नाग पंचमी पर बांकी झील में उमड़ती आस्था, कपटी को दंड देने की है मान्यता
राजगढ़। मध्य प्रदेश के राजगढ़ अमीनपुर गांव स्थित प्रसिद्ध बांकी झील नाग पंचमी के अवसर पर आस्था और श्रद्धा का प्रमुख केंद्र बन जाती है। करीब नौ किलोमीटर लंबी इस ऐतिहासिक झील के किनारे हर साल नाग पंचमी के दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं और नागदेवता, भगवान शिव तथा देवी मंदिर में पूजा-अर्चना करते हैं।
इस झील से जुड़ी कई प्राचीन मान्यताएं और लोककथाएं लोगों के बीच आज भी प्रचलित हैं। कहा जाता है कि एक कपटी व्यक्ति को दंड देने के लिए नाग पंचमी के दिन ही यह झील अर्धचंद्राकार हो गई थी। इसी मान्यता के कारण यहां नाग पंचमी का विशेष महत्व माना जाता है।
नाग पंचमी पर लगता है भव्य मेला
बांकी झील के घाट पर नागदेवता, भगवान शिव और देवी मंदिर स्थापित हैं। नाग पंचमी के दिन यहां विशेष पूजा-अर्चना की जाती है और बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
इस अवसर पर झील के किनारे मेले का आयोजन भी किया जाता है। आसपास के गांवों के अलावा दूर-दराज के क्षेत्रों से भी लोग यहां पहुंचते हैं और धार्मिक अनुष्ठानों में शामिल होते हैं।
श्रद्धालु झील में पूजा सामग्री अर्पित कर सुख-समृद्धि और परिवार की खुशहाली की कामना करते हैं।
कपटी व्यक्ति से जुड़ी है लोककथा
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, प्राचीन समय में बांकी झील के किनारे एक पीपल का पेड़ हुआ करता था। कहा जाता है कि यदि कोई भूखा-प्यासा व्यक्ति उस पीपल के पेड़ के नीचे सच्चे मन से भोजन और पानी की इच्छा प्रकट करता था तो कुछ ही समय बाद झील में एक नाव दिखाई देती थी।
इस नाव में एक स्वर्ण पात्र होता था, जिसमें स्वादिष्ट भोजन और पेय पदार्थ भरे रहते थे। जरूरतमंद व्यक्ति भोजन ग्रहण कर अपनी भूख और प्यास मिटा लेता था।
इसके बाद वह स्वर्ण पात्र को साफ करके वापस नाव में रख देता था और कुछ समय बाद नाव अपने आप गायब हो जाती थी।
स्वर्ण पात्र ले जाने की कोशिश पड़ी भारी
लोककथा के अनुसार, एक बार नाग पंचमी के दिन एक कपटी व्यक्ति झील के पास पहुंचा। उसने भी भोजन की इच्छा जताई और उसे स्वादिष्ट व्यंजन प्राप्त हुए।
लेकिन भोजन करने के बाद उसकी नीयत बदल गई। उसने स्वर्ण पात्र को अपने साथ ले जाने की कोशिश की।
कहा जाता है कि जैसे ही उसने स्वर्ण पात्र लेकर जाने का प्रयास किया, झील ने अपना स्वरूप बदल लिया। पानी का स्तर बढ़ गया और झील ने उस व्यक्ति को चारों ओर से घेर लिया।
लोक मान्यता है कि झील ने उस कपटी व्यक्ति को दंड दिया और वह पानी में डूबकर मर गया।
घटना के बाद बदला झील का आकार
ग्रामीणों की मान्यता है कि इसी घटना के बाद बांकी झील का आकार बदल गया और वह अर्धचंद्राकार हो गई।
लोग आज भी इस कथा को श्रद्धा और विश्वास के साथ सुनाते हैं। इसी वजह से नाग पंचमी के दिन इस झील का धार्मिक महत्व और बढ़ जाता है।
राजा पृथ्वी सिंह ने शुरू कराई थी पूजा परंपरा
कहा जाता है कि इस घटना की जानकारी मिलने के बाद राजा पृथ्वी सिंह ने यहां धार्मिक आयोजन और पूजा-अर्चना की परंपरा शुरू कराई थी।
इसके बाद से हर साल नाग पंचमी पर यहां मेला लगने लगा और श्रद्धालुओं के आने का सिलसिला जारी है।
धार्मिक आस्था का केंद्र बनी झील
बांकी झील केवल प्राकृतिक सुंदरता के लिए ही नहीं, बल्कि धार्मिक मान्यताओं के कारण भी प्रसिद्ध है।
नाग पंचमी के दिन यहां पहुंचने वाले श्रद्धालुओं का मानना है कि नागदेवता की पूजा करने से जीवन में सुख-शांति आती है और परेशानियां दूर होती हैं।
स्थानीय लोग इस झील को अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं।
प्रशासन भी करता है व्यवस्थाएं
नाग पंचमी के मेले को देखते हुए प्रशासन और स्थानीय समितियों की ओर से व्यवस्थाएं की जाती हैं।
श्रद्धालुओं की भीड़ को देखते हुए सुरक्षा, साफ-सफाई और अन्य सुविधाओं का विशेष ध्यान रखा जाता है।
आज भी जीवंत है सदियों पुरानी परंपरा
बांकी झील से जुड़ी लोककथा भले ही आस्था और विश्वास पर आधारित है, लेकिन यह क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बन चुकी है।
हर साल नाग पंचमी पर यहां जुटने वाली भीड़ इस बात का प्रमाण है कि सदियों पुरानी परंपराएं आज भी लोगों के जीवन में गहरी जगह बनाए हुए हैं।