टोरंटो/बीजिंग। चीन पर अपनी सीमाओं के बाहर रहने वाले मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और आलोचकों को डराने-धमकाने के आरोप एक बार फिर चर्चा में हैं। कनाडा में रहने वाले प्रसिद्ध तिब्बती विद्वान और शिक्षाविद डॉ. ग्याल लो को चीन से जुड़े एक कानूनी मामले में दस्तावेज भेजे जाने के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता जताई गई है। मानवाधिकार संगठन तिब्बत एक्शन इंस्टीट्यूट ने आरोप लगाया है कि चीन अपने आलोचकों को चुप कराने के लिए कानूनी प्रक्रियाओं का इस्तेमाल कर रहा है। संगठन ने इस मामले को सीमा पार दमन यानी ट्रांसनेशनल रिप्रेशन का उदाहरण बताया है।डॉ. ग्याल लो लंबे समय से तिब्बत में बच्चों के लिए संचालित आवासीय विद्यालयों और चीन की शिक्षा नीतियों पर शोध कर रहे हैं। उनका आरोप है कि इन विद्यालयों के माध्यम से तिब्बती बच्चों को उनकी मातृभाषा, संस्कृति और पारिवारिक परिवेश से दूर किया जा रहा है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी इस मुद्दे को उठाया है।
टोरंटो स्थित घर पर पहुंचे चीनी कानूनी दस्तावेज
तिब्बत एक्शन इंस्टीट्यूट की 29 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, 23 सितंबर को डॉ. ग्याल लो के टोरंटो स्थित घर पर चीन के न्याय मंत्रालय के अंतरराष्ट्रीय कानूनी सहयोग केंद्र से संबंधित दस्तावेज पहुंचाए गए थे।उस समय डॉ. ग्याल लो संयुक्त राष्ट्र से जुड़े कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए जिनेवा में थे। कानूनी दस्तावेज उनकी पत्नी को सौंपे गए।इन दस्तावेजों में चीन की युन्नान नॉर्मल यूनिवर्सिटी की ओर से दायर मुकदमे का उल्लेख था। यह वही विश्वविद्यालय है जहां डॉ. ग्याल लो पहले शिक्षण कार्य करते थे।रिपोर्ट के अनुसार, विश्वविद्यालय ने उनसे लगभग 2.03 लाख कनाडाई डॉलर यानी 9,65,134.52 चीनी युआन की मांग की है। यह विवाद उनके पूर्व रोजगार और अनुबंध से संबंधित बताया गया है।
सुनवाई की तारीख बीतने के बाद मिला नोटिस
इस मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू कानूनी दस्तावेजों में दर्ज सुनवाई की तारीख है।मानवाधिकार संगठन के अनुसार, दस्तावेजों में 15 सितंबर 2026 को चीन में सुनवाई के लिए उपस्थित होने का उल्लेख था, जबकि नोटिस 23 सितंबर को उनके घर पहुंचाया गया।संगठन का दावा है कि डॉ. ग्याल लो को मुकदमे की जानकारी सुनवाई की निर्धारित तारीख बीतने के बाद मिली।विश्वविद्यालय ने जून 2023 में पहले श्रम मध्यस्थता का दावा दायर किया था। संगठन के अनुसार, शुरुआती दावे असफल होने के बाद जनवरी 2025 में नया मुकदमा शुरू किया गया।फिलहाल कनाडा की किसी अदालत में डॉ. ग्याल लो के खिलाफ इस मामले में मुकदमा चलने की पुष्टि नहीं हुई है। आशंका जताई गई है कि चीन में प्राप्त किसी अदालती आदेश को भविष्य में कनाडा में लागू कराने का प्रयास किया जा सकता है।
तिब्बती बच्चों की शिक्षा पर शोध बना विवाद का केंद्र
डॉ. ग्याल लो शिक्षा समाजशास्त्र के विद्वान हैं। उन्होंने तिब्बत में आवासीय विद्यालयों की व्यवस्था पर लंबे समय तक शोध किया है।उनके अध्ययन का प्रमुख विषय यह रहा है कि इन विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों की भाषा, संस्कृति और पारिवारिक संबंधों पर क्या प्रभाव पड़ता है।तिब्बत एक्शन इंस्टीट्यूट का अनुमान है कि लगभग दस लाख तिब्बती बच्चे चीन की आवासीय शिक्षा व्यवस्था से जुड़े हैं। संगठन का आरोप है कि इस व्यवस्था के कारण बच्चों की सांस्कृतिक पहचान कमजोर हो रही है। हालांकि, यह संगठन का अनुमान और आरोप है, जिसकी स्वतंत्र पुष्टि इस रिपोर्ट में नहीं की गई है।डॉ. ग्याल लो ने अपने शोध और अनुभवों को अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मंचों पर प्रस्तुत किया है।
चीन छोड़कर कनाडा पहुंचे थे विद्वान
रिपोर्ट के मुताबिक, डॉ. ग्याल लो को वर्ष 2020 में विश्वविद्यालय में अपने रोजगार को लेकर विवाद का सामना करना पड़ा था।संगठन का आरोप है कि उनके शोध और मानवाधिकार संबंधी गतिविधियों के कारण राजनीतिक दबाव बढ़ा। बाद में उन्होंने चीन छोड़ दिया और कनाडा में रहने लगे।तिब्बत एक्शन इंस्टीट्यूट ने दावा किया है कि डॉ. ग्याल लो के परिवार के सदस्यों को तिब्बत में परेशान किया गया। इसके अलावा उनके खिलाफ चीनी सरकारी मीडिया में आलोचनात्मक सामग्री प्रकाशित होने और टोरंटो तथा जिनेवा में संदिग्ध निगरानी की घटनाओं के आरोप भी लगाए गए हैं।इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। डॉ. ग्याल लो ने कहा है कि वह तिब्बती बच्चों के अधिकारों के लिए आवाज उठाना जारी रखेंगे।
मानवाधिकार संगठन ने कनाडा सरकार से की अपील
तिब्बत एक्शन इंस्टीट्यूट की निदेशक ल्हाडोन टेथोंग ने इस कानूनी कार्रवाई को प्रतिशोधात्मक बताया है।उन्होंने आरोप लगाया कि डॉ. ग्याल लो के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय होने के बाद उनके खिलाफ दबाव बढ़ाया गया।संगठन ने कनाडा सरकार से विद्वान की सुरक्षा सुनिश्चित करने और विदेशी कानूनी प्रक्रियाओं के कथित दुरुपयोग के खिलाफ कदम उठाने की मांग की है।संगठन ने चीन के नए जातीय एकता संबंधी कानून पर भी चिंता व्यक्त की है। उसका कहना है कि इस कानून के कुछ प्रावधानों का इस्तेमाल विदेशों में रहने वाले आलोचकों के खिलाफ किया जा सकता है।
क्या है सीमा पार दमन?
सीमा पार दमन उस स्थिति को कहा जाता है, जब कोई सरकार अपने देश की सीमाओं के बाहर रहने वाले आलोचकों, कार्यकर्ताओं या समुदायों को धमकी, निगरानी, दबाव अथवा अन्य तरीकों से प्रभावित करने का प्रयास करती है।कनाडा सरकार ने अपनी आधिकारिक जानकारी में बताया है कि ऐसी गतिविधियों में विदेशी सरकारों द्वारा कानूनी प्रक्रियाओं का दुरुपयोग, परिवार के सदस्यों पर दबाव और डिजिटल उत्पीड़न जैसी रणनीतियां शामिल हो सकती हैं।अंतरराष्ट्रीय संगठन फ्रीडम हाउस भी चीन से जुड़ी सीमा पार दमन की गतिविधियों पर पहले चिंता जता चुका है। उसकी रिपोर्ट में तिब्बती, उइगर और अन्य प्रवासी समुदायों के खिलाफ दबाव के आरोप दर्ज हैं।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ी मानवाधिकारों की चिंता
डॉ. ग्याल लो का मामला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, विदेशी न्यायिक प्रक्रियाओं और प्रवासी समुदायों की सुरक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल उठाता है।हालांकि, संबंधित मुकदमे को राजनीतिक प्रतिशोध साबित करने वाला कोई स्वतंत्र न्यायिक निष्कर्ष उपलब्ध नहीं है। विश्वविद्यालय का दावा और मानवाधिकार संगठन के आरोप अलग-अलग पक्ष हैं, जिनकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है।फिलहाल इस विशेष मामले में चीन सरकार और संबंधित विश्वविद्यालय की विस्तृत प्रतिक्रिया की पुष्टि नहीं हो सकी है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि कनाडा सरकार इस मामले पर क्या रुख अपनाती है और कानूनी विवाद किस दिशा में आगे बढ़ता है।
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