शिमला। हिमाचल प्रदेश में प्राकृतिक आपदाओं से निपटने और लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए राज्य सरकार ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। लगभग 4,100 मीटर की ऊंचाई पर स्थित गीपांग गाथ हिमनद झील में आधुनिक ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित किया गया है। इस तकनीक की मदद से ग्लेशियल झील से अचानक पानी निकलने और बाढ़ जैसी आपदा का खतरा पैदा होने पर समय रहते चेतावनी मिलने की उम्मीद है। राज्य सरकार का मानना है कि इससे आपदा के दौरान राहत और बचाव कार्य शुरू करने में लगने वाला समय कम होगा और लोगों की जान बचाने में मदद मिलेगी।हिमाचल प्रदेश में लगातार सामने आने वाली प्राकृतिक आपदाओं को देखते हुए सरकार तकनीक आधारित आपदा प्रबंधन प्रणाली को मजबूत करने पर जोर दे रही है। इसके साथ ही राज्य ने प्राकृतिक आपदाओं से हुए लगभग 3,525 करोड़ रुपये के नुकसान का आकलन केंद्र सरकार को सौंपा है।
4,100 मीटर की ऊंचाई पर स्थापित की गई आधुनिक प्रणाली
गीपांग गाथ हिमनद झील ऊंचाई वाले संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में स्थित है। यहां स्थापित नई चेतावनी प्रणाली का उद्देश्य झील से अचानक बड़ी मात्रा में पानी निकलने की आशंका के दौरान खतरे की जानकारी उपलब्ध कराना है।हिमनद झीलों में पानी का स्तर बढ़ने या प्राकृतिक अवरोध टूटने से अचानक बाढ़ की स्थिति पैदा हो सकती है। इसे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड कहा जाता है। ऐसी घटनाओं में तेज रफ्तार से पानी निचले इलाकों की ओर बढ़ सकता है।नई प्रणाली के जरिए खतरे की समय पर पहचान होने से प्रशासन को चेतावनी जारी करने, लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने और आपातकालीन सेवाओं को सक्रिय करने के लिए अतिरिक्त समय मिल सकता है।
आपदा के दौरान तेजी से राहत पहुंचाने की तैयारी
हिमाचल प्रदेश के आपदा प्रबंधन विभाग के विशेष सचिव डॉ. पुष्पेंद्र राणा ने बताया कि राज्य सरकार तकनीक आधारित पूर्व चेतावनी प्रणालियों को प्राथमिकता दे रही है।इसके अलावा आपातकालीन परिस्थितियों में त्वरित प्रतिक्रिया सुनिश्चित करने के लिए भी प्रयास किए जा रहे हैं। सरकार का उद्देश्य ऐसी व्यवस्था विकसित करना है, जिससे किसी भी संभावित आपदा की सूचना मिलने पर संबंधित विभाग जल्द कार्रवाई कर सकें।डॉ. राणा के अनुसार, आपदा प्रबंधन के साथ पुनर्प्राप्ति और पुनर्निर्माण के लिए वित्तीय सहायता उपलब्ध कराना भी राज्य की प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल है।
केंद्र सरकार को सौंपा 3,525 करोड़ रुपये के नुकसान का आकलन
हिमाचल प्रदेश सरकार ने प्राकृतिक आपदाओं से हुए लगभग 3,525 करोड़ रुपये के नुकसान का आकलन केंद्र सरकार को सौंपा है।राज्य बार-बार आने वाली प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित क्षेत्रों में पुनर्वास और पुनर्निर्माण की जरूरतों पर ध्यान दे रहा है। आपदाओं के बाद क्षतिग्रस्त बुनियादी ढांचे को दोबारा तैयार करना और प्रभावित क्षेत्रों में सामान्य स्थिति बहाल करना महत्वपूर्ण चुनौती है।इसी को ध्यान में रखते हुए राज्य सरकार वित्तीय सहयोग और दीर्घकालिक पुनर्निर्माण की आवश्यकता पर जोर दे रही है।
सुप्रीम कोर्ट की समिति कर रही आपदा जोखिमों की जांच
हिमाचल प्रदेश में प्राकृतिक आपदाओं के बढ़ते खतरे को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित एक समिति भी विभिन्न पहलुओं का अध्ययन कर रही है।यह समिति आपदा जोखिमों, पर्यावरण संरक्षण और संवेदनशील क्षेत्रों की वहन क्षमता का आकलन कर रही है। वहन क्षमता से आशय किसी क्षेत्र की उस सीमा से है, जिसके भीतर विकास गतिविधियां पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों पर अत्यधिक दबाव डाले बिना संचालित की जा सकती हैं।समिति का अध्ययन भविष्य में जोखिम कम करने और संवेदनशील हिमालयी क्षेत्रों में विकास योजनाओं को बेहतर ढंग से तैयार करने के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।
जलवायु परिवर्तन के बीच बढ़ रही चुनौतियां
हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियरों के पिघलने और हिमनद झीलों में बदलाव से प्राकृतिक आपदाओं का खतरा बढ़ सकता है। ऐसी परिस्थितियों में वास्तविक समय की निगरानी और पूर्व चेतावनी प्रणालियों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।डॉ. पुष्पेंद्र राणा के अनुसार, वैज्ञानिक तकनीकों को व्यावहारिक आपदा प्रबंधन से जोड़ना जरूरी है, ताकि समय रहते खतरे की पहचान कर लोगों, संपत्ति और आजीविका की सुरक्षा की जा सके।गीपांग गाथ में स्थापित प्रणाली हिमाचल प्रदेश में हिमनद झीलों की निगरानी के व्यापक नेटवर्क को विकसित करने की दिशा में उपयोगी साबित हो सकती है।
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