तीन बच्चों की हत्या केस में हाईकोर्ट ने पलटा फैसला दो दोषियों की सजा रद्द
मां की फांसी की सजा रद्द
प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के औरैया में तीन बच्चों की डूबने से हुई मौत के मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए उनकी मां प्रियंका को मिली फांसी की सजा और सह-आरोपी आशीष उर्फ डैनी की उम्रकैद की सजा रद्द कर दी है। हाईकोर्ट ने दोनों को सभी आरोपों से बरी करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा। अदालत ने बाल गवाह की गवाही में विरोधाभास और जांच में गंभीर कमियों को फैसले का महत्वपूर्ण आधार माना।
जस्टिस सिद्धार्थ वर्मा और जस्टिस जय कृष्ण उपाध्याय की खंडपीठ ने 22 सितंबर को फैसला सुनाया। अदालत ने प्रियंका की आपराधिक अपील और आशीष की जेल अपील स्वीकार करते हुए निचली अदालत के 5 और 10 जुलाई 2025 के फैसलों को रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि अगर दोनों किसी दूसरे मामले में वांछित नहीं हैं तो उन्हें तत्काल रिहा किया जाए।
मामला 27 जून 2024 का है। औरैया कोतवाली क्षेत्र के ताल्हेपुर गांव के पास सेंगर नदी के पुल के नीचे प्रियंका के तीन बच्चों माधव उर्फ गूंगा, आदित्य उर्फ टिल्ला और मंगल के शव मिले थे। तीनों बच्चों की मौत डूबने से हुई थी। इस घटना में एक बच्चा सोनू जीवित बच गया था। अभियोजन पक्ष ने सोनू को घटना का प्रत्यक्षदर्शी बताया और उसकी गवाही को मुकदमे का प्रमुख आधार बनाया था। निचली अदालत ने जुलाई 2025 में प्रियंका को दोषी करार दिया था। अदालत ने मामले को 'दुर्लभ से दुर्लभतम' मानते हुए हत्या के आरोप में उसे फांसी की सजा सुनाई थी। इसके अलावा हत्या के प्रयास के मामले में सात साल और आपराधिक साजिश के आरोप में उम्रकैद की सजा भी दी गई थी। सह-आरोपी आशीष को आपराधिक साजिश के आरोप में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। दोनों पर आर्थिक दंड भी लगाया गया था।
हाईकोर्ट में अपील पर सुनवाई के दौरान अभियोजन के सबसे महत्वपूर्ण गवाह सोनू के बयान की विस्तृत समीक्षा की गई। हाईकोर्ट ने पाया कि बच्चे की गवाही में कई ऐसे विरोधाभास थे, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अदालत ने उसकी गवाही को बिना किसी स्वतंत्र पुष्टि के दोषसिद्धि का सुरक्षित आधार नहीं माना। अदालत के मुताबिक बाल गवाह के बयान में किसी के द्वारा सिखाए जाने के संकेत भी दिखाई देते थे। हाईकोर्ट ने यह भी गौर किया कि घटना 27 जून 2024 को हुई थी, जबकि सोनू का बयान पुलिस ने पांच जुलाई को दर्ज किया। यानी कथित प्रत्यक्षदर्शी बच्चे का बयान घटना के आठ दिन बाद लिया गया। अदालत ने सवाल उठाया कि अगर सोनू घटना का एकमात्र प्रत्यक्षदर्शी था तो उसका बयान तत्काल दर्ज क्यों नहीं किया गया।
सोनू ने अदालत में बताया था कि नदी से निकलने के बाद उसे एक बकरी चराने वाला व्यक्ति मिला था, जो उसे ग्राम प्रधान जितेंद्र भूषण के पास ले गया। इसके बाद ग्राम प्रधान ने पुलिस को सूचना दी और पुलिस सोनू को थाने ले गई। लेकिन हाईकोर्ट ने पाया कि ग्राम प्रधान की ओर से पुलिस को दी गई शुरुआती लिखित सूचना में सोनू के वहां पहुंचने या उसके द्वारा घटना की जानकारी दिए जाने का उल्लेख नहीं था।
मामले में ग्राम प्रधान को अदालत में गवाह के तौर पर पेश नहीं किए जाने को भी हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण माना। अदालत ने कहा कि उपलब्ध महत्वपूर्ण साक्ष्य को पेश नहीं किया गया। इसके अलावा जांच से जुड़ी कई कमियों ने अभियोजन के मामले को कमजोर किया। हाईकोर्ट के अनुसार निचली अदालत की दोषसिद्धि एक ऐसी बाल गवाही पर आधारित थी, जिसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई और जिसमें विरोधाभास मौजूद थे।
खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि आपराधिक मामले में आरोपी को दोषी ठहराने के लिए अभियोजन को आरोप संदेह से परे साबित करना होता है। इस मामले में पेश साक्ष्य उस कानूनी कसौटी पर खरे नहीं उतरे। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने प्रियंका की मौत की सजा और आशीष की उम्रकैद की सजा रद्द करते हुए दोनों को बरी कर दिया। इस फैसले के साथ निचली अदालत द्वारा सुनाई गई सजाएं समाप्त हो गई हैं। हाईकोर्ट का निर्णय मुख्य रूप से बाल गवाह की अविश्वसनीय और विरोधाभासी गवाही, महत्वपूर्ण साक्ष्य पेश नहीं किए जाने तथा जांच में सामने आई कमियों पर आधारित है।