मुंबई। मशहूर शराब ब्रांड ‘मैकडॉवेल्स नंबर 1 सेलिब्रेशन मैच्योर्ड रम’ और ‘ओल्ड मॉन्क’ को लेकर चल रहा विवाद अब बॉम्बे हाईकोर्ट पहुंच गया है। सोमवार को मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) से उसकी ओर से जारी रोक संबंधी आदेशों को लेकर सवाल किए। अदालत ने प्रथम दृष्टया कहा कि मामला उत्पाद की गुणवत्ता या सुरक्षा से ज्यादा लेबलिंग से जुड़ा हुआ दिखाई दे रहा है।

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश रवींद्र घुगे और न्यायमूर्ति गौतम अंखाड की पीठ यूनाइटेड स्पिरिट्स लिमिटेड और मोहन मीकिन लिमिटेड की याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। दोनों कंपनियों ने अपने विनिर्माण संयंत्रों के निरीक्षण के बाद FSSAI की ओर से जारी आदेशों को चुनौती दी है। कंपनियों का कहना है कि नियामक की कार्रवाई से पहले उन्हें अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया।

कंपनियों ने कार्रवाई को दी चुनौती

यूनाइटेड स्पिरिट्स लिमिटेड की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता वीरेंद्र सराफ ने अदालत के सामने कंपनी का पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि रोक का आदेश जारी करने से पहले कंपनी को उचित सुनवाई का अवसर नहीं मिला। उनके मुताबिक संबंधित उत्पाद लंबे समय से एक ही प्रक्रिया के तहत बनाए जा रहे हैं और इनके संबंध में गुणवत्ता या उपभोक्ताओं को नुकसान पहुंचने की कोई शिकायत सामने नहीं आई है।

कंपनी की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि यदि उत्पाद से जुड़ी कोई गंभीर सुरक्षा समस्या होती तो इतने लंबे समय में उसके संबंध में शिकायतें सामने आतीं। वकील ने अदालत के समक्ष यह सवाल भी रखा कि क्या केवल किसी उपभोक्ता की शिकायत के आधार पर नियामकीय कार्रवाई की जा सकती है।

‘उत्पाद से किसी नुकसान की बात नहीं’

सुनवाई के दौरान यूनाइटेड स्पिरिट्स की ओर से यह दलील दी गई कि किसी के मामले में यह आरोप नहीं है कि संबंधित रम के सेवन से उपभोक्ताओं को नुकसान पहुंचा है। कंपनी का कहना है कि उत्पाद लंबे समय से बाजार में उपलब्ध है और उसकी गुणवत्ता को लेकर पहले कोई ऐसी समस्या सामने नहीं आई, जिसके आधार पर इस तरह की कार्रवाई की जरूरत पड़े।

कंपनी ने अदालत के सामने यह भी संकेत दिया कि FSSAI की कार्रवाई के कारण उसके कारोबार और उत्पादन पर असर पड़ सकता है। ऐसे में नियामकीय आदेश जारी करने से पहले कंपनी को सुनवाई का अवसर दिया जाना जरूरी था।

मोहन मीकिन ने भी रखा अपना पक्ष

ओल्ड मॉन्क बनाने वाली कंपनी मोहन मीकिन लिमिटेड की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नवरोज सीरवाई ने भी अदालत में कंपनी का पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि रिकॉर्ड के आधार पर यह दिखाया जा सकता है कि कंपनी का उत्पाद निर्धारित मानकों का अनुपालन करता है।

कंपनी की ओर से यह तर्क दिया गया कि उत्पाद को लेकर मूल विवाद इस बात से जुड़ा है कि उसे किस श्रेणी में रखा जाए और उसके लेबल पर क्या जानकारी दी जानी चाहिए। यानी मामला सीधे तौर पर उपभोक्ता स्वास्थ्य या उत्पाद की सुरक्षा से जुड़ा होने के बजाय नियामकीय वर्गीकरण और लेबलिंग का मुद्दा प्रतीत होता है।

FSSAI ने निरीक्षण के बाद की कार्रवाई

दोनों कंपनियों के विनिर्माण संयंत्रों के निरीक्षण के बाद FSSAI की ओर से कार्रवाई की गई थी। रिपोर्टों के मुताबिक नियामक की आपत्तियां लेबलिंग के साथ-साथ उत्पाद की संरचना और फ्लेवरिंग एजेंट के इस्तेमाल से संबंधित थीं। इसके बाद संबंधित उत्पादों के नए स्टॉक के निर्माण और बिक्री को लेकर रोक संबंधी आदेश जारी किए गए।

रिपोर्टों के अनुसार, FSSAI की ओर से मौजूदा स्टॉक को कुछ शर्तों के साथ बाजार से निकालने की अनुमति दी गई थी, जबकि नए स्टॉक के निर्माण और बिक्री पर रोक का प्रावधान बना रहा। कंपनियों ने इसी कार्रवाई को हाईकोर्ट में चुनौती दी है।

लेबल बदलने का भी उठा मुद्दा

मामले में उत्पादों के लेबल को लेकर भी महत्वपूर्ण सवाल सामने आया है। पहले की सुनवाई में नियामक की ओर से मौजूदा स्टॉक को नए लेबल के साथ बाजार में उतारने की व्यवस्था का मुद्दा सामने आया था। वहीं कंपनी की ओर से कहा गया कि शराब की बोतलों के लेबल में बदलाव के लिए राज्य आबकारी विभाग से भी मंजूरी की आवश्यकता होती है। ऐसे में तत्काल लेबल बदलना व्यावहारिक रूप से आसान नहीं है।

यही वजह है कि कंपनियां अदालत से FSSAI के आदेशों पर पुनर्विचार और उचित प्रक्रिया अपनाने की मांग कर रही हैं।

अदालत ने उठाया अहम सवाल

सोमवार की सुनवाई में हाईकोर्ट की टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि अदालत ने सीधे तौर पर यह जानना चाहा कि नियामकीय कार्रवाई का आधार क्या है। अदालत ने संकेत दिया कि यदि उत्पाद की गुणवत्ता या सुरक्षा को लेकर कोई गंभीर समस्या नहीं है तो विवाद का मुख्य मुद्दा लेबलिंग हो सकता है।

हालांकि, अदालत ने अभी इस मामले में अंतिम फैसला नहीं दिया है। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी। फिलहाल कंपनियों की याचिकाएं विचाराधीन हैं और FSSAI की कार्रवाई को चुनौती देने वाला विवाद न्यायिक परीक्षण के दौर में है।

शराब उद्योग पर भी पड़ सकता है असर

मैकडॉवेल्स और ओल्ड मॉन्क जैसे लोकप्रिय ब्रांडों से जुड़ा मामला केवल दो कंपनियों तक सीमित नहीं माना जा रहा है। यह विवाद शराब उद्योग में उत्पाद की श्रेणी, निर्माण प्रक्रिया, फ्लेवरिंग और लेबलिंग से जुड़े नियामकीय मानकों को लेकर व्यापक सवाल खड़े कर सकता है।

यदि अदालत इस मामले में लेबलिंग और नियामकीय अनुपालन को लेकर कोई महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश देती है तो उसका असर समान उत्पाद बनाने वाली अन्य कंपनियों पर भी पड़ सकता है। खासतौर पर उन कंपनियों के लिए यह मामला महत्वपूर्ण होगा, जिनके उत्पाद लंबे समय से एक ही निर्माण प्रक्रिया और लेबलिंग व्यवस्था के तहत बाजार में बिक रहे हैं।

फिलहाल बॉम्बे हाईकोर्ट में मामले की सुनवाई जारी है। कंपनियां अपने उत्पादों को निर्धारित मानकों के अनुरूप बता रही हैं, जबकि FSSAI की कार्रवाई नियामकीय अनुपालन से जुड़े सवालों पर आधारित है। अदालत की अगली सुनवाई में यह स्पष्ट हो सकता है कि विवाद को लेकर दोनों पक्षों की दलीलों और नियामक के आदेशों की वैधता पर कोर्ट किस दिशा में आगे बढ़ता है।

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