नई दिल्ली। देश की राजधानी दिल्ली और आसपास के इलाकों में सर्दियों की शुरुआत के साथ वायु प्रदूषण का संकट गहराने लगा है। दीपावली से पहले दिल्ली-एनसीआर की हवा लगातार खराब हो रही है। इस बीच सैटेलाइट से मिले आंकड़ों ने चिंता बढ़ा दी है। रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में अक्टूबर के दौरान खेतों में आग लगने की घटनाएं भारतीय पंजाब की तुलना में करीब 4.2 गुना अधिक दर्ज की गई हैं। इससे आशंका जताई जा रही है कि सीमा पार से आने वाला धुआं भी उत्तर भारत के वायु प्रदूषण को प्रभावित कर सकता है।
पर्यावरण निगरानी प्लेटफॉर्म 'हमारी हवा' (HamariHawa) के विश्लेषण के अनुसार, 1 से 29 अक्टूबर 2026 के बीच पाकिस्तान के पंजाब में 13,241 स्थानों पर आग के संकेत मिले, जबकि इसी अवधि में भारतीय पंजाब में 3,158 ऐसे संकेत दर्ज किए गए। ये आंकड़े नासा के सैटेलाइट आधारित अग्नि निगरानी डेटा पर आधारित हैं। दोनों क्षेत्रों के आंकड़ों की तुलना करने पर पाकिस्तान में आग के संकेत लगभग 4.2 गुना अधिक पाए गए।
पाकिस्तान के पंजाब में पराली जलाने की घटनाएं बढ़ीं
पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में धान की कटाई के बाद फसल के अवशेष जलाने की समस्या लंबे समय से बनी हुई है। खेतों में नई फसल की बुवाई के लिए जमीन तैयार करने के दौरान कुछ किसान पराली जलाने का तरीका अपनाते हैं।इस प्रक्रिया में बड़ी मात्रा में धुआं और सूक्ष्म प्रदूषणकारी कण वातावरण में पहुंचते हैं। मौसम की परिस्थितियों के आधार पर ये कण आसपास के क्षेत्रों में फैल सकते हैं।इस बार सैटेलाइट आंकड़ों में पाकिस्तान के पंजाब में बड़ी संख्या में आग के संकेत सामने आने से पर्यावरण विशेषज्ञों की चिंता बढ़ी है।हालांकि, यह समझना जरूरी है कि सैटेलाइट द्वारा दर्ज आग के संकेत और पराली जलाने की आधिकारिक रूप से सत्यापित घटनाओं की संख्या हमेशा समान नहीं होती। अलग-अलग निगरानी प्रणालियों और समय के कारण आंकड़ों में अंतर हो सकता है।
क्या दिल्ली तक पहुंच रहा पाकिस्तान का धुआं?
पाकिस्तान के पंजाब से उठने वाला धुआं मौसम की अनुकूल परिस्थितियों में भारतीय सीमा की ओर बढ़ सकता है। विशेष रूप से पश्चिमी और उत्तर-पश्चिमी दिशा से चलने वाली हवाएं प्रदूषणकारी कणों को लंबी दूरी तक पहुंचा सकती हैं।इसका संभावित प्रभाव भारतीय पंजाब, हरियाणा और दिल्ली-एनसीआर के वातावरण पर पड़ सकता है।हालांकि, पाकिस्तान में पराली जलाने की ज्यादा घटनाएं होने का अर्थ यह नहीं है कि दिल्ली के प्रदूषण के लिए केवल पाकिस्तान जिम्मेदार है।किसी विशेष दिन दिल्ली की हवा में पाकिस्तान से आए धुएं का कितना योगदान है, इसका पता लगाने के लिए हवा की दिशा, गति, वायुमंडलीय परिस्थितियों और प्रदूषण के स्रोतों का वैज्ञानिक विश्लेषण आवश्यक है।विशेषज्ञों के अनुसार, दिल्ली में प्रदूषण बढ़ने के पीछे कई स्थानीय और क्षेत्रीय कारण एक साथ काम करते हैं।
दिल्ली का AQI बेहद खराब श्रेणी में पहुंचा
दीपावली से पहले दिल्ली की वायु गुणवत्ता में तेज गिरावट दर्ज की गई है।रिपोर्ट के अनुसार, 31 अक्टूबर को दिल्ली का वायु गुणवत्ता सूचकांक यानी AQI 117 दर्ज किया गया था, जो मध्यम श्रेणी में आता है।इसके बाद 1 नवंबर को AQI बढ़कर 261 पहुंच गया। अगले दिन 2 नवंबर को यह 324 दर्ज किया गया, जिससे दिल्ली की हवा बेहद खराब श्रेणी में पहुंच गई।वायु गुणवत्ता में आई इस गिरावट के पीछे प्रतिकूल मौसम और प्रदूषणकारी कणों के वातावरण में जमा होने जैसी परिस्थितियों को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
दिल्ली के प्रदूषण में पराली का कितना योगदान?
भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (IITM) की निर्णय सहायता प्रणाली के अनुसार, 2 नवंबर को दिल्ली के पीएम2.5 प्रदूषण में पराली जलाने का अनुमानित योगदान लगभग 8.5 प्रतिशत था।इस आंकड़े से स्पष्ट होता है कि खेतों में आग लगने की घटनाएं प्रदूषण का एक कारण हैं, लेकिन अकेला कारण नहीं।दिल्ली में वाहनों से निकलने वाला धुआं, निर्माण गतिविधियों की धूल, औद्योगिक उत्सर्जन और अन्य स्थानीय स्रोत भी हवा की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं।इसके अलावा सर्दियों के दौरान तापमान कम होने और हवा की गति धीमी पड़ने से प्रदूषणकारी कण वातावरण में अधिक समय तक बने रह सकते हैं।यही वजह है कि कई बार उत्सर्जन में बहुत ज्यादा बदलाव नहीं होने पर भी मौसम के कारण AQI तेजी से बढ़ सकता है।
लाहौर में भी बढ़ रहा प्रदूषण का संकट
पराली जलाने की समस्या केवल भारत तक सीमित नहीं है। पाकिस्तान का लाहौर शहर भी हर साल सर्दियों में गंभीर वायु प्रदूषण का सामना करता है।इस बार भी लाहौर और आसपास के इलाकों में धुंध तथा खराब वायु गुणवत्ता की समस्या सामने आई है।पाकिस्तान के पंजाब में खेतों में आग के बड़ी संख्या में संकेत मिलने से वहां के शहरी इलाकों की हवा पर भी असर पड़ने की आशंका है।इसका मतलब है कि पराली जलाने से पैदा होने वाला प्रदूषण किसी एक देश की सीमा तक सीमित नहीं रहता।वायुमंडल में मौजूद प्रदूषणकारी कण हवा के साथ दूर तक पहुंच सकते हैं। इसलिए दक्षिण एशिया के कई शहरों में वायु प्रदूषण को एक साझा पर्यावरणीय चुनौती के रूप में देखा जा रहा है।
दिवाली से पहले क्यों बढ़ी चिंता?
इस वर्ष दीपावली 8 नवंबर को मनाई जाएगी। त्योहार से पहले दिल्ली-एनसीआर की हवा खराब होने से प्रशासन और पर्यावरण एजेंसियों की चिंता बढ़ गई है।पटाखों से होने वाला अतिरिक्त उत्सर्जन पहले से प्रदूषित वातावरण को और प्रभावित कर सकता है।इसके अलावा नवंबर में तापमान में गिरावट और हवा की रफ्तार कम होने जैसी परिस्थितियां भी प्रदूषण बढ़ाने में भूमिका निभा सकती हैं।ऐसे में यदि भारत और पाकिस्तान के पंजाब क्षेत्रों में पराली जलाने की गतिविधियां जारी रहती हैं, तो उत्तर भारत में वायु गुणवत्ता की स्थिति चुनौतीपूर्ण हो सकती है।हालांकि, प्रदूषण कितना बढ़ेगा, यह आने वाले दिनों के मौसम और उत्सर्जन की वास्तविक स्थिति पर निर्भर करेगा।
प्रदूषण नियंत्रण के लिए उठाए जा रहे कदम
दिल्ली-एनसीआर में खराब वायु गुणवत्ता को देखते हुए प्रदूषण नियंत्रण उपायों को तेज किया जा रहा है।वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) ने प्रतिकूल मौसम और बढ़ते प्रदूषण के मद्देनजर नियंत्रण उपायों को सख्ती से लागू करने के निर्देश दिए हैं।इन उपायों में धूल नियंत्रण, निर्माण गतिविधियों की निगरानी और प्रदूषण फैलाने वाले स्रोतों पर कार्रवाई जैसे कदम शामिल हैं।विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय तक राहत के लिए पराली प्रबंधन के साथ वाहनों, उद्योगों और अन्य प्रदूषण स्रोतों से होने वाले उत्सर्जन को कम करना भी जरूरी है।
केवल पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराना सही नहीं
सैटेलाइट आंकड़ों में पाकिस्तान के पंजाब में भारतीय पंजाब की तुलना में 4.2 गुना अधिक आग के संकेत दर्ज होना महत्वपूर्ण है।लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि दिल्ली की खराब हवा का सबसे बड़ा कारण पाकिस्तान है।वर्तमान स्थिति में सीमा पार पराली का धुआं प्रदूषण बढ़ाने वाला एक संभावित कारक है। उसका वास्तविक योगदान विस्तृत वैज्ञानिक आकलन से ही स्पष्ट हो सकता है।
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