चीन के कानून पर तिब्बती संगठनों में नाराजगी, धर्मशाला से निकला शांति मार्च
धर्मशाला। चीन के विवादित 'जातीय एकता और प्रगति कानून' (Ethnic Unity and Progress Law) के खिलाफ निर्वासित तिब्बती समुदाय का विरोध तेज हो गया है। हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2026 को पांच तिब्बती गैर-सरकारी संगठनों (NGO) ने संयुक्त रूप से शांति मार्च की शुरुआत की। इस अभियान में करीब 35 तिब्बती कार्यकर्ता शामिल हैं, जो धर्मशाला से हरियाणा के कुरुक्षेत्र तक लगभग 345 किलोमीटर की यात्रा करेंगे। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि चीन का नया कानून तिब्बती समुदाय की भाषा, संस्कृति, धार्मिक स्वतंत्रता और पारंपरिक पहचान के लिए खतरा पैदा करता है। संगठनों ने कानून को रद्द करने की मांग करते हुए भारत सरकार और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से समर्थन मांगा है।
इस शांति मार्च को केंद्रीय तिब्बती प्रशासन (CTA) के अध्यक्ष पेनपा त्सेरिंग ने धर्मशाला से रवाना किया। अभियान का आयोजन पांच संगठनों यू-त्सांग चोलखा, धोतोए चोलखा, धोमे चोलखा, तिब्बती महिला संघ और ग्लोबल तिब्बती पीपुल्स मूवमेंट फॉर मिडल वे अप्रोच (GTPM) ने संयुक्त रूप से किया है। इन संगठनों का कहना है कि उनका उद्देश्य चीन की नई नीति के संभावित प्रभावों के बारे में आम लोगों को जागरूक करना और तिब्बती समुदाय के सांस्कृतिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए समर्थन जुटाना है।
शांति मार्च के दौरान कार्यकर्ता विभिन्न बाजारों, शैक्षणिक संस्थानों और सार्वजनिक स्थानों पर लोगों से संवाद करेंगे। आयोजकों के अनुसार, अभियान के तहत तिब्बत से जुड़े मानवाधिकार मुद्दों और नए कानून के प्रावधानों की जानकारी दी जाएगी। प्रतिभागी यात्रा का कुछ हिस्सा पैदल तय करेंगे, जबकि लंबी दूरी के लिए बसों की भी व्यवस्था की गई है। आयोजकों को उम्मीद है कि मार्च लगभग तीन से चार दिनों में कुरुक्षेत्र पहुंचेगा।
इस अवसर पर केंद्रीय तिब्बती प्रशासन के अध्यक्ष पेनपा त्सेरिंग ने चीन की नीतियों की आलोचना की। उन्होंने आरोप लगाया कि चीन तिब्बती समुदाय की अलग सांस्कृतिक और राष्ट्रीय पहचान को धीरे-धीरे कमजोर कर रहा है। त्सेरिंग ने कहा कि यह केवल एक कानून का मामला नहीं है, बल्कि तिब्बती भाषा, धर्म और सांस्कृतिक परंपराओं के भविष्य से जुड़ा विषय है।उन्होंने दावा किया कि चीन की नीतियां तिब्बतियों के साथ-साथ उइगर और मंगोल समुदायों की पहचान को भी प्रभावित कर सकती हैं। पेनपा त्सेरिंग ने कहा कि केंद्रीय तिब्बती प्रशासन इस मुद्दे को विभिन्न देशों की सरकारों, संसदों, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और मानवाधिकार संगठनों के सामने उठाता रहेगा।
चीन का 'जातीय एकता और प्रगति को बढ़ावा देने वाला कानून' 12 मार्च 2026 को पारित किया गया था और 1 जुलाई 2026 से प्रभावी हुआ। इस कानून में कुल 65 अनुच्छेद हैं। इसके प्रावधानों में राष्ट्रीय एकता, शिक्षा, भाषा, धार्मिक गतिविधियों और जातीय पहचान से जुड़े नियम शामिल हैं।कानून के अनुच्छेद 15 में मंदारिन चीनी भाषा को शिक्षा और सरकारी कार्यों में प्राथमिकता दी गई है। हालांकि, कानून में अल्पसंख्यक भाषाओं के सम्मान और संरक्षण का उल्लेख भी किया गया है। आलोचकों का कहना है कि मंदारिन को प्राथमिकता देने से तिब्बती और अन्य अल्पसंख्यक भाषाओं के सार्वजनिक उपयोग पर असर पड़ सकता है।
वहीं, अनुच्छेद 46 में धार्मिक संस्थाओं और गतिविधियों को चीनी राष्ट्रीय पहचान तथा राज्य की निर्धारित धार्मिक नीतियों के अनुरूप संचालित करने पर जोर दिया गया है। मानवाधिकार संगठनों ने आशंका व्यक्त की है कि इससे तिब्बती बौद्ध धर्म की स्वतंत्र गतिविधियों पर सरकारी नियंत्रण बढ़ सकता है।शांति मार्च में शामिल ग्लोबल तिब्बती पीपुल्स मूवमेंट फॉर मिडल वे अप्रोच की अध्यक्ष तेनजिन शिनयी ने कहा कि पांचों संगठन तिब्बती भाषा और संस्कृति के संरक्षण के मुद्दे पर एकजुट हुए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि चीन की शिक्षा और सांस्कृतिक नीतियां तिब्बती बच्चों को उनकी पारंपरिक पहचान से दूर कर रही हैं।
उन्होंने भारत की जनता और अंतरराष्ट्रीय नेताओं से अपील की कि वे तिब्बती समुदाय की चिंताओं को गंभीरता से लें और सांस्कृतिक अधिकारों के संरक्षण के प्रयासों का समर्थन करें।तिब्बती महिला संघ की अध्यक्ष केलसांग डोलमा ने बताया कि कुरुक्षेत्र को शांति मार्च के अंतिम पड़ाव के रूप में इसलिए चुना गया है क्योंकि इसका भारतीय इतिहास और धार्मिक परंपराओं में विशेष महत्व है। उन्होंने कहा कि इस अभियान के माध्यम से अधिक से अधिक लोगों को तिब्बती समुदाय की चिंताओं और चीन के नए कानून के संभावित प्रभावों के बारे में जानकारी देने का प्रयास किया जाएगा।
शांति मार्च के आयोजकों ने बताया कि कुरुक्षेत्र पहुंचने के बाद प्रदर्शनकारी नई दिल्ली में विभिन्न देशों के दूतावासों से संपर्क करने की भी योजना बना रहे हैं। उनका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समर्थन प्राप्त करना और कानून को वापस लेने की मांग को संबंधित सरकारों तक पहुंचाना है।दूसरी ओर, चीन सरकार ने इन आरोपों को खारिज किया है। चीनी अधिकारियों का कहना है कि नया कानून देश के सभी 56 जातीय समूहों के बीच एकता, सामाजिक सद्भाव और साझा विकास को बढ़ावा देने के उद्देश्य से बनाया गया है। चीन का दावा है कि कानून अल्पसंख्यक समुदायों की भाषाओं और सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण की व्यवस्था भी करता है।
इस कानून को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चिंता सामने आई है। संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार विशेषज्ञों ने इसके कुछ प्रावधानों का अध्ययन करते हुए जातीय अल्पसंख्यकों के भाषाई, सांस्कृतिक और धार्मिक अधिकारों पर संभावित प्रभाव को लेकर सवाल उठाए हैं। उन्होंने चीन से कानून का क्रियान्वयन अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के अनुरूप सुनिश्चित करने का आग्रह किया है।फिलहाल धर्मशाला से शुरू हुआ यह शांति मार्च तिब्बती समुदाय के विरोध अभियान का हिस्सा बन गया है। पांचों संगठनों ने स्पष्ट किया है कि वे अपनी मांगों को शांतिपूर्ण तरीके से भारत और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने रखेंगे। आगामी दिनों में कुरुक्षेत्र तक प्रस्तावित यात्रा और दिल्ली में राजनयिक संपर्कों के जरिए इस मुद्दे को आगे बढ़ाने की योजना है।