World: धरती पर जरूरत के हिसाब से सूरज की रोशनी पहुंचाने की कल्पना अब हकीकत के करीब पहुंच रही है। अमेरिका के फेडरल कम्युनिकेशंस कमीशन (FCC) ने अंतरिक्ष में विशाल सौर दर्पण लगाकर पृथ्वी के चुनिंदा हिस्सों तक सूर्य की किरणें पहुंचाने वाली एक महत्वाकांक्षी परियोजना के परीक्षण को मंजूरी दे दी है।
इस परियोजना पर अमेरिकी कंपनी रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल काम कर रही है। कंपनी अपने ईयरेंडिल-1 सैटेलाइट के जरिए अंतरिक्ष से सूर्य की रोशनी को परावर्तित कर पृथ्वी के किसी निर्धारित स्थान तक पहुंचाने की तकनीक का परीक्षण करेगी। इसका उद्देश्य यह पता लगाना है कि क्या अंतरिक्ष में लगे दर्पणों की मदद से किसी इलाके में जरूरत के समय अतिरिक्त रोशनी उपलब्ध कराई जा सकती है।
एफसीसी ने इस परीक्षण को मंजूरी ऐसे समय दी है, जब वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों की ओर से इसके संभावित प्रभावों को लेकर कई चिंताएं जताई गई हैं। इसके बावजूद आयोग ने तकनीक की संभावनाओं को देखते हुए परीक्षण की अनुमति दी है।
कंपनी का दावा है कि यह तकनीक भविष्य में कई क्षेत्रों में उपयोगी साबित हो सकती है। प्राकृतिक आपदाओं या आपात परिस्थितियों के दौरान जहां बिजली की सुविधा उपलब्ध नहीं होती, वहां अंतरिक्ष से रोशनी पहुंचाकर राहत और बचाव कार्यों में मदद मिल सकती है। इसके अलावा कृषि, निर्माण और औद्योगिक गतिविधियों में भी इस तकनीक के इस्तेमाल की संभावना जताई जा रही है।
परीक्षण के दौरान सैटेलाइट से परावर्तित रोशनी करीब पांच किलोमीटर क्षेत्र तक पहुंचाने की योजना है। हालांकि पृथ्वी के लगातार घूमने के कारण सैटेलाइट की दिशा में बार-बार बदलाव करना पड़ेगा। वैज्ञानिकों के अनुसार, हर चार मिनट में सैटेलाइट को दोबारा लक्ष्य की ओर मोड़ना पड़ सकता है, ताकि रोशनी सही स्थान पर बनी रहे।
रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल का लक्ष्य वर्ष 2035 तक अंतरिक्ष में 50 हजार से अधिक सैटेलाइट का नेटवर्क तैयार करना है। कंपनी का कहना है कि इस बड़े नेटवर्क के जरिए किसी भी स्थान पर लंबे समय तक लगातार कृत्रिम रोशनी उपलब्ध कराई जा सकेगी।
हालांकि इस परियोजना को लेकर कई विशेषज्ञों ने सावधानी बरतने की सलाह दी है। वैज्ञानिकों का कहना है कि बड़ी संख्या में सैटेलाइट अंतरिक्ष में भेजे जाने से अंतरिक्ष में भीड़ बढ़ सकती है। इससे सैटेलाइटों के बीच टकराव का खतरा बढ़ सकता है और अंतरिक्ष मलबे की समस्या भी गंभीर हो सकती है।
इसके अलावा अंतरिक्ष से आने वाली तेज परावर्तित रोशनी को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह रोशनी विमान चालकों और वाहन चालकों के लिए परेशानी पैदा कर सकती है। रात के समय कृत्रिम रोशनी बढ़ने से इंसानों, पेड़-पौधों और वन्यजीवों की जैविक घड़ी यानी सर्केडियन रिदम पर भी असर पड़ सकता है।
पर्यावरण वैज्ञानिकों का कहना है कि किसी भी ऐसी तकनीक को बड़े स्तर पर लागू करने से पहले इसके दीर्घकालिक प्रभावों का अध्ययन जरूरी है। अंतरिक्ष आधारित सौर दर्पण तकनीक में कई संभावनाएं हैं, लेकिन इसके साथ सुरक्षा और पर्यावरण से जुड़े जोखिमों को भी ध्यान में रखना होगा।
फिलहाल यह परियोजना परीक्षण के शुरुआती चरण में है। यदि प्रयोग सफल रहता है तो भविष्य में यह तकनीक ऊर्जा, आपदा प्रबंधन और कृषि जैसे क्षेत्रों में नई संभावनाएं खोल सकती है। हालांकि इसका व्यापक इस्तेमाल करने से पहले वैज्ञानिकों को इसके प्रभावों का गहन अध्ययन करना होगा।