पन्ना टाइगर रिजर्व: कोर क्षेत्र में आलीशान रिसॉर्ट निर्माण को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। केन नदी के किनारे बनाए गए इस रिसॉर्ट पर भूमि और पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन के आरोप लगे हैं। आरोप है कि रिसॉर्ट से निकलने वाला पानी सीधे केन नदी में छोड़ा जा सकता है, जिससे नदी के पर्यावरण और वन्यजीवों पर गंभीर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। इस मामले में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) और सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों की अनदेखी का आरोप लगाया गया है।
मध्य प्रदेश के पन्ना टाइगर रिजर्व के कोर क्षेत्र में करीब पांच एकड़ भूमि पर बने इस रिसॉर्ट को लेकर कई सवाल खड़े हो रहे हैं। वन विभाग के दस्तावेजों के अनुसार, छतरपुर जिले के राजगढ़ गांव स्थित खसरा नंबर 1841 की जमीन पर यह निर्माण कराया गया है। यह क्षेत्र केन नदी के किनारे स्थित है, जो गंगा नदी की प्रमुख सहायक नदियों में शामिल है।
दस्तावेजों में बताया गया है कि रिसॉर्ट की पूरी ढलान नदी की ओर है। ऐसे में यहां से निकलने वाला निस्तारी पानी और स्वीमिंग पूल का पानी भी नदी की दिशा में जाने की संभावना है। पर्यावरण विशेषज्ञों और शिकायतकर्ताओं ने आशंका जताई है कि यदि बिना उचित ट्रीटमेंट के पानी नदी में छोड़ा गया तो इससे केन नदी के जल स्रोत और आसपास के वन्यजीव प्रभावित हो सकते हैं।
इस रिसॉर्ट का निर्माण भारतीय राजस्व सेवा (IRS) अधिकारी बी. श्रीनिवास कुमार और उनकी पत्नी हिमानी सरद द्वारा कराया गया है। आरोप है कि निर्माण के दौरान कई जरूरी अनुमतियों और पर्यावरणीय नियमों का पालन नहीं किया गया। मामले में वन विभाग के दस्तावेजों में भी कई अनियमितताओं का उल्लेख किया गया है।
जानकारी के अनुसार, पन्ना राष्ट्रीय उद्यान और गंगऊ अभयारण्य के ईको सेंसिटिव जोन (ESZ) के नियमों के तहत इस क्षेत्र में नए निर्माण और मौजूदा गतिविधियों के विस्तार पर प्रतिबंध है। इसके बावजूद यहां निर्माण कार्य किया गया और भारी मशीनों का इस्तेमाल किया गया। वन विभाग के दस्तावेजों में इसे नियमों के उल्लंघन के तौर पर दर्ज किया गया है।
इसके अलावा आरोप है कि निर्माण कार्य के दौरान काष्ठ चिरान अधिनियम 1984, भारतीय वन अधिनियम 1927 और पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 के प्रावधानों की अनदेखी की गई। हालांकि संबंधित अधिकारियों की ओर से इस मामले में अभी तक कोई विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 की धारा 20 के अनुसार संरक्षित क्षेत्रों में जमीन पर अधिकार हासिल करने को लेकर कई प्रतिबंध लगाए गए हैं। नियमों के मुताबिक उत्तराधिकार के अलावा अन्य माध्यमों से भूमि पर अधिकार प्राप्त नहीं किया जा सकता। इसके बावजूद संबंधित क्षेत्र में जमीन खरीद-बिक्री और निर्माण गतिविधियों को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
मध्य प्रदेश सरकार ने 15 फरवरी 2026 को छतरपुर कलेक्टर को इस संबंध में निर्देश जारी किए थे। इसके बावजूद क्षेत्र में भूमि से जुड़े मामलों और निर्माण गतिविधियों के जारी रहने का आरोप लगाया गया है।
इस मामले को लेकर केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (CEC) के समक्ष भी कार्रवाई की मांग रखी गई है। वन विभाग के दस्तावेजों में शिकायतकर्ता अजय दुबे द्वारा प्रस्तुत अभिलेखों का संज्ञान लेने और उचित कार्रवाई का अनुरोध किया गया है।
पन्ना टाइगर रिजर्व देश के प्रमुख बाघ अभयारण्यों में शामिल है और यहां बड़ी संख्या में वन्यजीव पाए जाते हैं। ऐसे संवेदनशील क्षेत्र में किसी भी निर्माण गतिविधि को लेकर पर्यावरणविद लगातार चिंता जताते रहे हैं। अब देखना होगा कि संबंधित विभाग और जांच एजेंसियां इस मामले में आगे क्या कदम उठाती हैं।