पेरिस: यूरोप के कई देशों में बढ़ती जीवनयापन लागत, महंगे आवास, शिक्षा व्यवस्था और सरकारी नीतियों को लेकर विरोध प्रदर्शन तेज हो गए हैं। फ्रांस, अल्बानिया, इटली, स्पेन और पुर्तगाल में अलग-अलग मांगों के साथ लोग सड़कों पर उतर रहे हैं। कुछ स्थानों पर प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहे, जबकि कई शहरों में पुलिस से झड़प, आगजनी और गिरफ्तारियों की घटनाएं सामने आई हैं। इन आंदोलनों के कारण अलग हैं, लेकिन आर्थिक दबाव और भविष्य को लेकर असुरक्षा इनमें साझा चिंता के रूप में दिखाई दे रही है। 
फ्रांस में शनिवार को हुए देशव्यापी प्रदर्शनों में गृह मंत्रालय के अनुसार करीब 4.10 लाख लोगों ने भाग लिया। आयोजक सीजीटी यूनियन ने भागीदारी का आंकड़ा लगभग आठ लाख बताया। सरकारी और आयोजकों के अनुमानों में अंतर होने के कारण इन्हें अलग-अलग दावों के रूप में देखा जाना चाहिए। पेरिस सहित कई प्रमुख शहरों में प्रदर्शन हुए। प्रदर्शनकारियों ने बढ़ते खर्च, वेतन और सार्वजनिक सेवाओं की स्थिति को लेकर नाराजगी जताई। बड़ी संख्या में लोगों के जुटने के कारण व्यापक सुरक्षा व्यवस्था की गई। 
फ्रांस में सुरक्षा के लिए करीब 70 हजार पुलिसकर्मी तैनात किए गए थे। अधिकारियों के अनुसार, शनिवार की कार्रवाई में 1,314 लोगों को गिरफ्तार किया गया। करीब 50 पुलिसकर्मियों के घायल होने की जानकारी भी सामने आई। व्यापक सुरक्षा इंतजामों के चलते पिछले सप्ताह जैसी बड़े पैमाने की लूटपाट और तोड़फोड़ की पुनरावृत्ति काफी हद तक रोकी गई। हालांकि, कई स्थानों पर तनाव बना रहा। पुलिस यूनियनों ने इतनी बड़ी तैनाती को लंबे समय तक जारी रखने में कठिनाई की बात कही है। 
विरोध अभी समाप्त होता नहीं दिख रहा है। फ्रांस के प्रदर्शनकारी समूहों और मजदूर संगठनों ने 31 अक्टूबर को फिर प्रदर्शन तथा पांच नवंबर को देशव्यापी हड़ताल का आह्वान किया है। येलो वेस्ट आंदोलन से जुड़े समूह भी दोबारा लामबंदी की तैयारी कर रहे हैं। इससे सरकार पर बातचीत और समाधान का दबाव बना हुआ है। आगे की स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि संगठनों की मांगों और सरकार के प्रस्तावों के बीच कितना रास्ता निकलता है। 
अल्बानिया की राजधानी तिराना में भी सरकार विरोधी प्रदर्शन जारी हैं। यहां विद्यार्थियों की मांगों में शिक्षण शुल्क कम करना, शिक्षा में सरकारी निवेश बढ़ाना और भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई शामिल है। कुछ प्रदर्शनकारी प्रधानमंत्री एडी रामा के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। बीते दिनों पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव के दौरान आंसू गैस, पानी की बौछार और लाठीचार्ज का इस्तेमाल हुआ। प्रदर्शनकारियों की ओर से पत्थर, पटाखे और अन्य वस्तुएं फेंके जाने की घटनाएं भी सामने आई हैं। 
तिराना में रविवार को भी लोग शिक्षा मंत्रालय के बाहर जुटे और प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर बढ़े। बातचीत के संकेत के तौर पर रखी गई कुर्सियों में आग लगाए जाने की जानकारी सामने आई है। प्रधानमंत्री रामा ने हिंसा की आलोचना की है, जबकि प्रदर्शनकारियों के बीच सरकार की नीतियों के खिलाफ नाराजगी बनी हुई है। यहां छात्र आंदोलन और व्यापक राजनीतिक विरोध एक साथ दिखाई दे रहे हैं। हालांकि, सभी प्रदर्शनकारियों की मांगों और तरीकों को एक जैसा मानना सही नहीं होगा। इटली में रोम, मिलान, ट्यूरिन, नेपल्स, बोलोग्ना और फ्लोरेंस सहित कई शहरों में हजारों लोगों ने प्रदर्शन किया। कुछ स्थानों पर पुलिस पर बोतलें, पत्थर और पटाखे फेंके गए। रोम के ऐतिहासिक कोलोसियम के प्रवेश क्षेत्र में भी टकराव की खबरें आईं। प्रदर्शनों के दौरान आठ शहरों में नौ लोगों को गिरफ्तार और 371 को हिरासत में लिए जाने की जानकारी सामने आई है। हिरासत में लिए गए लोगों में नाबालिग भी शामिल थे। 
मिलान में बढ़ते तनाव के बीच अतिरिक्त सुरक्षा उपाय किए गए हैं। प्रदर्शनकारियों के मुद्दों में महंगा जीवनयापन, शिक्षा और युद्ध के विरोध से जुड़ी मांगें शामिल हैं। कुछ लोगों ने ऊर्जा खर्च के खिलाफ भी नाराजगी जताई। हिंसा की आशंका को देखते हुए दुकानदारों ने प्रतिष्ठानों की सुरक्षा के इंतजाम किए। इस स्थिति ने प्रशासन के सामने सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की चुनौती बढ़ाई है। साथ ही शांतिपूर्ण विरोध करने वालों और तोड़फोड़ में शामिल लोगों के बीच अंतर करना भी जरूरी बना हुआ है। 
स्पेन में पेंशन और आवास प्रमुख मुद्दे बने हुए हैं। मैड्रिड में प्रदर्शनकारियों ने पेंशन को महंगाई के अनुरूप बढ़ाने, न्यूनतम पेंशन में सुधार और निजीकरण के खिलाफ सुरक्षा की मांग उठाई। प्यूर्टा डेल सोल चौक पर आवास संकट के विरोध में लगाया गया शिविर भी आंदोलन का केंद्र बना है। पुर्तगाल की राजधानी लिस्बन में पुलिस ने आवास कार्यकर्ताओं का विरोध शिविर हटाया। बढ़ते किराये और घर खरीदने में कठिनाई ने वहां लोगों की नाराजगी बढ़ाई है। इन प्रदर्शनों को पूरे यूरोप का एक ही आंदोलन समझने के बजाय अलग-अलग राष्ट्रीय परिस्थितियों में देखना जरूरी है। कहीं विद्यार्थी शिक्षा खर्च से परेशान हैं, कहीं परिवार किराये से और कहीं बुजुर्ग पेंशन की सुरक्षा चाहते हैं। सरकारों के सामने चुनौती इन शिकायतों का ठोस जवाब देने और हिंसा रोकने की है। आगामी प्रदर्शनों, बातचीत और नीतिगत फैसलों से स्पष्ट होगा कि तनाव कम होता है या आंदोलन और लंबा खिंचता है।
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