कावेरी जल विवाद फिर गरमाया, तमिलनाडु को रोजाना 3000 क्यूसेक पानी देने की सिफारिश
कर्नाटक। कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच कावेरी नदी के पानी के बंटवारे को लेकर विवाद एक बार फिर चर्चा में है। कावेरी जल विनियमन समिति (CWRC) ने तमिलनाडु के लिए प्रतिदिन 3,000 क्यूसेक पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करने की सिफारिश की है। शुक्रवार को हुई बैठक से संबंधित जानकारी के अनुसार, समिति ने दोनों राज्यों में जलाशयों की स्थिति, पानी की उपलब्धता और सिंचाई संबंधी जरूरतों की समीक्षा की। इस दौरान तमिलनाडु ने आरोप लगाया कि कर्नाटक उसके हिस्से का पूरा पानी नहीं छोड़ रहा है। वहीं कर्नाटक ने दावा किया कि राज्य में पानी की कमी के बावजूद तमिलनाडु को पहले ही पर्याप्त मात्रा में पानी उपलब्ध कराया गया है। दोनों राज्यों के अलग-अलग दावों के बीच जल बंटवारे को लेकर तनाव बना हुआ है।
तमिलनाडु को प्रतिदिन 3000 क्यूसेक पानी देने की सिफारिश
कावेरी जल विनियमन समिति की बैठक में कर्नाटक और तमिलनाडु के जल संसाधन विभागों के अधिकारियों ने अपने-अपने पक्ष रखे।
समिति ने उपलब्ध जल भंडार और दोनों राज्यों की जरूरतों के आधार पर पानी छोड़ने की मात्रा पर विचार किया।
अक्टूबर में इससे पहले भी समिति ने कर्नाटक को 15 दिनों तक प्रतिदिन 3,000 क्यूसेक पानी तमिलनाडु तक पहुंचाना सुनिश्चित करने की सिफारिश की थी।
कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण ने आठ अक्टूबर की बैठक में इस सिफारिश को बरकरार रखा था और नौ अक्टूबर से पानी उपलब्ध कराने का निर्देश दिया था।
हालांकि, शुक्रवार 23 अक्टूबर को हुई कथित नई बैठक के निर्णय की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध नहीं हो सकी है।
पानी की मात्रा को लेकर भी सामने आया अंतर
उपलब्ध विवरण में अगले 15 दिनों में कुल तीन टीएमसी फीट पानी छोड़ने की बात कही गई है।
हालांकि, प्रतिदिन 3,000 क्यूसेक की दर से लगातार 15 दिनों तक पानी छोड़े जाने पर कुल मात्रा लगभग 3.89 टीएमसी फीट होती है।
ऐसे में तीन टीएमसी और प्रतिदिन 3,000 क्यूसेक के आंकड़ों में अंतर है।
यह अंतर इस बात पर निर्भर हो सकता है कि पानी छोड़ने की दर कितने समय तक लागू रहती है और सीमा पर वास्तव में कितना पानी पहुंचता है।
इसलिए अंतिम मात्रा के लिए समिति या प्राधिकरण के आधिकारिक आदेश को देखना आवश्यक होगा।
तमिलनाडु ने कर्नाटक पर लगाया आरोप
बैठक के दौरान तमिलनाडु ने आरोप लगाया कि कर्नाटक निर्धारित हिस्सेदारी के अनुसार पर्याप्त पानी उपलब्ध नहीं करा रहा है।
तमिलनाडु सरकार का कहना है कि राज्य के किसानों को कृषि गतिविधियों के लिए समय पर पानी की आवश्यकता है।
विशेष रूप से कावेरी डेल्टा क्षेत्र में धान की खेती के लिए नदी का पानी महत्वपूर्ण माना जाता है।
राज्य ने पहले भी शिकायत की थी कि कर्नाटक द्वारा पानी छोड़ने में कमी के कारण कृषि गतिविधियां प्रभावित हो रही हैं।
तमिलनाडु ने मांग की है कि पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करने के साथ पिछली कमी की भी भरपाई की जाए।
कर्नाटक ने कहा- पहले ही छोड़ा जा चुका काफी पानी
दूसरी ओर कर्नाटक सरकार का कहना है कि राज्य में बारिश की कमी के कारण जलाशयों पर दबाव बढ़ गया है।
कर्नाटक के अनुसार, पेयजल और सिंचाई संबंधी अपनी आवश्यकताओं को पूरा करना भी जरूरी है।
राज्य ने दावा किया है कि उपलब्ध जल संसाधनों को देखते हुए तमिलनाडु के लिए पहले ही काफी मात्रा में पानी छोड़ा जा चुका है।
कर्नाटक सरकार का कहना है कि जल बंटवारे का निर्णय लेते समय दोनों राज्यों में वर्षा, जलाशयों के जलस्तर और वास्तविक पानी की उपलब्धता को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट में भी कर्नाटक ने सूखे की स्थिति का हवाला देते हुए अतिरिक्त पानी छोड़ने में कठिनाई जताई थी।
जलाशयों की स्थिति पर हुई चर्चा
कावेरी जल प्रबंधन से जुड़े निर्णयों में प्रमुख जलाशयों के जलस्तर की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
कर्नाटक में कृष्णराज सागर और कबिनी जैसे जलाशय कावेरी नदी प्रणाली के प्रमुख हिस्से हैं।
वहीं तमिलनाडु में मेट्टूर बांध की स्थिति सिंचाई और जलापूर्ति के लिए महत्वपूर्ण है।
समिति की बैठकों में इन जलाशयों में उपलब्ध पानी और नदी में होने वाले प्रवाह की जानकारी का विश्लेषण किया जाता है।
इसके अलावा आने वाले दिनों में बारिश की संभावना भी जल प्रबंधन के फैसलों को प्रभावित करती है।
दोनों राज्यों की जरूरतों के बीच संतुलन बनाना समिति के सामने प्रमुख चुनौती है।
किसानों की चिंता लगातार बढ़ रही
कावेरी नदी का पानी कर्नाटक और तमिलनाडु दोनों राज्यों के किसानों के लिए महत्वपूर्ण है।
कर्नाटक में मंड्या, मैसूर और आसपास के क्षेत्रों में खेती के लिए कावेरी नदी प्रणाली पर निर्भरता है।
वहीं तमिलनाडु के कावेरी डेल्टा क्षेत्र में धान की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है।
ऐसे में नदी के जल बंटवारे को लेकर होने वाले फैसलों का असर कृषि गतिविधियों पर पड़ सकता है।
समय पर पर्याप्त पानी नहीं मिलने से फसल उत्पादन प्रभावित होने की आशंका रहती है।
दूसरी ओर जलाशयों में सीमित पानी होने पर पेयजल और अन्य आवश्यकताओं को पूरा करना भी कठिन हो सकता है।
सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है विवाद
कावेरी जल बंटवारे को लेकर दोनों राज्यों के बीच लंबे समय से विवाद रहा है।
अक्टूबर 2026 में तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कर्नाटक को अतिरिक्त पानी छोड़ने का निर्देश देने की मांग की थी।
तमिलनाडु का दावा था कि निर्धारित हिस्से के मुकाबले उसे कम पानी मिला है।
कर्नाटक ने अदालत में कहा कि राज्य गंभीर वर्षा संकट से गुजर रहा है और उपलब्ध जल भंडार से पेयजल की जरूरतों को भी पूरा करना है।
12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु की 11 टीएमसी पानी की मांग से संबंधित आवेदन पर सुनवाई के बाद अपना आदेश सुरक्षित रख लिया था।
क्या है कावेरी जल प्रबंधन व्यवस्था?
कावेरी नदी के जल बंटवारे के लिए केंद्र सरकार ने वर्ष 2018 में कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण का गठन किया था।
इस व्यवस्था में कावेरी जल विनियमन समिति भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
समिति जलाशयों की स्थिति, जल प्रवाह और राज्यों की जरूरतों का आकलन करके अपनी सिफारिशें प्रस्तुत करती है।
इसके बाद जल प्रबंधन प्राधिकरण संबंधित निर्णय और निर्देश जारी करता है।
कावेरी नदी प्रणाली से जुड़े प्रमुख राज्यों में कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और केंद्रशासित प्रदेश पुडुचेरी शामिल हैं।
इनके बीच पानी के बंटवारे की व्यवस्था को लागू करना प्राधिकरण की महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों में शामिल है।
पानी की कमी से बढ़ी चुनौती
इस वर्ष कर्नाटक में मानसूनी बारिश की कमी के कारण कई क्षेत्रों में सूखे की स्थिति बनी हुई है।
ऐसे समय में नदी के पानी का बंटवारा और अधिक संवेदनशील विषय बन गया है।
कर्नाटक अपने जलाशयों में उपलब्ध पानी को पेयजल और कृषि संबंधी जरूरतों के लिए सुरक्षित रखना चाहता है।
वहीं तमिलनाडु का कहना है कि निर्धारित हिस्सेदारी के अनुरूप पानी नहीं मिलने से उसके किसानों को नुकसान उठाना पड़ सकता है।
समिति के सामने दोनों राज्यों की वास्तविक जरूरतों और उपलब्ध जल संसाधनों के आधार पर समाधान तलाशने की चुनौती है।
अगले फैसले पर टिकी निगाहें
कावेरी नदी के पानी को लेकर कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच मतभेद फिलहाल बने हुए हैं।
तमिलनाडु निर्धारित हिस्सेदारी के अनुसार अधिक पानी उपलब्ध कराने की मांग कर रहा है, जबकि कर्नाटक सीमित जल भंडार और अपनी आवश्यकताओं का हवाला दे रहा है।
ऐसे में कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण के आगामी निर्णय और जलाशयों में पानी की स्थिति महत्वपूर्ण होंगे।
दोनों राज्यों के किसानों को उम्मीद है कि विवाद का समाधान ऐसा होगा जिससे कृषि गतिविधियों और आवश्यक पेयजल आपूर्ति पर कम से कम प्रभाव पड़े।
फिलहाल प्रतिदिन 3,000 क्यूसेक पानी की पूर्व में जारी व्यवस्था की पुष्टि हुई है, लेकिन शुक्रवार की कथित नई सिफारिश के लिए आधिकारिक विवरण का इंतजार है।