दुर्घटना मुआवजा मामलों में आधार कार्ड की उम्र अंतिम प्रमाण नहीं : हाईकोर्ट

Update: 2026-07-19 08:47 GMT

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने मोटर दुर्घटना मुआवजा मामलों में स्पष्ट किया है कि आधार कार्ड में दर्ज आयु को अंतिम और निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि दावा अधिकरण को किसी दावेदार की उम्र तय करते समय केवल आधार कार्ड पर निर्भर रहने के बजाय उपलब्ध सभी दस्तावेजी और चिकित्सीय साक्ष्यों का समग्र मूल्यांकन करना चाहिए।

न्यायमूर्ति सचिन सिंह राजपूत ने तीन आपस में जुड़े मोटर दुर्घटना मुआवजा अपीलों पर एक साथ फैसला सुनाते हुए यह टिप्पणी की। अदालत ने इस दौरान सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2024 के सरोज एवं अन्य बनाम इफको टोकियो जनरल इंश्योरेंस कंपनी मामले के फैसले का भी हवाला दिया। महासमुंद जिले में 19 अप्रैल 2019 को एक सड़क दुर्घटना हुई थी। हादसे में दो बाइक सवारों की मौत हो गई थी, जबकि एक अन्य व्यक्ति गंभीर रूप से घायल हो गया था। दुर्घटना में उसका एक पैर घुटने के ऊपर से काटना पड़ा था।

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि घायल व्यक्ति ने लगातार अपनी उम्र करीब 58 वर्ष बताई थी, जबकि दिव्यांगता प्रमाणपत्र और उपचार संबंधी दस्तावेजों में उसकी उम्र लगभग 60 वर्ष दर्ज थी। इसके बावजूद मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण ने केवल आधार कार्ड के आधार पर उसकी उम्र 68 वर्ष मान ली थी। हाईकोर्ट ने इसे विधिसम्मत नहीं माना और उसकी आयु 61 से 65 वर्ष के आयु वर्ग में स्वीकार की। अदालत ने मुआवजे की पुनर्गणना करते हुए घायल की मासिक आय 3,000 रुपये से बढ़ाकर 6,000 रुपये निर्धारित की। साथ ही उसकी कार्यात्मक दिव्यांगता 35 प्रतिशत के स्थान पर 60 प्रतिशत मानी। इसके आधार पर कुल मुआवजा राशि 96,400 रुपये से बढ़ाकर 3,90,800 रुपये कर दी। इसके अतिरिक्त 2,94,400 रुपये पर अपील दायर करने की तारीख से छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने का भी आदेश दिया गया।

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