CJI सूर्य कांत का बड़ा बयान न्याय नागरिकों तक पहुंचे

Update: 2026-08-09 04:25 GMT

जबलपुर। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत ने शनिवार को न्याय व्यवस्था को अधिक सुलभ और समावेशी बनाने पर जोर देते हुए कहा कि न्याय तक पहुंच केवल उन लोगों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, जो अदालतों और कानूनी संस्थाओं तक खुद पहुंच सकते हैं। उन्होंने कहा कि न्याय व्यवस्था से यह उम्मीद नहीं की जानी चाहिए कि नागरिक न्याय पाने के लिए उसके पास आएं, बल्कि कानूनी संस्थाओं को उन लोगों तक पहुंचना होगा, जो किसी कारणवश स्वयं वहां नहीं आ सकते।

CJI सूर्य कांत ने यह बात नेशनल लीगल सर्विसेज अथॉरिटी (NALSA) के वेस्ट जोन रीजनल कॉन्फ्रेंस के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए कही। दो दिवसीय यह सम्मेलन शनिवार और रविवार को आयोजित किया जा रहा है। सम्मेलन का उद्देश्य कानूनी सहायता को अधिक प्रभावी, व्यापक और समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने के उपायों पर विचार-विमर्श करना है।

‘न्याय नागरिकों तक पहुंचे’

अपने संबोधन में CJI ने न्याय तक पहुंच की अवधारणा को केवल अदालतों में उपलब्ध सुविधाओं तक सीमित रखने के बजाय इसे आम नागरिक के जीवन से जोड़ने की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि समाज में ऐसे अनेक लोग हैं, जो आर्थिक, सामाजिक, भौगोलिक या अन्य कारणों से कानूनी संस्थाओं तक पहुंचने में सक्षम नहीं होते।

ऐसे लोगों के लिए न्याय व्यवस्था को स्वयं आगे बढ़कर काम करना होगा। उनका संदेश था कि जो नागरिक न्याय की संस्थाओं तक नहीं पहुंच सकते, कानूनी सेवा संस्थाओं को उनके पास जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि न्याय का वास्तविक अर्थ तभी पूरा होगा, जब संविधान में किए गए समान न्याय के वादे का लाभ समाज के हर वर्ग को मिल सके। इसके लिए कानूनी सहायता की व्यवस्था को अधिक सक्रिय और जन-केंद्रित बनाने की आवश्यकता है।

बातचीत, सम्मान और समावेश सम्मेलन के प्रमुख स्तंभ

CJI सूर्य कांत ने सम्मेलन के तीन प्रमुख स्तंभों—बातचीत, सम्मान और समावेश—का उल्लेख करते हुए कहा कि ये केवल कार्यक्रम के विषय नहीं हैं, बल्कि समान न्याय के संवैधानिक वादे को व्यवहार में उतारने के महत्वपूर्ण माध्यम हैं।

उन्होंने कहा कि न्याय व्यवस्था में विभिन्न पक्षों के बीच संवाद होना जरूरी है। न्याय तक पहुंच से जुड़े मुद्दों पर न्यायपालिका, कानूनी सेवा प्राधिकरण, सरकार, प्रशासन, वकीलों और समाज के विभिन्न वर्गों के बीच निरंतर बातचीत से ही प्रभावी समाधान निकाला जा सकता है।

सम्मान और समावेश को भी उन्होंने न्याय व्यवस्था की बुनियादी जरूरत बताया। उनका कहना था कि हर व्यक्ति के साथ सम्मानजनक व्यवहार और किसी भी वर्ग को न्याय की प्रक्रिया से बाहर न रखना समान न्याय की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

NALSA के संरक्षण में सम्मेलन

दो दिवसीय वेस्ट जोन रीजनल कॉन्फ्रेंस का आयोजन नेशनल लीगल सर्विसेज अथॉरिटी (NALSA), नई दिल्ली, मध्य प्रदेश राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरण, जबलपुर और मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की संयुक्त देखरेख में किया गया है।

CJI सूर्य कांत, जो NALSA के संरक्षक-प्रमुख भी हैं, ने सम्मेलन का उद्घाटन किया। कार्यक्रम में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव, कानून और न्याय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) अर्जुन राम मेघवाल, सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के न्यायाधीश, न्यायिक अधिकारी तथा विभिन्न कानूनी सेवा प्राधिकरणों के पदाधिकारी शामिल हुए।

सम्मेलन में कानूनी सहायता व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने और जरूरतमंद लोगों तक न्यायिक सेवाओं की पहुंच बढ़ाने से जुड़े विषयों पर विचार-विमर्श किया जा रहा है।

कमजोर और वंचित वर्गों तक पहुंच जरूरी

कानूनी सहायता का उद्देश्य उन लोगों को न्यायिक मदद उपलब्ध कराना है, जो आर्थिक या अन्य कारणों से कानूनी सेवाएं लेने में सक्षम नहीं होते। CJI के संबोधन में ऐसे ही वर्गों तक पहुंच बनाने पर विशेष जोर दिखाई दिया।

ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाले लोग कई बार कानूनी जानकारी और संसाधनों की कमी के कारण अपने अधिकारों का इस्तेमाल नहीं कर पाते। इसी तरह महिलाएं, बच्चे, बुजुर्ग, दिव्यांग और सामाजिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए भी न्याय तक पहुंच कई परिस्थितियों में चुनौतीपूर्ण हो सकती है।

ऐसे में कानूनी सेवा प्राधिकरणों की भूमिका केवल अदालत में मुफ्त कानूनी सहायता उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि लोगों को उनके अधिकारों और उपलब्ध कानूनी उपायों के बारे में जागरूक करने की दिशा में भी काम करना जरूरी है।

न्याय को अधिक जन-केंद्रित बनाने पर जोर

CJI के संदेश का एक महत्वपूर्ण पहलू न्याय व्यवस्था को नागरिक-केंद्रित बनाने का था। उन्होंने संकेत दिया कि न्यायिक संस्थानों और कानूनी सेवा तंत्र की सफलता का आकलन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि कितने लोग अदालत तक पहुंचे, बल्कि इस आधार पर भी होना चाहिए कि कितने जरूरतमंद लोगों तक कानूनी सहायता और न्याय की जानकारी पहुंची।

इस दृष्टिकोण से कानूनी सहायता संस्थाओं को स्थानीय स्तर पर सक्रिय भूमिका निभाने की जरूरत है। लोगों की समस्याओं को उनके स्तर पर समझना और जरूरत पड़ने पर उन्हें उचित कानूनी सहायता उपलब्ध कराना न्याय तक पहुंच को आसान बना सकता है।

संवैधानिक वादे को जमीन पर उतारने की कोशिश

सम्मेलन में न्याय तक समान पहुंच को संविधान के मूल वादे से जोड़ते हुए इस बात पर जोर दिया गया कि कानून के सामने समानता तभी प्रभावी होगी, जब हर नागरिक को न्याय पाने का वास्तविक अवसर मिले।

CJI सूर्य कांत ने बातचीत, सम्मान और समावेश को इसी दिशा में महत्वपूर्ण आधार बताया। उनके अनुसार, न्याय की संस्थाओं को समाज के उन हिस्सों तक सक्रिय रूप से पहुंचना होगा, जो व्यवस्था से दूरी के कारण अपने अधिकारों का लाभ नहीं उठा पाते।

दो दिवसीय सम्मेलन में इस विषय पर विभिन्न सत्रों और चर्चाओं के माध्यम से कानूनी सेवा व्यवस्था को और प्रभावी बनाने के उपायों पर विचार किया जा रहा है। इसमें न्यायपालिका, कानूनी सेवा प्राधिकरणों और अन्य संबंधित पक्षों की भूमिका पर भी चर्चा होगी।

सम्मेलन के उद्घाटन अवसर पर CJI का संदेश स्पष्ट रहा कि न्याय केवल अदालत की चारदीवारी तक सीमित व्यवस्था नहीं है। यदि किसी नागरिक के लिए न्याय की संस्था तक पहुंचना मुश्किल है, तो न्याय व्यवस्था को उसके पास पहुंचने की पहल करनी चाहिए। यही दृष्टिकोण न्याय को वास्तव में सुलभ, समावेशी और समान बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।

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