बिलासपुर : छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अमान्य बोर्ड की 12वीं की अंकसूची के आधार पर फार्मासिस्ट पंजीयन कराने के मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने चांपा निवासी राधेश्याम धाकते की याचिका खारिज करते हुए छत्तीसगढ़ राज्य फार्मेसी परिषद द्वारा उनका पंजीयन निरस्त किए जाने के आदेश को सही ठहराया है। न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि सक्षम प्राधिकारी से मान्यता प्राप्त बोर्ड की वैध शैक्षणिक योग्यता नहीं होने की स्थिति में फार्मासिस्ट पंजीयन रद्द करना अवैध या मनमाना नहीं माना जा सकता। अदालत ने इस मामले में 18 जुलाई 2022 को छत्तीसगढ़ राज्य फार्मेसी परिषद द्वारा जारी पंजीयन निरस्तीकरण आदेश को बरकरार रखा। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में पूर्व में मिली अंतरिम राहत और बोर्ड की मान्यता से जुड़े आदेशों पर भी विचार किया।
2013 में पास की थी 12वीं की परीक्षा
याचिकाकर्ता राधेश्याम धाकते ने वर्ष 2013 में सीजी बोर्ड ऑफ स्कूल एंड टेक्निकल एजुकेशन से 12वीं की परीक्षा उत्तीर्ण की थी। इसी अंकसूची के आधार पर उन्होंने छत्तीसगढ़ राज्य फार्मेसी परिषद में पंजीयन कराया था। परिषद ने 1 दिसंबर 2021 को उन्हें पंजीयन क्रमांक 21785 जारी किया। हालांकि, बाद में उनकी 12वीं की अंकसूची और संबंधित बोर्ड की मान्यता को लेकर सवाल उठने लगे। इसके बाद परिषद ने 6 जुलाई 2022 को धाकते को नोटिस जारी कर शैक्षणिक दस्तावेजों और बोर्ड की वैधता के संबंध में स्पष्टीकरण मांगा। याचिकाकर्ता ने 12 जुलाई 2022 को नोटिस का जवाब प्रस्तुत किया, लेकिन परिषद उनके जवाब से संतुष्ट नहीं हुई।इसके परिणामस्वरूप 18 जुलाई 2022 को परिषद ने उनका फार्मासिस्ट पंजीयन निरस्त कर दिया। इस आदेश को चुनौती देते हुए धाकते ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
याचिकाकर्ता ने दी अस्थायी समकक्षता की दलील
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने दलील दी कि संबंधित बोर्ड को 7 नवंबर 2012 को अस्थायी समकक्षता प्रदान की गई थी। यह समकक्षता 7 मार्च 2015 से वापस ली गई थी। अधिवक्ता के अनुसार, धाकते ने उस अवधि में पढ़ाई की थी, जब बोर्ड को अस्थायी समकक्षता प्राप्त थी। इसलिए उनकी शैक्षणिक योग्यता को अमान्य मानकर फार्मासिस्ट पंजीयन निरस्त करना उचित नहीं था। याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि हाईकोर्ट के पूर्व अंतरिम आदेश के आधार पर उन्होंने अपनी आगे की पढ़ाई जारी रखी थी। ऐसे में उनके पंजीयन को निरस्त किए जाने के फैसले पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए।
राज्य सरकार और फार्मेसी परिषद ने किया विरोध
दूसरी ओर राज्य सरकार और छत्तीसगढ़ राज्य फार्मेसी परिषद ने याचिका का विरोध किया। उनकी ओर से अदालत को बताया गया कि संबंधित बोर्ड की समकक्षता पहले 11 मार्च 2014 को निलंबित कर दी गई थी। इसके बाद काउंसिल ऑफ बोर्ड्स ऑफ स्कूल एजुकेशन ने 3 जुलाई 2015 को बोर्ड की समकक्षता निरस्त कर दी थी। राज्य और परिषद की ओर से यह भी बताया गया कि हाईकोर्ट ने 26 सितंबर 2017 को संबंधित निर्णय को बरकरार रखा था। इसके बाद अपील में भी 7 अक्टूबर 2023 को पूर्व निर्णय कायम रहा। इन तथ्यों के आधार पर परिषद ने दलील दी कि याचिकाकर्ता के पास मान्यता प्राप्त बोर्ड की वैध 12वीं की अंकसूची नहीं थी। ऐसे में फार्मासिस्ट पंजीयन रद्द करने का निर्णय नियमानुसार लिया गया था।
अंतरिम आदेश से नहीं मिलती स्थायी मान्यता
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि किसी मामले में दी गई अंतरिम राहत अंतिम निर्णय तक सीमित रहती है। केवल अंतरिम आदेश के आधार पर आगे की पढ़ाई जारी रखने से अमान्य शैक्षणिक दस्तावेज को स्थायी वैधता नहीं मिल जाती। अदालत ने 12 अक्टूबर 2018 के नीतिगत निर्णय का भी उल्लेख किया। इसके तहत संबंधित अवधि के विद्यार्थियों को निजी परीक्षार्थी के रूप में परीक्षा देने की अनुमति दी गई थी। हालांकि, इस निर्णय में अमान्य बोर्ड से प्राप्त अंकसूचियों को मान्यता नहीं दी गई थी। अदालत ने इस अंतर को महत्वपूर्ण माना।
फार्मासिस्ट पंजीयन रद्द करने में कोई अवैधता नहीं
न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकल पीठ ने मामले के तथ्यों और दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करने के बाद याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता के पास सक्षम प्राधिकारी से मान्यता प्राप्त 10वीं या 12वीं की वैध अंकसूची नहीं होने के कारण छत्तीसगढ़ राज्य फार्मेसी परिषद द्वारा पंजीयन निरस्त करने के निर्णय में कोई अवैधता या मनमानी नहीं पाई गई। इस प्रकार हाईकोर्ट ने परिषद के 18 जुलाई 2022 के आदेश को सही ठहराते हुए याचिकाकर्ता को राहत देने से इनकार कर दिया।
शैक्षणिक दस्तावेजों की वैधता का महत्वपूर्ण मामला
यह फैसला शैक्षणिक दस्तावेजों की मान्यता और व्यावसायिक पंजीयन से जुड़े मामलों के लिए महत्वपूर्ण है। विशेष रूप से फार्मेसी जैसे विनियमित पेशों में निर्धारित शैक्षणिक योग्यता और मान्यता प्राप्त संस्थान या बोर्ड के दस्तावेजों की वैधता आवश्यक होती है। इस मामले में अदालत ने स्पष्ट किया कि अंतरिम राहत के आधार पर पढ़ाई जारी रखना और अंतिम रूप से शैक्षणिक योग्यता की मान्यता प्राप्त होना अलग-अलग विषय हैं।
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