राहुल गांधी का बड़ा कदम, ज्ञानेश कुमार और SIR के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका
ज्ञानेश कुमार के फैसलों पर सवाल
दिल्ली। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और विपक्षी गठबंधन के 10 अन्य नेताओं ने चुनाव आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। सोमवार शाम दाखिल याचिका में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के अधिकारों, मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया और चुनाव आयोग के डिजिटल डेटाबेस की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ताओं ने SIR प्रक्रिया की कानूनी वैधता की जांच कराने और सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में स्वतंत्र जांच समिति गठित करने की मांग की है।
SIR को अवैध घोषित करने की मांग
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, राहुल गांधी इस मामले में मुख्य याचिकाकर्ता हैं। उनके साथ विपक्षी दलों के 10 अन्य नेता भी याचिका में शामिल हैं। याचिका में चुनाव आयोग के SIR कराने के फैसले को अवैध घोषित करने की मांग की गई है। साथ ही अदालत से यह जांचने का अनुरोध किया गया है कि प्रक्रिया लागू करते समय आयोग ने कानून के तहत निर्धारित अधिकारों और प्रक्रियाओं का पालन किया या नहीं। याचिकाकर्ताओं ने यह सवाल भी उठाया है कि क्या चुनाव आयोग ने अपनी शक्तियों का इस्तेमाल निर्धारित उद्देश्य से अलग तरीके से किया। कानूनी भाषा में इसे शक्तियों का छद्म प्रयोग कहा जाता है।
मुख्य चुनाव आयुक्त के फैसलों पर सवाल
याचिका में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की निर्णय लेने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि कुछ महत्वपूर्ण फैसले अन्य दो चुनाव आयुक्तों की जानकारी और सहमति के बिना लिए गए। इस संबंध में 23 सितंबर 2026 को प्रकाशित एक रिपोर्ट का हवाला दिया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 अवसरों पर अन्य चुनाव आयुक्तों ने विभिन्न मुद्दों पर आपत्तियां जताई थीं। ये मुद्दे मतदाता पंजीकरण, नाम हटाने, दोबारा नाम जोड़ने और चुनावी आंकड़ों तक पहुंच से संबंधित बताए गए हैं। हालांकि, चुनाव आयोग का पक्ष है कि फैसले सर्वसम्मति से लिए गए और विचारों में अंतर निर्णय प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा है।
देशभर में SIR लागू करने की मंजूरी पर विवाद
याचिका में 24 जून 2025 के आदेश को लेकर भी सवाल उठाया गया है। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, सूचना के अधिकार के तहत देशव्यापी SIR की मंजूरी से संबंधित दस्तावेज मांगे गए थे। आरोप है कि आयोग ने केवल 24 जून का आदेश उपलब्ध कराया। याचिका में दावा किया गया है कि प्रथम अपीलीय प्राधिकारी के रिकॉर्ड और आयोग के बाद के बयानों में अंतर दिखाई देता है। वहीं, चुनाव आयोग ने 26 सितंबर 2026 की प्रेस विज्ञप्ति में सर्वसम्मति से मंजूरी दिए जाने की बात कही थी। याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट से संबंधित मूल फाइल मंगाने का अनुरोध किया है।
1995 के सुप्रीम कोर्ट फैसले का हवाला
याचिका में टीएन शेषन बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के 1995 के फैसले का उल्लेख किया गया है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि मुख्य चुनाव आयुक्त को अन्य चुनाव आयुक्तों से अधिक निर्णयकारी अधिकार प्राप्त नहीं हैं। वर्ष 2023 के संबंधित कानून की धारा 18 के अनुसार, जहां संभव हो, निर्णय सर्वसम्मति से और मतभेद की स्थिति में बहुमत से लिए जाने चाहिए। याचिका में कहा गया है कि सामूहिक अधिकारों का एकतरफा इस्तेमाल संविधान के अनुच्छेद 324 से जुड़े सवाल पैदा कर सकता है।
स्वतंत्र जांच समिति बनाने की मांग
याचिकाकर्ताओं ने मतदाता सूची में नाम हटाने की प्रक्रिया और डिजिटल डेटाबेस की विश्वसनीयता की स्वतंत्र जांच कराने का अनुरोध किया है। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में समिति गठित करने की मांग रखी गई है। फिलहाल ये याचिका में उठाए गए आरोप और कानूनी सवाल हैं। इनकी वैधता तथा संबंधित मांगों पर अंतिम निर्णय सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के बाद ही होगा।