बेंगलुरु। कर्नाटक के कई हिस्सों में सूखे की गंभीर स्थिति के बीच बेंगलुरु दक्षिण जिले के किसानों की परेशानी लगातार बढ़ती जा रही है। जिले के रामनगर और मगदी तालुकों में सड़कों के दोनों ओर फैली हरियाली देखकर भले ही अच्छी खेती का अनुमान लगाया जा सकता है, लेकिन खेतों की वास्तविक स्थिति बिल्कुल अलग है। कम और बेमौसम बारिश के कारण फसलों की पैदावार बुरी तरह प्रभावित हुई है। कई खेतों में फसलें पूरी तरह खराब हो चुकी हैं, जबकि कुछ स्थानों पर उपज काफी कम हुई है। नारियल और आम जैसे फलों का आकार छोटा रह गया है। रागी की फसल कई स्थानों पर अंकुरित तक नहीं हो पाई। इससे किसानों के सामने आर्थिक संकट गहराने लगा है। रामनगर और मगदी तालुकों को आधिकारिक रूप से सूखाग्रस्त घोषित किया जा चुका है। इस स्थिति में किसानों के लिए खेती के साथ पशुपालन और रेशम उत्पादन का खर्च उठाना भी मुश्किल होता जा रहा है।

बेंगलुरु दक्षिण जिला पहले रामनगर जिले के नाम से जाना जाता था। यह बेंगलुरु से लगभग 50 किलोमीटर दूर स्थित है। जिले में रामनगर, मगदी, चन्नापटना और कनकपुरा चार तालुक शामिल हैं। इस क्षेत्र से जुड़े प्रमुख राजनीतिक प्रतिनिधियों में डी.के. शिवकुमार शामिल हैं। जिले की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा कृषि, बागवानी, पशुपालन और रेशम उत्पादन पर निर्भर है।

दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान जिले में सामान्य रूप से 436 मिलीमीटर बारिश होने की उम्मीद थी, लेकिन इस बार केवल 358 मिलीमीटर वर्षा दर्ज की गई। इस प्रकार सामान्य से 78 मिलीमीटर कम बारिश हुई, जो लगभग 18 प्रतिशत की कमी है। बारिश की मात्रा कम होने के साथ उसका समय भी किसानों के लिए बड़ी समस्या बन गया। जब फसलों को पानी की सबसे अधिक जरूरत थी, तब पर्याप्त बारिश नहीं हुई। बाद में हुई वर्षा कई फसलों को बचाने के लिए पर्याप्त साबित नहीं हुई।

रामनगर तालुक के कूनागल्लू गांव के किसान चंद्रशेखरैया के पास आम के 110 पेड़ हैं। उनका कहना है कि सामान्य परिस्थितियों में नवंबर से आम के पेड़ों पर फूल आना शुरू हो जाते हैं। लेकिन इस बार मौसम में बदलाव के कारण पेड़ों पर नई पत्तियां निकल रही हैं। उन्हें आशंका है कि फूल आने की प्रक्रिया फरवरी तक टल सकती है। इससे आम की पैदावार प्रभावित होने की संभावना है।

चंद्रशेखरैया ने बताया कि जून और जुलाई में पर्याप्त बारिश नहीं होने से आम के पेड़ों की सामान्य वृद्धि प्रभावित हुई। अब कुछ दिनों से बारिश हो रही है, लेकिन इसका अपेक्षित फायदा मिलने की संभावना कम है। उनके अनुसार, मौसम का यही रुख रहा तो इस बार आम की उपज काफी कम हो सकती है।

नारियल की खेती करने वाले किसान भी सूखे की मार झेल रहे हैं। इसी गांव के राघवेंद्र के पास नारियल के 30 पेड़ हैं। उन्होंने बताया कि सामान्य परिस्थितियों में हर दो महीने में लगभग एक हजार नारियल मिलते थे, लेकिन इस बार उत्पादन घटकर करीब आधा रह गया है। इतना ही नहीं, नारियल का आकार भी पहले की तुलना में छोटा हो गया है।

पैदावार में इस गिरावट से किसानों की आमदनी प्रभावित हो रही है। खेती में लगने वाली लागत लगभग पहले जैसी रहने के बावजूद उपज कम मिलने से मुनाफा घटने की आशंका बढ़ गई है।

रामनगर और मगदी के अधिकांश किसान छोटे तथा सीमांत श्रेणी के हैं। कई किसानों के पास सिंचाई के लिए निजी बोरवेल नहीं हैं। ऐसे में वे बारिश के पानी पर निर्भर रहते हैं। बारिश कम होने से उनके सामने खेती के विकल्प सीमित हो गए हैं।

अट्टिमगेरे गांव के किसान नागराजू के पास 26 गुंटा जमीन है। उन्होंने बताया कि इस बार पर्याप्त बारिश नहीं होने के कारण उन्होंने रागी की जगह कुल्थी की बुवाई की। उनके खेत में बोरवेल नहीं है, इसलिए खेती पूरी तरह वर्षा पर निर्भर है। उनका कहना है कि गांव के आसपास दिखाई देने वाली हरियाली से केवल पशुओं के लिए कुछ चारा मिलने की उम्मीद है।

मगदी तालुक के चेंदुरायनहल्ली गांव निवासी कॉलेज छात्र भावन पढ़ाई के साथ खेती भी करते हैं। उन्होंने बताया कि इस वर्ष उनके परिवार ने दो बार रागी की बुवाई की, लेकिन दोनों बार बीज अंकुरित नहीं हो सके। उनका कहना है कि यदि अगस्त में समय पर बारिश हुई होती तो स्थिति इतनी खराब नहीं होती। लगातार दो बार बुवाई असफल होने से बीज और खेत की तैयारी पर खर्च हुई रकम का नुकसान हुआ है।

सूखे का असर केवल फसलों तक सीमित नहीं है। पशुपालन करने वाले किसानों के सामने भी गंभीर समस्या खड़ी हो गई है। चारे की कमी और पानी की बढ़ती लागत से पशुओं को पालना महंगा पड़ रहा है।

डेयरी व्यवसाय से जुड़े पुट्टस्वामाचारी ने बताया कि उनके पास चारा उगाने के लिए अपनी जमीन नहीं है। उन्होंने गायों के लिए चारा उत्पादन करने के उद्देश्य से 10 गुंटा जमीन एक वर्ष के लिए किराए पर ली है। लेकिन बारिश की कमी के कारण उन्हें बोरवेल के पानी पर निर्भर होना पड़ रहा है। इसके लिए उन्हें प्रति घंटे 200 रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं।

इसके अलावा सूखी घास के बड़े बंडल की कीमत भी 200 रुपये से बढ़कर 350 रुपये तक पहुंच गई है। इस तरह पशुपालन करने वाले किसानों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ रहा है।

रामनगर को रेशम उत्पादन के प्रमुख केंद्रों में गिना जाता है। यहां बड़ी संख्या में किसान शहतूत की खेती और रेशम के कीड़ों के पालन से जुड़े हैं। लेकिन बारिश की कमी से शहतूत की पत्तियों का उत्पादन घट गया है। इससे रेशम उत्पादन की लागत बढ़ती जा रही है।

गंगाराजनहल्ली गांव के किसान नागराजा के अनुसार, शहतूत की पत्तियों का जो बंडल पहले 300 रुपये में मिलता था, उसकी कीमत अब 500 रुपये तक पहुंच गई है। गर्मी और पानी की कमी से पौधों की वृद्धि प्रभावित हुई है। इसके अलावा कीटों का प्रकोप भी बढ़ा है, जिससे उत्पादन में अतिरिक्त परेशानी हो रही है।

रेशम उत्पादकों के सामने मौसम में अचानक बदलाव भी चुनौती बना हुआ है। शुष्क मौसम कुछ परिस्थितियों में रेशम के कोकून की गुणवत्ता के लिए अनुकूल हो सकता है, लेकिन कोकून बनने के महत्वपूर्ण चरण में अचानक बारिश होने से नमी बढ़ जाती है। इससे उत्पादन प्रभावित होने का खतरा रहता है।

सूखे का असर रेशम उद्योग की प्रसंस्करण इकाइयों पर भी दिखाई दे रहा है। इन इकाइयों को संचालन के लिए पर्याप्त पानी की आवश्यकता होती है। पानी की कमी के कारण कुछ इकाइयों को निजी टैंकरों से पानी मंगवाना पड़ रहा है। रामनगर की एक रेशम इकाई में कार्यरत चेतन के अनुसार, आधे टैंकर पानी की कीमत पहले 300 रुपये थी, जो अब बढ़कर 600 रुपये हो गई है।

कर्नाटक सरकार ने सूखे से प्रभावित क्षेत्रों की पहचान के लिए चरणबद्ध मूल्यांकन किया है। अगस्त 2026 में राज्य के 101 तालुकों को सूखाग्रस्त घोषित करने की जानकारी सामने आई थी। इनमें रामनगर और मगदी भी शामिल थे। इसके बाद सितंबर और अक्टूबर में अतिरिक्त तालुकों को भी सूखा प्रभावित घोषित किया गया। सरकारी आदेशों के तहत संबंधित अधिकारियों को फसल नुकसान का आकलन करने और निर्धारित मानकों के अनुसार राहत उपायों की प्रक्रिया आगे बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं।

फिलहाल बेंगलुरु दक्षिण जिले के किसानों के लिए सबसे बड़ी चुनौती घटती पैदावार और बढ़ता उत्पादन खर्च है। फसलें खराब होने से आय कम हो रही है, जबकि सिंचाई, चारा और रेशम उत्पादन पर अधिक खर्च करना पड़ रहा है।

किसानों को उम्मीद है कि सरकार फसल नुकसान का उचित आकलन कर प्रभावित परिवारों को राहत उपलब्ध कराएगी। इसके साथ ही सिंचाई सुविधाओं और जल संरक्षण की व्यवस्था मजबूत करने की आवश्यकता भी महसूस की जा रही है।

बेंगलुरु दक्षिण के गांवों में सड़कों के किनारे दिखाई देने वाली हरियाली भले ही आकर्षक हो, लेकिन खेतों में सूखे की मार झेल रहे किसानों की स्थिति अलग कहानी बता रही है। कम बारिश ने कृषि, बागवानी, पशुपालन और रेशम उद्योग को एक साथ प्रभावित किया है। अब किसानों की नजर सरकारी राहत, जल उपलब्धता और आने वाले मौसम पर टिकी है।

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