सोने-चांदी की तलाश में बढ़ रहा प्रदूषण का संकट नियारा कारोबार से पर्यावरण पर खतरा
संतकबीरनगर: जिस नियारा कारोबार में सोने और चांदी की चमक तलाश की जा रही है, उसका दूसरा पहलू अब चिंता बढ़ाने लगा है। राख की धुलाई और धातु निकालने की प्रक्रिया से निकलने वाले रासायनिक अवशेष तथा भट्ठियों से निकलने वाला विषाक्त धुआं पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहा है। इससे जमीन, पानी और हवा की गुणवत्ता प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है।
पूर्वांचल में नियारा के बड़े कारोबार के लिए पहचान रखने वाला बखिरा कस्बा और आसपास के गांव इस कारोबार का प्रमुख केंद्र बन चुके हैं। यहां बड़ी संख्या में परिवार सराफा दुकानों से आने वाली राख से सोने और चांदी जैसे कीमती धातुओं को निकालने का काम करते हैं।
जानकारी के अनुसार, बखिरा कस्बे और आसपास के करीब आधा दर्जन गांवों में लगभग चार सौ परिवार इस काम से जुड़े हुए हैं। नेपाल, बिहार और उत्तर प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों से सराफा दुकानों की राख यहां लाई जाती है। इस राख को विभिन्न प्रक्रियाओं से गुजारकर उसमें मौजूद कीमती धातुओं को अलग किया जाता है।
नियारा कारोबार से जुड़े लोगों के लिए यह रोजगार का बड़ा माध्यम है। कई परिवार वर्षों से इसी काम पर निर्भर हैं। हालांकि, इसके साथ ही पर्यावरण और स्वास्थ्य को लेकर गंभीर चिंताएं भी सामने आने लगी हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि राख की धुलाई के दौरान इस्तेमाल होने वाले रसायन यदि खुले में छोड़े जाते हैं तो वे मिट्टी और जल स्रोतों को प्रभावित कर सकते हैं। खुले स्थानों पर जमा राख पर बारिश का पानी पड़ने से उसमें मौजूद घुलनशील तत्व जमीन के अंदर पहुंच सकते हैं।
इससे भूजल प्रदूषित होने का खतरा बढ़ जाता है। यदि दूषित पानी का लंबे समय तक सेवन किया जाए तो स्वास्थ्य संबंधी गंभीर समस्याएं पैदा हो सकती हैं। विशेषज्ञों ने आशंका जताई है कि ऐसे प्रदूषण से कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा भी बढ़ सकता है।
इसके अलावा, भट्ठियों में राख को गलाने की प्रक्रिया के दौरान निकलने वाला धुआं भी चिंता का कारण है। यदि धुएं को नियंत्रित करने के लिए उचित तकनीक का इस्तेमाल न किया जाए तो आसपास की हवा की गुणवत्ता खराब हो सकती है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि कई स्थानों पर राख को खुले में जमा किया जाता है। इससे बारिश के मौसम में परेशानी बढ़ जाती है। राख के बहाव से आसपास की जमीन प्रभावित होने की आशंका बनी रहती है।
कृषि भूमि पर भी इसका असर पड़ने की चिंता जताई जा रही है। रासायनिक तत्वों के कारण मिट्टी की गुणवत्ता खराब हो सकती है और धीरे-धीरे भूमि की उर्वरता कम होने का खतरा रहता है।
नियारा कारोबार से जुड़े लोगों का कहना है कि यह उनका पारंपरिक रोजगार है और इससे बड़ी संख्या में परिवारों की आजीविका चलती है। हालांकि, वे भी मानते हैं कि पर्यावरण सुरक्षा के लिए बेहतर व्यवस्था जरूरी है।
स्थानीय प्रशासन के सामने अब चुनौती यह है कि रोजगार और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। कारोबार को पूरी तरह बंद करना आसान नहीं है, क्योंकि इससे बड़ी संख्या में परिवारों की आय प्रभावित होगी।
जानकारों का सुझाव है कि नियारा कारोबार में आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया जाए। रासायनिक अवशेषों के सुरक्षित निस्तारण, भट्ठियों में प्रदूषण नियंत्रण उपकरण लगाने और काम करने वाले लोगों के लिए सुरक्षा मानकों को लागू करने से खतरे को कम किया जा सकता है।
इसके अलावा, प्रशासन को समय-समय पर जांच करनी चाहिए कि कहीं नियमों का उल्लंघन तो नहीं हो रहा है। राख के भंडारण और निस्तारण के लिए सुरक्षित स्थान तय किए जाने की जरूरत है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे कामों में लगे लोगों को भी सुरक्षा उपकरणों का इस्तेमाल करना चाहिए। रसायनों के सीधे संपर्क में आने से त्वचा, सांस और अन्य स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं।
बखिरा और आसपास के क्षेत्रों में नियारा कारोबार ने जहां लोगों को रोजगार दिया है, वहीं अब पर्यावरण संरक्षण को लेकर नई चुनौती खड़ी कर दी है। सोने-चांदी की तलाश के बीच यह जरूरी हो गया है कि जमीन, पानी और हवा की सुरक्षा को भी प्राथमिकता दी जाए।
यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में इसका असर स्थानीय पर्यावरण और लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ सकता है।