कचरे से बनेगी बिजली, रोहतक ने दिखाया नया रास्ता

Update: 2026-07-27 15:29 GMT

रोहतक शहर: कूड़ा अब सिर्फ डंपिंग साइट पर जमा होने वाला बेकार कचरा नहीं रह गया है, बल्कि यही कचरा अब बिजली उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। नगर निगम के सॉलिड वेस्ट ट्रीटमेंट प्लांट में वैज्ञानिक तरीके से कचरे का निस्तारण कर उससे रिफ्यूज डिराइव्ड फ्यूल (आरडीएफ) तैयार किया जा रहा है। इस आरडीएफ को हरियाणा के सोनीपत और उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर स्थित पावर प्लांटों में भेजा जा रहा है, जहां इसका इस्तेमाल बिजली बनाने के लिए ईंधन के रूप में किया जा रहा है।

नगर निगम के अधिकारियों के अनुसार, सुनारिया स्थित सॉलिड वेस्ट ट्रीटमेंट प्लांट में शहर से रोजाना डोर-टू-डोर कलेक्शन के माध्यम से करीब 230 से 280 टन कचरा पहुंचता है। यहां पहुंचने के बाद कचरे का 100 प्रतिशत वैज्ञानिक तरीके से सेग्रीगेशन किया जाता है। इस प्रक्रिया के जरिए उपयोगी और अनुपयोगी सामग्री को अलग किया जाता है और ज्वलनशील कचरे से आरडीएफ तैयार किया जाता है।

प्लांट में सबसे पहले कचरे को कन्वेयर बेल्ट पर डाला जाता है। इसके बाद मशीनों और कर्मचारियों की मदद से इसकी छंटाई की जाती है। कचरे में मौजूद प्लास्टिक, कपड़ा, रबर, चमड़ा, थर्मोकोल, पैकेजिंग सामग्री और अन्य ज्वलनशील पदार्थों को अलग कर लिया जाता है। वहीं लोहे, कांच और अन्य रिसाइकिल होने वाली सामग्री को अलग करके पुनर्चक्रण के लिए भेज दिया जाता है।

आरडीएफ तैयार करने के लिए अलग किए गए ज्वलनशील कचरे को कटर और श्रेडर मशीनों की मदद से छोटे-छोटे टुकड़ों में बदला जाता है। यदि कचरे में नमी ज्यादा होती है तो उसे सुखाने की प्रक्रिया से गुजारा जाता है। इसके बाद सभी सामग्री को मिलाकर उच्च गुणवत्ता वाला रिफ्यूज डिराइव्ड फ्यूल तैयार किया जाता है। यही आरडीएफ बाद में बिजली उत्पादन केंद्रों तक भेजा जाता है।

अधिकारियों के मुताबिक, रोहतक प्लांट से रोजाना लगभग 100 टन आरडीएफ तैयार हो रहा है। इसे ट्रकों के जरिए सोनीपत के मुरथल और उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर स्थित पावर प्लांटों में भेजा जा रहा है। वहां इस ईंधन का इस्तेमाल कोयले के विकल्प के रूप में किया जाता है, जिससे बिजली उत्पादन में मदद मिलती है।

कचरे के प्रबंधन की इस पूरी प्रक्रिया में गीले कचरे का भी उपयोग किया जा रहा है। प्लांट में आने वाले जैविक कचरे से खाद तैयार की जाती है। इससे एक तरफ जहां कचरे का वैज्ञानिक निपटारा हो रहा है, वहीं दूसरी तरफ पर्यावरण पर पड़ने वाला नकारात्मक प्रभाव भी कम हो रहा है।

कचरे के सेग्रीगेशन की प्रक्रिया तीन प्रमुख चरणों में पूरी होती है। पहले चरण में बड़े आकार के कचरे जैसे ईंट, पत्थर, लकड़ी, प्लास्टिक और धातु को अलग किया जाता है। दूसरे चरण में कचरे को गीले, सूखे और रिसाइकिल होने वाले हिस्सों में बांटा जाता है। चुंबकीय मशीनों की मदद से लोहे जैसी धातुओं को अलग किया जाता है। तीसरे चरण में आरडीएफ के लिए चुनी गई सामग्री को श्रेडर मशीन से काटकर सुखाया जाता है और उपयोगी ईंधन में बदला जाता है।

प्लांट से मिलने वाले आंकड़ों के अनुसार, कुल कचरे में करीब 8 से 10 प्रतिशत हिस्सा ईंट-पत्थर और रोड़े का होता है। लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा मिट्टी और प्री-कम्पोस्ट के रूप में निकलता है, जबकि 40 से 50 प्रतिशत तक सामग्री आरडीएफ के रूप में तैयार की जाती है।

नगर निगम के सॉलिड वेस्ट ट्रीटमेंट प्लांट की क्षमता करीब 600 टन प्रतिदिन कचरे के निस्तारण की है। हालांकि वर्तमान में यहां रोजाना 230 से 280 टन तक ही कचरा पहुंच रहा है। अधिकारियों का कहना है कि आने वाले समय में कचरे की मात्रा बढ़ने पर प्लांट की क्षमता का और बेहतर उपयोग किया जा सकेगा।

रोहतक का यह मॉडल दिखाता है कि सही तकनीक और वैज्ञानिक प्रबंधन के जरिए कचरे को समस्या के बजाय संसाधन में बदला जा सकता है। कचरे से बिजली उत्पादन की यह पहल न केवल शहर को स्वच्छ बनाने में मदद कर रही है, बल्कि ऊर्जा उत्पादन के क्षेत्र में भी नई संभावनाएं पैदा कर रही है।

Tags:    

Similar News