इस्लामाबाद: पाकिस्तान दक्षिण एशियाई देशों में उन देशों में शामिल है जो बच्चों के ऑनलाइन शोषण से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग (HRCP) के अनुसार, एक तुलनात्मक अध्ययन में पाया गया है कि देश में प्रति 10,000 लोगों पर लगभग 41.3 ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें लोग बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री (child sexual abuse material) के संपर्क में आए हैं।
HRCP ने अपनी ताजा रिपोर्ट में कहा है कि ये नतीजे बताते हैं कि पाकिस्तान न केवल बच्चों के शोषण का एक केंद्र है, बल्कि यह ऐसी सामग्री की मांग, उत्पादन और प्रसार करने वाले वैश्विक नेटवर्क का भी एक हिस्सा बन गया है। ऐसा मुख्य रूप से इसलिए हो पा रहा है क्योंकि डिजिटल बुनियादी ढांचे पर बहुत कम नियंत्रण है।
मीडिया रिपोर्टों का हवाला देते हुए, HRCP ने बताया कि मई 2025 में, पाकिस्तान की 'नेशनल साइबर क्राइम इन्वेस्टिगेशन एजेंसी' (NCCIA) ने पंजाब प्रांत के मुजफ्फरगढ़ जिले में बच्चों के यौन शोषण से जुड़े एक बेहद खतरनाक नेटवर्क का भंडाफोड़ किया।
मानवाधिकार संस्था ने बताया कि इस कार्रवाई में एक अंतरराष्ट्रीय गिरोह का पता चला, जिसे कथित तौर पर एक जर्मन नागरिक चला रहा था। इस गिरोह ने 6 से 10 साल के बच्चों को फंसाने, बहलाने-फुसलाने और उनका शोषण करने के लिए एक 'फाइट क्लब' बना रखा था।
संस्था ने कहा, "इस क्लब में डिजिटल कैमरे और हाई-स्पीड इंटरनेट जैसी आधुनिक सुविधाएं मौजूद थीं। यहाँ बच्चों के शोषण को गुप्त रूप से रिकॉर्ड किया जाता था और डार्क वेब के जरिए अंतरराष्ट्रीय खरीदारों को लाइव-स्ट्रीम किया जाता था। जांचकर्ताओं ने पुष्टि की है कि इन फुटेज को हजारों डॉलर में बेचा गया और कम से कम 50 बच्चे इसका शिकार बने।"
नागरिक समाज संगठनों द्वारा दर्ज किए गए बच्चों के शोषण के भयावह आंकड़ों पर प्रकाश डालते हुए, HRCP ने इस्लामाबाद स्थित संगठन 'साहिल' की वार्षिक रिपोर्ट 'क्रूएल नंबर्स 2024' (Cruel Numbers 2024) का जिक्र किया। इस रिपोर्ट के अनुसार, पूरे देश में बच्चों के शोषण के 3,364 मामले सामने आए, जिनमें यौन शोषण, अपहरण और बाल विवाह जैसी घटनाएं शामिल हैं।
संस्था ने कहा, "हालांकि, ये आंकड़े केवल उन्हीं घटनाओं को दर्शाते हैं जिनकी रिपोर्ट दर्ज की गई है। रिपोर्ट न होने, सामाजिक कलंक के डर और सरकारी प्रक्रियाओं में पारदर्शिता की कमी के कारण, ज्यादातर मामले - खासकर ऑनलाइन शोषण से जुड़े मामले - कभी सामने ही नहीं आते।"
मानवाधिकार संस्था ने डिजिटल अधिकारों के विशेषज्ञों की चिंताओं का भी जिक्र किया। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि पाकिस्तान में बच्चे बहुत बड़े पैमाने पर अनुचित सामग्री (inappropriate content) के संपर्क में आ रहे हैं, और जैसे-जैसे तकनीक तक पहुंच बढ़ रही है, यह खतरा भी बढ़ता जा रहा है। इसमें कहा गया है कि व्यापक कनेक्टिविटी, कमजोर रेगुलेटरी निगरानी और सीमित डिजिटल साक्षरता ने पाकिस्तानी बच्चों को ऑनलाइन माध्यमों से ग्रूमिंग, ब्लैकमेल, यौन दबाव और तस्करी के प्रति विशेष रूप से असुरक्षित बना दिया है।
HRCP ने कहा कि बच्चों को ऑनलाइन सुरक्षित रखने में विफलता केवल एक तकनीकी चूक नहीं है, बल्कि यह शासन और अधिकारों से जुड़ा एक व्यापक संकट है।
इसने इस बात पर जोर दिया कि पाकिस्तान में बच्चों का ऑनलाइन यौन शोषण और दुर्व्यवहार, राज्य की जवाबदेही, तकनीकी नियमन और सामाजिक चुप्पी के बीच का एक ऐसा मुद्दा है, जहाँ ऐसे मामलों के सामने आने पर तो उनकी निंदा की जाती है, लेकिन फिर उन्हें भुला दिया जाता है।
HRCP ने कहा, "पाकिस्तान में, मुजफ्फरगढ़ जैसे मामलों को अक्सर मीडिया, सार्वजनिक चर्चा और कानूनी संदर्भों में 'चाइल्ड पोर्नोग्राफी' (बच्चों से जुड़ी अश्लीलता) की घटनाओं के रूप में बताया जाता है। यह शब्द अपराध को गलत तरीके से पेश करता है, क्योंकि 'पोर्नोग्राफी' शब्द में सहमति, प्रदर्शन और उपभोग जैसी बातें शामिल होती हैं—जो बच्चों के मामले में लागू नहीं होतीं। इस तरह की शब्दावली का इस्तेमाल ध्यान को बच्चे से हटाकर उस सामग्री (मटेरियल) पर ले जाता है, मानो मुख्य नुकसान उस सामग्री के प्रसार में है, न कि इसमें शामिल दबाव और हिंसा में। इसके अलावा, यह उन गतिविधियों को भी नजरअंदाज कर देता है जो रिकॉर्डिंग से पहले होती हैं, जैसे कि ग्रूमिंग, हेरफेर, धमकियां और आर्थिक शोषण।"
अधिकारों के लिए काम करने वाली इस संस्था ने जोर देकर कहा कि बच्चों का ऑनलाइन यौन शोषण केवल ऐसा कंटेंट नहीं है जिसे हटा दिया जाए, या कोई ऐसा साइबर अपराध नहीं है जिसकी जांच की जाए; बल्कि यह बच्चों के अधिकारों, उनकी गरिमा, शारीरिक अखंडता, निजता और उनके बचपन का उल्लंघन है।
इसमें आगे कहा गया है कि जब तक पाकिस्तान के कानून, संस्थान, डेटा सिस्टम और सार्वजनिक चर्चा में इस वास्तविकता को नहीं समझा जाता, तब तक डिजिटल स्पेस में बच्चे असुरक्षित ही रहेंगे।