नई दिल्ली। देश की राजनीति में विरोध प्रदर्शन के अधिकार को लेकर एक बार फिर सियासी टकराव देखने को मिल रहा है। राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने शुक्रवार को केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू पर तीखा पलटवार किया। विवाद की शुरुआत उस समय हुई, जब रिजिजू ने सोशल मीडिया पर सिब्बल का वर्ष 2011 का एक पुराना वीडियो साझा कर कांग्रेस और राहुल गांधी पर निशाना साधा। इस वीडियो में सिब्बल तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) सरकार के दौरान 'इंडिया अगेंस्ट करप्शन' आंदोलन को लेकर आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में विरोध प्रदर्शन के अधिकार पर अपनी बात रखते नजर आ रहे हैं। वीडियो में उनके बयान को लेकर रिजिजू ने विपक्ष पर सवाल उठाए तो सिब्बल ने भी मौजूदा सरकार के रवैये और विरोध प्रदर्शनों पर की जाने वाली कार्रवाई का हवाला देकर जवाब दिया।

रिजिजू ने क्यों साझा किया 2011 का वीडियो?

दरअसल, गुरुवार को केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने कपिल सिब्बल का करीब 15 साल पुराना वीडियो सोशल मीडिया पर साझा किया था। यह वीडियो उस समय का बताया जा रहा है, जब अन्ना हजारे के नेतृत्व में देशभर में भ्रष्टाचार के खिलाफ 'इंडिया अगेंस्ट करप्शन' आंदोलन चल रहा था। उस समय केंद्र में मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली UPA सरकार सत्ता में थी और कपिल सिब्बल केंद्रीय मंत्री के रूप में सरकार का हिस्सा थे।

वीडियो में सिब्बल विरोध प्रदर्शन के अधिकार पर अपनी बात रखते हुए कहते दिखाई देते हैं कि विरोध करने का अधिकार होने का मतलब यह नहीं है कि कोई भी व्यक्ति अपनी पसंद की किसी भी जगह पर प्रदर्शन कर सकता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया था कि प्रदर्शन के दौरान आम लोगों की आवाजाही, यातायात और सार्वजनिक व्यवस्था का ध्यान रखना जरूरी है।

रिजिजू ने इसी पुराने बयान को आधार बनाकर कांग्रेस और विपक्ष की मौजूदा राजनीति पर सवाल उठाए। उन्होंने सिब्बल को 'दिमागी नक्सल' करार देते हुए दावा किया कि वह कांग्रेस के राजनीतिक राज खोलने में माहिर हैं। केंद्रीय मंत्री ने राहुल गांधी की आलोचना का भी जिक्र किया और तंज कसते हुए कहा कि क्या कांग्रेस पार्टी और उसके नेता अपने लीगल गुरु की सलाह सुनेंगे?

सिब्बल ने पैलेट गन और लाठीचार्ज का उठाया मुद्दा

रिजिजू के हमले के बाद शुक्रवार को कपिल सिब्बल ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान जवाब दिया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के नेतृत्व वाली UPA सरकार ने कभी लोगों को विरोध प्रदर्शन करने से नहीं रोका था। सिब्बल ने सवाल उठाया कि क्या उस समय प्रदर्शनकारियों पर पैलेट गन चलाई गई थी या विरोध करने वालों पर लाठीचार्ज कराया गया था?

सिब्बल ने अपने कार्यकाल का हवाला देते हुए कहा कि सरकार में रहते हुए भी उन्होंने विरोध प्रदर्शन को संवैधानिक अधिकार माना था। उन्होंने बताया कि एक बार कैबिनेट की बैठक में इस विषय पर चर्चा हुई थी। उस दौरान उनके सहयोगियों ने भी कहा था कि विरोध करना संविधान के तहत प्राप्त अधिकार है और सरकार इस अधिकार में हस्तक्षेप नहीं कर सकती।

उनका कहना था कि सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखना नहीं, बल्कि नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करना भी है। सिब्बल ने यह भी याद दिलाया कि देश के स्वतंत्रता आंदोलन में विरोध प्रदर्शनों और आंदोलनों की अहम भूमिका रही है। लोकतंत्र में असहमति और सरकार की नीतियों के खिलाफ आवाज उठाने की जगह होनी चाहिए।

रिजिजू के कानूनी अनुभव पर भी साधा निशाना

कपिल सिब्बल ने पलटवार करते हुए किरेन रिजिजू के कानूनी अनुभव पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि रिजिजू दूसरों की आलोचना तो करते हैं, लेकिन कई बार तथ्यों को समझे बिना टिप्पणी कर देते हैं। सिब्बल ने तंज कसते हुए कहा कि अदालतों में उनके करीब 50 वर्षों के अनुभव के दौरान उन्होंने रिजिजू को कभी अदालत के गलियारों में नहीं देखा।

सिब्बल का यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि रिजिजू पहले केंद्र सरकार में कानून मंत्री की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। दोनों नेताओं के बीच यह विवाद अब केवल पुराने वीडियो तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि कानूनी समझ, संवैधानिक अधिकारों और लोकतांत्रिक संस्थाओं के कामकाज तक पहुंच गया है।

संसद में विपक्ष की आवाज दबाने का लगाया आरोप

कपिल सिब्बल ने संसद की कार्यवाही को लेकर भी केंद्र सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि मौजूदा व्यवस्था में विपक्षी दलों को अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया जा रहा है। सिब्बल के मुताबिक, विपक्ष जिन मुद्दों को संसद में उठाना चाहता है, उन्हें उठाने की अनुमति नहीं मिलती और कई बार विरोध प्रदर्शन भी नहीं करने दिया जाता।

उन्होंने आरोप लगाया कि महत्वपूर्ण विधेयकों को पर्याप्त चर्चा के बिना पारित कराया जाता है और संसदीय प्रक्रियाओं की अनदेखी की जा रही है। सिब्बल ने संसदीय कार्य मंत्री के रूप में रिजिजू की भूमिका पर तंज कसते हुए कहा कि विपक्ष की आवाज नहीं सुनी जाए, यह सुनिश्चित करना उनकी विशेषज्ञता बन गई है। उन्होंने यह भी कहा कि संसद की गरिमा बहाल करना लोकतंत्र के लिए बेहद जरूरी है।

विरोध प्रदर्शन के अधिकार पर फिर शुरू हुई बहस

इस पूरे विवाद ने देश में विरोध प्रदर्शन के अधिकार और उसकी सीमाओं को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। एक तरफ रिजिजू पुराने वीडियो के जरिए यह सवाल उठा रहे हैं कि जब कांग्रेस सत्ता में थी, तब उसके नेता प्रदर्शन के लिए अपनी पसंद की जगह चुनने के अधिकार को सीमित मानते थे, तो आज विपक्ष को अलग रुख क्यों अपनाना चाहिए। दूसरी तरफ सिब्बल का तर्क है कि UPA सरकार ने नागरिकों के विरोध करने के संवैधानिक अधिकार में कभी बाधा नहीं डाली और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बल प्रयोग को सामान्य नीति नहीं बनाया।

दरअसल, लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण तरीके से विरोध दर्ज कराना नागरिकों का महत्वपूर्ण अधिकार है। हालांकि, सार्वजनिक व्यवस्था, यातायात और दूसरे नागरिकों के अधिकारों को ध्यान में रखते हुए प्रशासन प्रदर्शन के स्थान और तरीके को नियंत्रित कर सकता है। ऐसे में विरोध के अधिकार और प्रशासनिक प्रतिबंधों के बीच संतुलन का मुद्दा हमेशा चर्चा में रहता है।

सिब्बल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वर्ष 2014 से जुड़े बयानों पर भी टिप्पणी की। उन्होंने आरोप लगाया कि मौजूदा सरकार के राजनीतिक विमर्श में 2014 से पहले के इतिहास को कमतर दिखाने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने दावा किया कि आने वाले समय में देश की राजनीतिक दिशा बदलेगी और संसद की गरिमा को फिर से स्थापित किया जाएगा।

फिलहाल 2011 के वीडियो से शुरू हुआ यह विवाद केंद्र सरकार और विपक्ष के बीच बढ़ते राजनीतिक टकराव का नया उदाहरण बन गया है। एक ओर रिजिजू पुराने बयानों के जरिए कांग्रेस को घेर रहे हैं, तो दूसरी ओर सिब्बल वर्तमान सरकार की नीतियों और संसद में विपक्ष की भूमिका पर सवाल उठा रहे हैं। अब देखना होगा कि इस मुद्दे पर दूसरे राजनीतिक दल क्या रुख अपनाते हैं और विरोध प्रदर्शन के अधिकार को लेकर यह बहस आने वाले दिनों में क्या नया राजनीतिक मोड़ लेती है।

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