फीस के लिए कांवड़ उठा निकले चार भाई-बहन

Update: 2026-08-10 05:23 GMT

फरीदाबाद। सावन के पवित्र महीने में जहां लाखों शिवभक्त भगवान शिव का जलाभिषेक करने के लिए कांवड़ यात्रा पर निकले हैं, वहीं उत्तर प्रदेश के कोसीकलां शहर के चार भाई-बहनों की कांवड़ यात्रा अपनी अलग वजह और भावनात्मक प्रार्थना के कारण लोगों का ध्यान खींच रही है। करीब 75 किलोमीटर दूर से आए ये बच्चे पैरों में छाले और कंधों पर गंगाजल से भरी कांवड़ लेकर पैदल चल रहे हैं। उनकी भगवान शिव से एक ही प्रार्थना है—उनके माता-पिता स्कूल की बकाया फीस भर सकें और वे फिर से अपनी पढ़ाई शुरू कर सकें।

इन चारों भाई-बहनों ने 30 जुलाई को हरिद्वार से गंगाजल लेकर अपनी पैदल यात्रा शुरू की थी। उनका लक्ष्य अपने साथ लाए पवित्र जल को भगवान शिव को अर्पित करना है। बच्चों के मुताबिक, वे भगवान शिव से अपने परिवार की आर्थिक परेशानी दूर करने और माता-पिता को इतनी मदद मिलने की प्रार्थना कर रहे हैं कि उनकी स्कूल फीस जमा हो सके।

चारों बच्चों ने उठाई कांवड़

कांवड़ यात्रा पर निकले बच्चों में सात साल की प्रेरणा, सातवीं कक्षा में पढ़ने वाले शिवम, नौवीं कक्षा में पढ़ने वाला उनका एक भाई या बहन और सबसे बड़ी बहन साधना, जो 11वीं कक्षा में पढ़ती हैं, शामिल हैं।

इन बच्चों की उम्र भले ही कम हो, लेकिन अपनी पढ़ाई और परिवार की परिस्थितियों को लेकर उनकी चिंता ने इस यात्रा को विशेष बना दिया है। बच्चों के लिए कांवड़ यात्रा केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं है, बल्कि यह उनके भविष्य और पढ़ाई से जुड़ी एक उम्मीद भी बन गई है।

बच्चों ने हरिद्वार से गंगाजल लिया और पैदल यात्रा शुरू की। यात्रा के दौरान उन्हें गर्मी, थकान और पैरों में छालों जैसी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। इसके बावजूद चारों भाई-बहन अपनी यात्रा जारी रखे हुए हैं।

स्कूल फीस नहीं भर पाने से छूटी पढ़ाई

बच्चों के सामने सबसे बड़ी परेशानी उनकी स्कूल फीस है। आर्थिक कठिनाइयों के कारण उनके माता-पिता फीस का भुगतान नहीं कर पाए, जिसके बाद बच्चों को स्कूल से निकाल दिया गया। पढ़ाई रुकने के बाद बच्चों ने भगवान शिव से अपने परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारने की प्रार्थना करने का फैसला किया।

बच्चों की इच्छा है कि उनके माता-पिता बकाया फीस जमा कर सकें और उन्हें दोबारा स्कूल जाने का मौका मिले। इसी उम्मीद को लेकर वे कांवड़ यात्रा पर निकले हैं।

उनके लिए स्कूल केवल पढ़ाई की जगह नहीं है, बल्कि उनके भविष्य का आधार है। इसलिए कांवड़ यात्रा के दौरान वे भगवान शिव से यही मांग कर रहे हैं कि उनके परिवार की आर्थिक मुश्किलें दूर हों और उनकी शिक्षा फिर से शुरू हो सके।

आस्था के साथ कठिन पैदल सफर

हरिद्वार से पैदल निकलने के बाद बच्चों को लंबी दूरी तय करनी है। कांवड़ यात्रा में शिवभक्त आम तौर पर अपने कंधों पर गंगाजल लेकर चलते हैं और यात्रा के दौरान कई तरह के नियमों और धार्मिक परंपराओं का पालन करते हैं।

इन चार बच्चों के लिए यह सफर और भी चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि वे अभी स्कूल जाने की उम्र में हैं। पैरों में छाले पड़ने के बावजूद उन्होंने यात्रा नहीं छोड़ी। रास्ते में उन्हें आराम और भोजन-पानी की जरूरत भी पड़ रही है।

यात्रा के दौरान जब लोग इन बच्चों को देखते हैं तो उनकी कहानी पूछते हैं। बच्चों की प्रार्थना और उनके संघर्ष के बारे में जानकर कई लोग भावुक भी हो रहे हैं। उनकी यात्रा ने यह सवाल भी सामने ला दिया है कि आर्थिक परेशानी के कारण बच्चों की शिक्षा किस तरह प्रभावित होती है।

शिक्षा के लिए उम्मीद बनी कांवड़

इन बच्चों की कहानी कांवड़ यात्रा की धार्मिक आस्था के साथ-साथ शिक्षा की अहमियत को भी सामने लाती है। बच्चों का सपना है कि वे अपनी पढ़ाई जारी रखें और आगे बढ़ें। फीस न भर पाने की वजह से स्कूल से बाहर होना उनके लिए बड़ा झटका है।

साधना, जो चारों भाई-बहनों में सबसे बड़ी हैं और 11वीं कक्षा में पढ़ती हैं, अपने छोटे भाई-बहनों की पढ़ाई को लेकर भी चिंतित हैं। परिवार की आर्थिक स्थिति का असर सभी बच्चों की शिक्षा पर पड़ा है।

बच्चों का मानना है कि भगवान शिव उनकी प्रार्थना जरूर सुनेंगे। इसी विश्वास के साथ वे हरिद्वार से अपने घर की ओर बढ़ रहे हैं। उनके कंधों पर कांवड़ है और मन में एक उम्मीद—कि घर लौटने के बाद उनकी पढ़ाई फिर से शुरू हो सकेगी।

लोगों से भी मिल रहा है समर्थन

यात्रा के दौरान इन बच्चों की कहानी सुनकर कई लोग उनकी मदद करने के लिए आगे आ रहे हैं। कुछ लोग रास्ते में उन्हें भोजन और पानी उपलब्ध करा रहे हैं, तो कुछ उनकी यात्रा के बारे में जानकारी हासिल कर रहे हैं।

हालांकि बच्चों की सबसे बड़ी इच्छा किसी व्यक्तिगत सहायता से अधिक अपने परिवार की आर्थिक स्थिति में सुधार और स्कूल में वापस लौटने की है। उनकी प्रार्थना यही है कि माता-पिता उनकी फीस जमा कर पाएं और उन्हें दोबारा कक्षा में बैठने का अवसर मिले।

कांवड़ के साथ भविष्य का सपना

सावन की कांवड़ यात्रा आम तौर पर श्रद्धा, तपस्या और भगवान शिव के प्रति भक्ति का प्रतीक मानी जाती है। लेकिन इन चार भाई-बहनों की यात्रा में आस्था के साथ शिक्षा और भविष्य की चिंता भी जुड़ी हुई है।

30 जुलाई को हरिद्वार से गंगाजल लेकर निकले ये बच्चे अपने छोटे-छोटे कदमों से लंबी दूरी तय कर रहे हैं। पैरों में छाले हैं, कंधों पर कांवड़ का भार है, लेकिन उनके मन में अपने भविष्य को लेकर उम्मीद कायम है।

उनकी यह यात्रा केवल गंगाजल को घर तक पहुंचाने की यात्रा नहीं, बल्कि स्कूल की किताबों और कक्षा तक दोबारा लौटने की इच्छा की यात्रा भी है। चारों भाई-बहन भगवान शिव के सामने अपनी यही मनोकामना रखने के लिए आगे बढ़ रहे हैं कि उनके माता-पिता की आर्थिक मुश्किलें दूर हों, स्कूल की फीस जमा हो और उनकी पढ़ाई फिर से शुरू हो सके।

बच्चों की इस कहानी ने कांवड़ यात्रा को एक अलग मानवीय पहलू दिया है—जहां आस्था के साथ शिक्षा का सपना भी कंधों पर उठाया गया है।

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