहीं की गई है।
भाटिया की बात पर प्रतिक्रिया देते हुए, CJI की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट किया कि इस मामले में पहले ही नोटिस जारी किया जा चुका है और इस पर 3 नवंबर को सुनवाई होगी।
एक समाचार वेबसाइट के लिए काम करने वाली पत्रकार ऋचा पाराशर ने आरोप लगाया है कि विपक्षी नेताओं के मार्च को कवर करते समय राहुल गांधी ने उनका हाथ पकड़ा और जोर से खींचा। इसके बाद, उनके सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें धक्का दिया, जिससे वह जमीन पर गिर गईं।
इसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। तीन महीने की गर्भवती पाराशर ने आरोप लगाया कि यह घटना 12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट परिसर में विपक्षी नेताओं के विरोध प्रदर्शन के दौरान मचे हंगामे के बीच हुई।
कांग्रेस ने इन आरोपों को खारिज करते हुए इन्हें राजनीतिक रूप से प्रेरित बताया है। वहीं, पार्टी के नेताओं और समर्थकों ने घटना के वीडियो साझा किए हैं और सवाल उठाया है कि क्या इन दृश्यों से यह साबित होता है कि राहुल गांधी ने पत्रकार को धक्का दिया था।
यह घटनाक्रम एक अलग याचिका के संदर्भ में सामने आया है, जिसमें विपक्षी मार्च के बाद सुप्रीम कोर्ट परिसर और उसके आसपास राजनीतिक प्रदर्शनों के खिलाफ सुरक्षा उपाय करने की मांग की गई है।
15 अक्टूबर को, CJI सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने इस याचिका पर नोटिस जारी किया और घटना से जुड़े CCTV फुटेज तथा अन्य डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखने का निर्देश दिया।
यह मार्च 'इंडिया' गठबंधन के नेताओं (जिसमें राहुल गांधी भी शामिल थे) द्वारा तब निकाला गया था, जब CJI ने राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के उस अनुरोध को ठुकरा दिया था, जिसमें उन्होंने CJI से मिलकर मतदाता सूची के पुनरीक्षण (SIR) के संबंध में एक ज्ञापन सौंपने की मांग की थी।
CJI ने विपक्षी नेताओं को सलाह दी थी कि वे निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट से संपर्क करें। उन्होंने कहा कि लंबित मामलों पर चर्चा करने के लिए बैठक करना 'शक्तियों के पृथक्करण' (separation of powers) के संवैधानिक सिद्धांत के खिलाफ होगा।