नई दिल्ली : करीब तीन दशक पहले दिल्ली में सामने आया नैना साहनी हत्याकांड आज भी देश के चर्चित आपराधिक मामलों में गिना जाता है। इस मामले ने न केवल राजधानी को झकझोर दिया था, बल्कि हत्या के बाद शव को ठिकाने लगाने के भयावह तरीके ने पूरे देश में सनसनी फैला दी थी। 2 जुलाई 1995 की रात लुटियंस दिल्ली के अशोका रोड स्थित बगिया रेस्टोरेंट के पिछले हिस्से से उठता धुआं इस खौफनाक वारदात का राज खोलने वाला था।
मामले के अनुसार युवा नेता सुशील शर्मा ने अपनी पत्नी नैना साहनी की गोली मारकर हत्या कर दी थी। बताया गया कि सुशील को अपनी पत्नी पर किसी अन्य व्यक्ति के साथ संबंध होने का शक था। इसी शक और विवाद के बीच उसने नैना के सिर और छाती में गोलियां दाग दीं। हत्या के बाद उसने शव को ठिकाने लगाने की कोशिश की और अपनी कार में लादकर शव को ITDC के बगिया रेस्टोरेंट की रसोई में ले गया।
आरोप था कि वहां रेस्टोरेंट के मैनेजर केशव कुमार की मदद से शव को तंदूर में जलाने की कोशिश की गई। शव को जल्दी जलाने के लिए तंदूर में मक्खन और लकड़ी के बोरे डाले गए। कुछ ही देर में रेस्टोरेंट के पिछले हिस्से से उठता काला धुआं और जलते मांस जैसी तेज गंध इलाके में फैलने लगी।
इस दौरान पुलिस की गश्त कर रहे जवानों की नजर रेस्टोरेंट से उठते धुएं पर पड़ी। रात करीब 11:30 बजे कनॉट प्लेस के आसपास गश्त कर रहे कांस्टेबल अब्दुल नजीर लश्कर और होमगार्ड चंदरपाल को रेस्टोरेंट की छत से असामान्य धुआं दिखाई दिया। उन्हें आशंका हुई कि कहीं रेस्टोरेंट में आग तो नहीं लगी है।
जब पुलिसकर्मी रेस्टोरेंट के पिछले हिस्से में पहुंचे तो वहां का दृश्य देखकर हैरान रह गए। तंदूर से तेज लपटें उठ रही थीं और उसके भीतर आधा जला हुआ मानव शरीर मौजूद था। पुलिस के अनुसार मैनेजर केशव कुमार तंदूर में मक्खन डालकर आग तेज करने की कोशिश कर रहा था। पुलिस को देखते ही उसने भागने का प्रयास किया, लेकिन उसे पकड़ लिया गया। दूसरी ओर सुशील शर्मा मौके से कार लेकर फरार हो गया।
शव बुरी तरह जल चुका था, जिससे उसकी पहचान करना बेहद मुश्किल था। जांच के दौरान पुलिस ने नैना साहनी के माता-पिता के नमूने लेकर डीएनए जांच कराई। हैदराबाद स्थित सीसीएमबी लैब में किए गए परीक्षण से शव की पहचान नैना साहनी के रूप में हुई। इस फोरेंसिक साक्ष्य ने जांच को निर्णायक दिशा दी और मामले में वैज्ञानिक साक्ष्यों की अहम भूमिका सामने आई।
जांच आगे बढ़ने के बाद सुशील शर्मा को बेंगलुरु से गिरफ्तार किया गया। अदालत में उसके खिलाफ मुकदमा चला और निचली अदालत तथा हाई कोर्ट ने उसे दोषी ठहराते हुए फांसी की सजा सुनाई। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में उसकी फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया। शीर्ष अदालत ने मामले की परिस्थितियों पर विचार करते हुए इसे व्यक्तिगत ईर्ष्या और गुस्से में किया गया अपराध माना, न कि किसी व्यापक आपराधिक साजिश का हिस्सा।
सुशील शर्मा ने लंबा समय जेल में बिताया। करीब 23 साल से अधिक समय जेल में रहने के बाद दिसंबर 2018 में दिल्ली हाई कोर्ट ने उसकी रिहाई का आदेश दिया। इस दौरान यह मामला भारतीय आपराधिक न्याय व्यवस्था में लंबे समय तक चर्चा का विषय बना रहा।
नैना साहनी हत्याकांड की सबसे भयावह बात हत्या से ज्यादा शव को तंदूर में जलाकर सबूत मिटाने की कोशिश थी। इस मामले ने पुलिस जांच में फोरेंसिक विज्ञान और डीएनए साक्ष्यों की उपयोगिता को भी सामने रखा। जली हुई अवस्था में मिले शव की पहचान वैज्ञानिक परीक्षण के जरिए किए जाने से जांच एजेंसियों को महत्वपूर्ण सबूत मिला।
करीब तीन दशक बाद भी यह मामला दिल्ली के चर्चित आपराधिक मामलों में याद किया जाता है। इस हत्याकांड ने यह भी दिखाया कि अपराध के बाद सबूत मिटाने की कोशिश कितनी भी भयावह क्यों न हो, वैज्ञानिक जांच और सतर्क पुलिसिंग के जरिए सच सामने लाया जा सकता है।
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