लखनऊ:  उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार किसानों की जमीन से जुड़ी समस्याओं के समाधान और चकबंदी व्यवस्था को मजबूत बनाने की दिशा में लगातार काम कर रही है। प्रदेश में वर्षों से लंबित चकबंदी प्रक्रिया को पूरा कराने, भूमि विवादों का समयबद्ध निस्तारण करने और विभागीय व्यवस्थाओं को अधिक पारदर्शी बनाने पर विशेष जोर दिया जा रहा है। चकबंदी निदेशालय की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2017 की तुलना में वर्ष 2025 तक चकबंदी पूरी करने वाले गांवों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। इसके साथ ही चकबंदी न्यायालयों के कंप्यूटरीकरण और लाखों लंबित मामलों के निस्तारण की दिशा में भी प्रगति हुई है। सरकार का उद्देश्य किसानों को जमीन से संबंधित समस्याओं से राहत दिलाने के साथ राजस्व अभिलेखों को व्यवस्थित करना है।
चकबंदी निदेशालय के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2017 में प्रदेश के 1,925 गांवों में चकबंदी प्रक्रिया पूरी होने की स्थिति दर्ज की गई थी। वर्ष 2025 तक यह संख्या बढ़कर 3,192 गांव हो गई। दोनों अवधियों के आंकड़ों में 1,267 गांवों की वृद्धि दर्ज की गई है। चकबंदी पूरी होने के बाद संबंधित गांवों के राजस्व अभिलेख तहसील प्रशासन को वापस सौंपने की प्रक्रिया भी अपनाई गई है। इससे भूमि संबंधी रिकॉर्ड को व्यवस्थित करने और भविष्य में होने वाली प्रशासनिक परेशानियों को कम करने में सहायता मिलने की उम्मीद है।
दरअसल, चकबंदी कृषि भूमि के बिखरे हुए छोटे-छोटे टुकड़ों को व्यवस्थित करने की एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। इसके अंतर्गत किसानों की अलग-अलग स्थानों पर स्थित जमीन को निर्धारित कानूनी नियमों के अनुसार अधिक संगठित रूप देने का प्रयास किया जाता है। इसका प्रमुख उद्देश्य खेती को सुविधाजनक बनाना, भूमि की सीमाओं से जुड़े विवाद कम करना और कृषि कार्यों में होने वाली अनावश्यक परेशानियों को दूर करना है।
प्रदेश के कई गांवों में किसानों की जमीन अलग-अलग स्थानों पर बंटी होती है। ऐसी स्थिति में खेतों तक पहुंचने, सिंचाई की व्यवस्था करने और कृषि मशीनों का इस्तेमाल करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। चकबंदी के माध्यम से इन समस्याओं को कम करने की कोशिश की जाती है। हालांकि, इस प्रक्रिया में भूमि के मूल्यांकन, हिस्सेदारी और सीमांकन से संबंधित आपत्तियां भी सामने आती हैं, जिनका नियमानुसार निस्तारण आवश्यक होता है।
प्रदेश सरकार का कहना है कि चकबंदी के पुराने मामलों को प्राथमिकता के आधार पर पूरा कराने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं। जिन गांवों में लंबे समय से प्रक्रिया लंबित है, वहां संबंधित अधिकारियों को स्थिति की समीक्षा करने और आवश्यक कानूनी कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं।
विभागीय आंकड़ों के अनुसार, पिछले आठ वर्षों के दौरान चकबंदी से जुड़े 21.12 लाख से अधिक वादों का निस्तारण किया गया है। इतनी बड़ी संख्या में मामलों के निपटारे को विभागीय स्तर पर महत्वपूर्ण प्रगति के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, लंबित मामलों की वास्तविक स्थिति और नए दर्ज होने वाले विवादों की संख्या को देखते हुए आगे भी निरंतर कार्रवाई की आवश्यकता बनी हुई है।
चकबंदी व्यवस्था को आधुनिक तकनीक से जोड़ने के लिए न्यायालयों के कंप्यूटरीकरण पर भी विशेष ध्यान दिया गया है। निदेशालय के अनुसार, वर्ष 2017 में इस श्रेणी में कंप्यूटरीकृत न्यायालयों की संख्या शून्य दर्ज थी, जबकि वर्ष 2025 तक 531 चकबंदी न्यायालयों का कंप्यूटरीकरण किया गया। इनमें उप संचालक चकबंदी, बंदोबस्त अधिकारी चकबंदी और चकबंदी अधिकारी के न्यायालयों के अलावा 180 सहायक चकबंदी अधिकारी न्यायालय भी शामिल हैं।
न्यायालयों के कंप्यूटरीकरण से अभिलेखों के रखरखाव, मामलों की जानकारी उपलब्ध कराने और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को अधिक व्यवस्थित बनाने में मदद मिल सकती है। डिजिटल रिकॉर्ड के माध्यम से संबंधित अधिकारियों को दस्तावेजों तक पहुंचने और मामलों की स्थिति की समीक्षा करने में सुविधा मिलने की उम्मीद है।
वहीं, चकबंदी निदेशालय ने नवप्रसार से संबंधित आंकड़े भी जारी किए हैं। विभागीय विवरण के अनुसार, बीते आठ वर्षों में 1,302 गांवों को चकबंदी के नवप्रसार की श्रेणी में शामिल किया गया। वर्ष 2017 में इस श्रेणी में 2,468 गांवों की स्थिति दर्ज थी, जबकि वर्ष 2025 में संख्या 1,302 बताई गई है। चकबंदी पूरी होने वाले गांवों और नवप्रसार के अंतर्गत शामिल गांवों की श्रेणियां अलग हैं। इसलिए दोनों आंकड़ों को एक ही आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए।
पुराने मामलों के निस्तारण के तहत सरकार ने हाल के महीनों में भी कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। सितंबर में छह जिलों के 13 गांवों को उत्तर प्रदेश जोत चकबंदी अधिनियम की धारा 6(1) के तहत चकबंदी प्रक्रिया से अलग किया गया था। इनमें ऐसे गांव भी शामिल थे, जहां कई वर्षों से प्रक्रिया लंबित थी। वहीं, मुजफ्फरनगर के पीपलशाह गांव में लगभग 16 वर्षों से चल रही चकबंदी प्रक्रिया पूरी की गई।
इसके अलावा अक्टूबर में आठ जिलों के 11 गांवों में चकबंदी प्रक्रिया पूरी करने की जानकारी सामने आई। इनमें महाराजगंज, बुलंदशहर और चित्रकूट सहित अन्य जिलों के गांव शामिल थे। कुछ स्थानों पर चकबंदी का काम 12 से 18 वर्षों से लंबित था। अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि लंबे समय से लंबित वादों का प्राथमिकता के आधार पर निस्तारण किया जाए।
चकबंदी आयुक्त डॉ. हृषिकेश भास्कर यशोद ने अधिकारियों को निर्धारित नियमों का पालन सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने स्पष्ट किया है कि किसी गांव में चकबंदी प्रक्रिया समाप्त होने के बाद संबंधित अभिलेख नियमानुसार तहसील प्रशासन को सौंपे जाने चाहिए। प्रक्रिया पूरी होने के बाद संबंधित चकबंदी अधिकारियों का क्षेत्राधिकार भी समाप्त हो जाता है। ऐसे मामलों में आगे की कार्रवाई निर्धारित कानूनी व्यवस्था के अनुसार ही की जा सकती है।
सरकार विभागीय मानव संसाधन की क्षमता बढ़ाने और कार्यप्रणाली को अधिक प्रभावी बनाने पर भी जोर दे रही है। चकबंदी अधिकारियों और कर्मचारियों के बीच बेहतर समन्वय, लंबित मामलों की नियमित समीक्षा तथा अभिलेखों के उचित रखरखाव को इस दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
किसानों के लिए चकबंदी प्रक्रिया समय पर पूरी होना बेहद जरूरी है। लंबे समय तक भूमि विवाद लंबित रहने से खेती से संबंधित फैसलों, जमीन के उपयोग और अन्य राजस्व कार्यों में परेशानियां उत्पन्न हो सकती हैं। ऐसे में प्रक्रिया का पारदर्शी और निष्पक्ष तरीके से पूरा होना किसानों के हित में महत्वपूर्ण है।
फिलहाल योगी सरकार का जोर पुराने गांवों में लंबित चकबंदी कार्य पूरा कराने और भूमि संबंधी मामलों के निस्तारण में तेजी लाने पर है। विभागीय आंकड़े बताते हैं कि चकबंदी पूरी करने वाले गांवों, न्यायालयों के कंप्यूटरीकरण और वादों के निस्तारण में प्रगति हुई है। आने वाले समय में इन प्रयासों की सफलता का महत्वपूर्ण आधार यही होगा कि किसानों को जमीन से जुड़े विवादों में कितनी जल्दी और प्रभावी राहत मिलती है।
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