चेन्नई: तमिलनाडु की सामाजिक न्याय मंत्री और विदुथलाई चिरुथिगल काची (वीसीके) की डिप्टी जनरल सेक्रेटरी वन्नी अरुसा ने राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (NEET) में कथित गड़बड़ियों की जांच के लिए केंद्र सरकार द्वारा गठित हाई-लेवल कमेटी पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा गठित यह समिति वास्तविक समस्या का समाधान करने के बजाय लोगों को भ्रमित करने का प्रयास है।
वन्नी अरुसा ने अपने आधिकारिक 'X' (पूर्व में ट्विटर) अकाउंट पर एक पोस्ट साझा करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने NEET परीक्षा में सामने आई अनियमितताओं और विवादों से निपटने के लिए इंफोसिस के सह-संस्थापक नंदन नीलेकणि की अध्यक्षता में विशेषज्ञों की एक हाई-लेवल कमेटी बनाने की घोषणा की है। उन्होंने इस कदम को "धोखा" बताते हुए कहा कि केवल समिति गठित कर देने से परीक्षा प्रणाली में व्याप्त खामियां दूर नहीं होंगी।
उन्होंने कहा कि NEET परीक्षा को लेकर लंबे समय से छात्रों, अभिभावकों और विभिन्न राज्यों की सरकारों द्वारा गंभीर सवाल उठाए जाते रहे हैं। हर वर्ष परीक्षा प्रक्रिया, प्रश्नपत्र लीक, मूल्यांकन और पारदर्शिता को लेकर विवाद सामने आते हैं। ऐसे में केवल नई समिति बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि परीक्षा प्रणाली में व्यापक और ठोस सुधार किए जाने की आवश्यकता है।
वन्नी अरुसा ने अपने बयान में आरोप लगाया कि केंद्र सरकार शिक्षा व्यवस्था से जुड़े मूलभूत मुद्दों पर गंभीरता से काम करने के बजाय समितियों के गठन के जरिए जनता का ध्यान भटकाने का प्रयास कर रही है। उन्होंने कहा कि यदि सरकार वास्तव में छात्रों के हितों की रक्षा करना चाहती है तो उसे परीक्षा प्रणाली में जवाबदेही सुनिश्चित करनी चाहिए और सभी आरोपों की निष्पक्ष एवं पारदर्शी जांच करानी चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि तमिलनाडु लगातार NEET परीक्षा का विरोध करता रहा है। राज्य सरकार का मानना है कि यह परीक्षा ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के छात्रों के लिए समान अवसर उपलब्ध नहीं कराती। उनका कहना था कि राज्य ने मेडिकल प्रवेश के लिए वैकल्पिक व्यवस्था की मांग भी कई बार उठाई है, लेकिन केंद्र सरकार ने उस पर सकारात्मक निर्णय नहीं लिया।
सामाजिक न्याय मंत्री ने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य सभी छात्रों को समान अवसर देना होना चाहिए। यदि परीक्षा प्रणाली पर लगातार सवाल उठ रहे हैं और छात्रों का भरोसा कमजोर हो रहा है, तो सरकार की जिम्मेदारी है कि वह केवल औपचारिक कदम उठाने के बजाय ठोस सुधार लागू करे। उन्होंने आरोप लगाया कि हाई-लेवल कमेटी का गठन समस्या के मूल कारणों को दूर करने के बजाय एक औपचारिक प्रक्रिया बनकर रह जाएगा।
उन्होंने यह भी कहा कि छात्रों और अभिभावकों के मन में परीक्षा की निष्पक्षता को लेकर पैदा हुई शंकाओं को दूर करना सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है। यदि परीक्षा प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और विश्वसनीय नहीं होगी तो लाखों छात्रों का भविष्य प्रभावित हो सकता है।
वन्नी अरुसा के इस बयान के बाद NEET को लेकर राजनीतिक बहस एक बार फिर तेज हो गई है। तमिलनाडु में सत्तारूढ़ दल और उसके सहयोगी लंबे समय से NEET परीक्षा का विरोध करते रहे हैं और इसे राज्य के छात्रों के हितों के खिलाफ बताते रहे हैं। दूसरी ओर, केंद्र सरकार का कहना है कि NEET देशभर में मेडिकल प्रवेश प्रक्रिया को एक समान, पारदर्शी और मेरिट आधारित बनाने के उद्देश्य से लागू की गई है।
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि राष्ट्रीय स्तर की किसी भी परीक्षा की विश्वसनीयता बनाए रखना बेहद महत्वपूर्ण है। यदि परीक्षा प्रक्रिया में किसी प्रकार की गड़बड़ी या अनियमितता के आरोप सामने आते हैं, तो उनकी निष्पक्ष जांच और आवश्यक सुधार समय पर किए जाने चाहिए ताकि छात्रों का भरोसा बना रहे।
फिलहाल, वन्नी अरुसा के बयान ने NEET परीक्षा और उससे जुड़े विवादों पर नई राजनीतिक चर्चा को जन्म दे दिया है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि केंद्र सरकार हाई-लेवल कमेटी की कार्यप्रणाली और उसके सुझावों को किस प्रकार आगे बढ़ाती है तथा परीक्षा प्रणाली में सुधार को लेकर क्या ठोस कदम उठाए जाते हैं। इस बीच, तमिलनाडु में NEET को लेकर विरोध का स्वर पहले की तरह जारी रहने के संकेत मिल रहे हैं।