प्रयागराज : उत्तर प्रदेश के सरकारी बेसिक स्कूलों में कार्यरत शिक्षकों के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण आदेश जारी किया है। राज्य में फर्जी शैक्षणिक प्रमाणपत्रों और दूसरे व्यक्तियों के दस्तावेजों के आधार पर शिक्षक नियुक्ति के मामले सामने आने के बाद अदालत ने कक्षा एक से आठ तक पढ़ाने वाले सभी शिक्षकों के शैक्षणिक प्रमाणपत्रों और नियुक्ति पत्रों की जांच कराने का निर्देश दिया है। इस व्यापक सत्यापन की जिम्मेदारी उत्तर प्रदेश की स्पेशल टास्क फोर्स (STF) को सौंपी गई है। न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की अदालत ने 16 अक्टूबर 2026 को आदेश जारी करते हुए शिक्षकों को संबंधित बेसिक शिक्षा अधिकारी (BSA) की अधिसूचना मिलने के एक सप्ताह के भीतर अपने दस्तावेज जमा करने को कहा है। अदालत ने शिक्षा विभाग और एसटीएफ के वरिष्ठ अधिकारियों को पूरी प्रक्रिया की निगरानी करने का निर्देश भी दिया है।
एक ही सर्टिफिकेट पर 10 लोगों की नौकरी का मामला
इस मामले में सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह सामने आया कि कथित तौर पर एक ही व्यक्ति के शैक्षणिक प्रमाणपत्रों का इस्तेमाल करके 10 या उससे अधिक लोगों ने शिक्षक की नौकरी हासिल कर ली। अदालत को बताया गया कि राज्य में ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिनमें फर्जी शैक्षणिक दस्तावेजों या किसी दूसरे व्यक्ति की शैक्षणिक योग्यता का इस्तेमाल कर नियुक्तियां प्राप्त की गईं। इन तथ्यों पर गंभीर चिंता जताते हुए हाईकोर्ट ने पूरे प्रदेश में शिक्षकों के दस्तावेजों का सत्यापन कराने का आदेश दिया। अदालत का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सरकारी विद्यालयों में नियुक्त शिक्षकों की शैक्षणिक योग्यता और नियुक्ति संबंधी रिकॉर्ड वास्तविक एवं वैध हों।
एक सप्ताह में जमा करने होंगे नियुक्ति पत्र और प्रमाणपत्र
हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार, सरकारी बेसिक स्कूलों में कक्षा एक से आठ तक पढ़ाने वाले सभी शिक्षकों को अपने नियुक्ति पत्र और शैक्षणिक प्रमाणपत्रों की स्पष्ट एवं पढ़ने योग्य प्रतियां संबंधित जिले के बेसिक शिक्षा अधिकारी के कार्यालय में जमा करनी होंगी। बीएसए कार्यालय शिक्षकों से प्राप्त दस्तावेजों को संबंधित एसटीएफ रेंज कार्यालय में भेजेगा। इसके बाद एसटीएफ इन दस्तावेजों का सत्यापन करेगी। अदालत ने एसटीएफ को दस्तावेज जांचने के लिए व्यवस्थित कार्यप्रणाली विकसित करने के निर्देश दिए हैं। आवश्यकता पड़ने पर संबंधित जिले के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक या पुलिस आयुक्त की सहायता भी ली जा सकती है।
शिक्षकों को देना होगा नोटरी से सत्यापित हलफनामा
शैक्षणिक प्रमाणपत्रों और नियुक्ति पत्रों के अतिरिक्त अदालत ने सभी संबंधित शिक्षकों को नोटरी से सत्यापित हलफनामा देने का भी निर्देश दिया है। इस हलफनामे में शिक्षकों को अपने ऐसे करीबी रिश्तेदारों की जानकारी देनी होगी, जो उत्तर प्रदेश के शिक्षा विभाग में बेसिक शिक्षा अधिकारी या उससे ऊपर के पद पर कार्यरत हैं अथवा पहले ऐसे पदों पर रह चुके हैं। जिन शिक्षकों का कोई करीबी रिश्तेदार इन पदों पर नहीं रहा है, उन्हें भी इस संबंध में घोषणा देनी होगी। इस निर्देश का उद्देश्य नियुक्ति प्रक्रिया से संबंधित संभावित अनियमितताओं की पड़ताल करना है।
शिक्षा निदेशक और एसटीएफ के एडीजी करेंगे निगरानी
हाईकोर्ट ने दस्तावेज सत्यापन अभियान की निगरानी के लिए जिम्मेदारी तय कर दी है। राज्य के शिक्षा निदेशक बीएसए कार्यालयों द्वारा संचालित दस्तावेज संकलन और सत्यापन से संबंधित प्रक्रिया की निगरानी करेंगे। जरूरत पड़ने पर वे दैनिक प्रगति की समीक्षा के लिए अलग अधिकारी भी नियुक्त कर सकते हैं। इसी तरह एसटीएफ के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक को दस्तावेजों के सत्यापन और जांच की निगरानी करने का निर्देश दिया गया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि जांच प्रक्रिया में लापरवाही या जिम्मेदारी निभाने में चूक को गंभीरता से लिया जाएगा। संबंधित अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही भी तय की जा सकती है।
कुसुमलता की याचिका से सामने आया मामला
यह पूरा मामला कुसुमलता नाम की एक शिक्षिका की याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया। अदालत के पूर्व निर्देश के बाद लखनऊ एसटीएफ के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक कार्यालय से रिपोर्ट प्रस्तुत की गई थी। रिपोर्ट के अनुसार, याचिकाकर्ता पर आरोप है कि उन्होंने कुसुमलता श्रीवास्तव नाम की दूसरी महिला के शैक्षणिक दस्तावेजों का इस्तेमाल करके शिक्षक की नौकरी हासिल की। कुसुमलता श्रीवास्तव गोरखपुर जिले के एक सरकारी विद्यालय में सहायक अध्यापक के पद पर पहले से कार्यरत थीं। एसटीएफ की रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि याचिकाकर्ता 12 और 13 अक्टूबर को अपने दस्तावेजों के सत्यापन के लिए उपस्थित नहीं हुई थीं। इस मामले की जांच के दौरान प्रदेश में कथित फर्जी नियुक्तियों से संबंधित अन्य घटनाओं की जानकारी भी सामने आई।
सरकारी स्कूलों में घटती छात्र संख्या पर चिंता
सुनवाई के दौरान इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के प्राथमिक विद्यालयों में विद्यार्थियों की घटती संख्या और शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर भी चिंता व्यक्त की। अदालत ने टिप्पणी की कि राज्य में बड़ी संख्या में प्राथमिक विद्यालय विद्यार्थियों की कमी के कारण बंद हुए हैं। हाईकोर्ट ने कहा कि सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों को निःशुल्क पाठ्यपुस्तकें, मध्यान्ह भोजन, यूनिफॉर्म और अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। इसके बावजूद शिक्षा की गुणवत्ता और शिक्षकों के प्रदर्शन से संबंधित समस्याएं चिंता का विषय बनी हुई हैं। अदालत ने गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए शिक्षकों की योग्यता, जिम्मेदारी और नियुक्ति प्रक्रिया की पारदर्शिता को महत्वपूर्ण बताया।
4 नवंबर को होगी अगली सुनवाई
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 4 नवंबर 2026 की तारीख निर्धारित की है। अगली सुनवाई में अदालत अपने निर्देशों के अनुपालन की स्थिति की समीक्षा करेगी। शिक्षा विभाग और एसटीएफ की ओर से सत्यापन प्रक्रिया की प्रगति से संबंधित जानकारी प्रस्तुत की जाएगी। इस आदेश के बाद उत्तर प्रदेश के सरकारी बेसिक स्कूलों के शिक्षकों को अपने शैक्षणिक प्रमाणपत्र, नियुक्ति पत्र और आवश्यक हलफनामे तैयार रखने होंगे। हालांकि, दस्तावेजों की जांच कराने का आदेश सभी शिक्षकों पर किसी अनियमितता का आरोप नहीं है। इसका उद्देश्य संदिग्ध नियुक्तियों की पहचान और वैध अभिलेखों का सत्यापन करना है।
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