श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर में सेब उत्पादकों को आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए शुरू की गई एक महत्वपूर्ण परियोजना सरकारी देरी की भेंट चढ़ गई है। लगभग 21 साल पहले शुरू की गई एकीकृत पैक-हाउस परियोजना अब तक पूरी नहीं हो सकी है। इसके चलते केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर बागवानी उत्पाद विपणन एवं प्रसंस्करण निगम (JKHPMC) से ब्याज सहित 4.16 करोड़ रुपये वापस करने की मांग की है। इस परियोजना के लिए वर्ष 2005 में केंद्र सरकार की ओर से 1.42 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता जारी की गई थी। लेकिन लगातार समयसीमा बढ़ाए जाने के बावजूद परियोजना पूरी नहीं हो सकी। अब केंद्र ने मूल राशि पर 10 प्रतिशत वार्षिक ब्याज जोड़कर कुल 4 करोड़ 16 लाख 21 हजार 680 रुपये की वसूली का फैसला किया है। इस घटनाक्रम ने सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन और जवाबदेही को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

2005 में शुरू हुई थी 3.88 करोड़ की परियोजना

केंद्र सरकार के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अधीन कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (APEDA) ने जम्मू-कश्मीर में सेब उत्पादकों को आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए एकीकृत पैक-हाउस परियोजना को मंजूरी दी थी।

इस परियोजना की कुल अनुमानित लागत 3.88 करोड़ रुपये निर्धारित की गई थी। इसके तहत दक्षिण कश्मीर के शोपियां जिले में सेब की ग्रेडिंग, पैकिंग और भंडारण के लिए आधुनिक बुनियादी ढांचा विकसित किया जाना था।

परियोजना के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी जम्मू-कश्मीर बागवानी उत्पाद विपणन एवं प्रसंस्करण निगम को सौंपी गई थी।

एपीडा ने 28 सितंबर 2005 को निगम को 1.42 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता जारी की थी। उस समय उम्मीद जताई गई थी कि परियोजना पूरी होने से सेब उत्पादकों को बेहतर विपणन और भंडारण की सुविधाएं मिल सकेंगी।

21 साल बाद भी धरातल पर नहीं उतरी योजना

वर्ष 2005 में शुरू की गई यह परियोजना अक्टूबर 2026 तक अधूरी पड़ी है। इस दौरान जम्मू-कश्मीर में कई राजनीतिक और प्रशासनिक बदलाव हुए, लेकिन परियोजना का काम पूरा नहीं हो सका।

उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार, परियोजना में आ रही समस्याओं को देखते हुए एपीडा ने समयसीमा कई बार बढ़ाई थी।

अंतिम बार जून 2022 में परियोजना को पूरा करने के लिए अतिरिक्त समय दिया गया था। इसके बावजूद काम पूरा नहीं हुआ।

लगातार देरी के कारण परियोजना की लागत भी बढ़ने लगी। इसके अलावा जिस तकनीक का इस्तेमाल करने की योजना बनाई गई थी, वह समय के साथ पुरानी पड़ गई।

इन परिस्थितियों में केंद्र सरकार ने परियोजना को आगे जारी रखने के बजाय समझौता समाप्त करने का निर्णय लिया।

केंद्र ने रद्द किया परियोजना का समझौता

एपीडा ने परियोजना के क्रियान्वयन में लंबे समय से हो रही देरी को देखते हुए जम्मू-कश्मीर बागवानी उत्पाद विपणन एवं प्रसंस्करण निगम के साथ किए गए समझौतों को रद्द करने का निर्णय लिया।

दस्तावेजों के अनुसार, 15 जुलाई 2005 को हस्ताक्षरित समझौता ज्ञापन और 22 जुलाई 2005 को हुए संबंधित कार्यान्वयन समझौते को समाप्त करने का फैसला किया गया।

इसके पीछे तीन प्रमुख कारण बताए गए हैं। पहला, परियोजना पूरी करने में अत्यधिक देरी। दूसरा, समय बीतने के साथ निर्माण और तकनीकी उपकरणों की लागत बढ़ना। तीसरा, प्रस्तावित तकनीक का वर्तमान आधुनिक पैक-हाउस तकनीकों की तुलना में पुराना हो जाना।

इस फैसले के बाद अब परियोजना के लिए जारी वित्तीय सहायता की वसूली का मामला सामने आया है।

1.42 करोड़ की राशि बढ़कर हुई 4.16 करोड़

एपीडा ने परियोजना के लिए जारी 1.42 करोड़ रुपये की राशि पर 10 प्रतिशत वार्षिक ब्याज जोड़कर कुल 4.16 करोड़ रुपये वापस करने की मांग की है।

दस्तावेजों में सामान्य वित्तीय नियमावली (GFR) 2017 के नियम 231 का उल्लेख किया गया है।

इसके अनुसार, जारी अनुदान और उस पर लागू ब्याज की गणना के बाद निगम से कुल 4,16,21,680 रुपये वापस मांगे गए हैं।

इस प्रकार परियोजना पर मूल सहायता राशि से काफी अधिक धनराशि लौटाने की जिम्मेदारी बन सकती है।

यदि यह राशि सरकारी संसाधनों से चुकाई जाती है, तो इसका असर सार्वजनिक खजाने पर पड़ सकता है। हालांकि, भुगतान की अंतिम स्थिति और संभावित वित्तीय व्यवस्था के बारे में विस्तृत आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है।

केंद्र के पत्रों का भी नहीं मिला जवाब

इस मामले में सामने आए दस्तावेजों के अनुसार, एपीडा और केंद्रीय वाणिज्य मंत्रालय की ओर से परियोजना की स्थिति जानने के लिए कई बार पत्राचार किया गया था।

एपीडा अध्यक्ष कार्यालय ने 11 सितंबर 2023 को संबंधित अधिकारियों को पत्र भेजा था।

इसके बाद केंद्रीय वाणिज्य विभाग के अतिरिक्त सचिव की ओर से 31 जनवरी 2024 को भी पत्र जारी किया गया।

रिपोर्ट के अनुसार, इन पत्रों का संबंधित निगम की ओर से जवाब नहीं दिया गया।

दस्तावेजों में इस स्थिति को परियोजना पूरा करने में निगम की असमर्थता के संकेत के रूप में देखा गया है।

सेब उत्पादकों को मिलनी थीं आधुनिक सुविधाएं

इस परियोजना का उद्देश्य कश्मीर के सेब उत्पादकों को फसल की कटाई के बाद आवश्यक आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध कराना था।

एकीकृत पैक-हाउस में सेब की गुणवत्ता के आधार पर छंटाई, ग्रेडिंग, पैकिंग और सुरक्षित भंडारण की सुविधा विकसित की जानी थी।

इस तरह की व्यवस्था से उत्पादकों को फलों की गुणवत्ता बनाए रखने और बाजार की जरूरतों के अनुसार उनकी आपूर्ति करने में मदद मिल सकती थी।

आधुनिक ग्रेडिंग तकनीक के माध्यम से सेब को आकार, गुणवत्ता और अन्य निर्धारित मानकों के आधार पर अलग किया जा सकता है।

इससे व्यापारियों और खरीदारों को एकसमान गुणवत्ता वाले उत्पाद उपलब्ध कराने में सुविधा होती है।

किसानों को बेहतर दाम दिलाने का था उद्देश्य

कश्मीर में सेब की खेती बड़ी संख्या में परिवारों की आजीविका से जुड़ी हुई है। शोपियां सहित घाटी के कई जिलों में बागवानी ग्रामीण अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार है।

सेब की फसल तैयार होने के बाद उसकी सही तरीके से ग्रेडिंग और पैकिंग करना बाजार में बेहतर कीमत प्राप्त करने के लिए महत्वपूर्ण होता है।

आधुनिक भंडारण सुविधाएं मिलने से फसल की गुणवत्ता बनाए रखने और बाजार में आपूर्ति का बेहतर प्रबंधन करने में मदद मिल सकती है।

लेकिन एकीकृत पैक-हाउस परियोजना अधूरी रहने के कारण इससे मिलने वाले प्रस्तावित लाभ किसानों तक नहीं पहुंच सके।

पुरानी तकनीक भी बनी परियोजना रद्द होने की वजह

परियोजना में देरी का एक महत्वपूर्ण परिणाम तकनीकी बदलाव के रूप में सामने आया है।

वर्ष 2005 में जिन मशीनों और तकनीकी सुविधाओं की योजना बनाई गई थी, वे वर्तमान समय की आधुनिक पैकिंग और ग्रेडिंग तकनीकों से पीछे रह गई हैं।

पिछले दो दशकों में फलों की छंटाई, गुणवत्ता जांच, पैकेजिंग और भंडारण से जुड़ी तकनीकों में महत्वपूर्ण बदलाव हुए हैं।

एपीडा ने परियोजना को रद्द करने के फैसले में प्रस्तावित तकनीक के अप्रचलित होने का भी उल्लेख किया है।

इससे स्पष्ट होता है कि बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में अत्यधिक देरी से न केवल लागत बढ़ती है, बल्कि उनका मूल तकनीकी स्वरूप भी अप्रासंगिक हो सकता है।

सरकारी जवाबदेही पर उठे गंभीर सवाल

एकीकृत पैक-हाउस परियोजना का अधूरा रहना सरकारी योजनाओं की निगरानी और क्रियान्वयन को लेकर सवाल खड़े करता है।

वर्ष 2005 में वित्तीय सहायता जारी होने के बावजूद इतने लंबे समय तक परियोजना पूरी नहीं होने के कारणों की समीक्षा आवश्यक मानी जा रही है।

इसके अलावा केंद्र सरकार की ओर से भेजे गए पत्रों का जवाब नहीं मिलने की बात भी प्रशासनिक समन्वय और जवाबदेही से जुड़ा मुद्दा है।

हालांकि, इस देरी के लिए किसी विशेष अधिकारी या सरकार की व्यक्तिगत जिम्मेदारी निर्धारित करने संबंधी आधिकारिक निष्कर्ष अभी उपलब्ध नहीं हैं।

किसानों को सुविधाएं नहीं मिलीं, अब धनराशि लौटाने की चुनौती

जम्मू-कश्मीर में सेब उत्पादकों के लिए शुरू की गई यह परियोजना लगभग 21 साल बाद भी अपने उद्देश्य को पूरा नहीं कर सकी।

एक ओर किसानों को आधुनिक ग्रेडिंग, पैकिंग और भंडारण जैसी सुविधाओं से वंचित रहना पड़ा, वहीं दूसरी ओर अब निगम के सामने ब्याज सहित 4.16 करोड़ रुपये लौटाने की चुनौती खड़ी हो गई है।

इस घटनाक्रम ने सार्वजनिक धन के उपयोग, परियोजनाओं की समयबद्ध निगरानी और किसानों के लिए घोषित विकास योजनाओं की वास्तविक प्रगति पर नए सवाल पैदा किए हैं।

अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि जम्मू-कश्मीर प्रशासन केंद्र की वसूली मांग पर क्या कदम उठाता है और सेब उत्पादकों को आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए आगे कौन-सी व्यवस्था की जाती है।

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